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एलेक्जेंडर हेंड्रिक्स: माथे पर छह टांके लगने के बाद भी तूफ़ान थम नहीं रहा, भारत के ख़िलाफ़ दागे 3 गोल
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और बेल्जियम के बीच हॉकी का सेमी फ़ाइनल मुक़ाबले में पिछड़ने के बाद भारत की शुरुआत ठीक रही थी और आधे समय तक दोनों टीमें बराबरी पर थीं.
बावजूद इसके बाद भारत ये मैच 2-5 के बड़े अंतर से गंवा बैठा. इस हार के लिए बेल्जियम का इकलौता शख़्स ज़िम्मेदार रहा जिसका नाम है एलेक्ज़ेंडर हेंड्रिक्स.
हेंड्रिक्स ने इस मैच में पेनल्टी स्ट्रोक्स को गोल में तब्दील करते हुए हैट-ट्रिक जमाई.
चोटिल होने के बावजूद दिखाया था शानदार प्रदर्शन
हेंड्रिक्स किस तबीयत के खिलाड़ी हैं, इसका अंदाज़ा इसी ओलंपिक में रविवार को भी दिखा था जब वे क्वॉर्टर फ़ाइनल में स्पेन के ख़िलाफ़ खेलने उतरे थे. बेल्जियम ने ये मुक़ाबला 3-1 से जीता और इसमें दो गोल एलेक्ज़ेडर ने किए थे.
लेकिन ये पूरी कहानी नहीं है. कहानी ये है कि क्वॉर्टर फ़ाइनल मुक़ाबले से ठीक दो दिन पहले ग्रेट ब्रिटेन के साथ मुक़ाबले में एलेक्ज़ेंडर हेंड्रिक्स चोटिल हो गए थे. ब्रिटिश खिलाड़ी की स्टिक से उनके माथे पर चोट लगी थी, इस चोट के चलते उनके सिर से खून की धार निकल आई थी.
डॉक्टरों को उन्हें ठीक करने के लिए छह टांके लगाने पड़े थे, तीन बाहर से और तीन अंदर की तरफ़. अगले दिन शनिवार को उन्होंने अपना एमआरआई कराया, जिससे पता चला कि कोई अंदरूनी चोट नहीं है.
टीम के प्रमुख कोच शेन मेकलियॉड को चिंता ज़रूर थी, लेकिन हेंड्रिक्स ने पांच छह रेडियोलॉजिस्ट से क्लीयरेंस हासिल करके कोच ही नहीं अपनी टीम को भी चिंताओं से मुक्त रखा.
अगर इससे भी आप उनके खेल के प्रति जज़्बे को नहीं माप पा रहे हों तो टोक्यो ओलंपिक में उनका स्कोर कार्ड देख लीजिए.
लगातार गोल पर गोल
सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले तक वे सात मुक़ाबलों में 14 गोल कर चुके हैं, टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा गोल उनके स्टिक से निकले हैं.
वरिष्ठ खेल पत्रकार सौरभ दुग्गल हेंड्रिक्स के इस प्रदर्शन पर बताते हैं, "अगर कोई खिलाड़ी ओलंपिक जैसे विश्वस्तरीय टूर्नामेंट में लगातार स्कोर कर रहा है तो आप ये तो यक़ीन मानिए कि वो अपने फ़न में सर्वश्रेष्ठ है."
वैसे ओलंपिक खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के इस जज़्बे के पीछे भी कहानी है.
रिज़र्व खिलाड़ी से स्टार खिलाड़ी तक का सफ़र
दरअसल, पांच साल पहले रियो ओलंपिक के दौरान बेल्जियम का प्रदर्शन शानदार रहा था. टीम गोल्ड मेडल नहीं जीत पाई थी, लेकिन अर्जेंटीना के हाथों फ़ाइनल हारने तक बेल्जियम का प्रदर्शन लाजवाब था और इस बेमिसाल प्रदर्शन में एलेक्जेंडर हेंड्रिक्स का कोई योगदान नहीं था क्योंकि वे टीम के रिर्ज़व खिलाड़ी थे और पूरे टूर्नामेंट के दौरान उन्हें बेंच पर बैठना पड़ा था.
उन्हें अपनी टीम के प्रदर्शन पर गर्व तो हो रहा था, लेकिन उन्होंने उस वक्त तय कर लिया था कि अपने सपनों को साकार करने के लिए वे और ज़्यादा मेहनत करेंगे ताकि टीम प्रबंधन उन्हें रिज़र्व खिलाड़ी ना बना पाए.
जिन लोगों को 2018 में भुवनेश्वर में खेले गए वर्ल्ड चैम्पियनशिप की याद होगी, उन्हें एलेक्ज़ेंडर हेंड्रिक्स ज़रूर याद होंगे. हेंड्रिक्स उस टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी थे और उनके सात गोलों की बदौलत ही बेल्जियम की टीम वर्ल्ड चैम्पियन बनने में कामयाब हुई थी.
सौरभ दुग्गल बताते हैं, "देखिए हेंड्रिक्स की कामयाबी में उनका अपना कौशल तो है ही साथ में उनकी टीम का भी योगदान है, टीम के बाक़ी खिलाड़ी पेनल्टी कॉर्नर हासिल करके उनके लिए मौका बनाते हैं और उनकी ख़ासियत ये है कि वे मौके को भुना लेते हैं."
हॉकी की दुनिया में कैसे पहुंचे
आधुनिक हॉकी की तेज़ रफ़्तार और बड़े टूर्नामेंटों का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि मौके को भुना पाना इतना आसान भी नहीं होता, लेकिन हेंड्रिक्स इस काम को बखूबी निभा रहे हैं कि क्योंकि महज़ पांच साल की उम्र से ही उन्होंने हॉकी को अपना लिया था.
संयोग ये था कि उनके माता-पिता जहां रह रहे थे, वहां से दो गली की दूरी पर ही एक हॉकी क्लब था, जहां एलेक्ज़ेंडर पांच साल की उम्र में पहुंच गए और 14 साल की उम्र तक उनका नाम बेल्जियम की नेशनल हॉकी सर्किट में फैलने लगा था.
लेकिन उन्हें रातों रात कामयाबी नहीं मिली, बल्कि सीढ़ी दर सीढ़ी उन्होंने ख़ुद को साबित किया. पहले अंडर 16 टीम में आए, फिर अंडर 18 और उसके बाद अंडर 21 की टीम में उन्होंने ख़ुद को निखारा.
इन सबके बाद 2010 में सिंगापुर में खेले गए यूथ ओलंपिक खेलों में बेल्जियम को कांस्य पदक दिलाने में उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा 11 गोल दागे थे. 2012 में महज़ 18 साल की उम्र में वे बेल्जियम की नेशनल टीम में शामिल हो गए. अगले साल उन्हें बेल्जियम का सबसे उभरता खिलाड़ी चुना गया.
नेशनल टीम में जगह बनाने में लगा वक़्त
बावजूद इसके 2016 के रियो ओलंपिक में उन्हें बेंच पर बैठना पड़ा. सौरभ दुग्गल बताते हैं, "पिछले कुछ सालों में बेल्जियम की हॉकी में इतना सुधार हुआ है कि हेंड्रिक्स जैसी प्रतिभाओं को भी मौका हासिल करने के लिए इंतज़ार करना पड़ा है."
मौजूदा समय में एलेक्ज़ेंडर हेंड्रिक्स की गिनती दुनिया के सबसे ख़तरनाक ड्रैग फ़्लिकरों में तो होती है, पर विपक्षी टीमों पर उनका ख़ौफ़ उस तरह का नहीं दिखता जैसा पाकिस्तान के सोहेल अब्बास, ब्रिटेन के कैलम जाइल्स, नीदरलैंड्स के टेएके टेकेमा, ऑस्ट्रेलिया के ट्रॉय एल्डर या फिर भारत के संदीप सिंह का दिखता रहा था.
इस बारे में सौरभ दुग्गल कहते हैं, "देखिए हैंड्रिक्स की ब्रैंडिंग उस तरह से नहीं हो पाई हो, लेकिन वे इन सबसे कम भी नहीं हैं. ब्रैंडिंग नहीं होने की एक वजह यह है कि हेंड्रिक्स का कर्न्वजन रेट औसत जैसा ही है, बहुत शानदार नहीं है. लेकिन उनकी ख़ासियत ये है कि वे अपनी रिस्ट का मूवमेंट भी प्रभावी तरीके से करते हैं."
वैसे आपको ये जानकर और भी अचरज हो सकता है कि 27 साल के हेंड्रिक्स काफ़ी पढ़े-लिखे हॉकी खिलाड़ी हैं. एंटवर्प यूनिवर्सिटी से ऑनर्स ग्रेजुएट होने के बाद वो एप्लाइड इकॉनोमिक साइंसेज़ में मास्टर्स डिग्री हासिल कर चुके हैं.
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