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कमलप्रीत ओलंपिक में इतिहास बनाने से चूकीं, डिस्कल थ्रो में छठे स्थान पर रहीं
- Author, वंदना
- पदनाम, टीवी एडिटर, भारतीय भाषाएं
डिस्कस थ्रो खिलाड़ी कमलप्रीत कौर टोक्यो ओलंपिक में पदक की दौड़ से बाहर हो गई हैं.
कमलप्रीत कौर ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए डिस्कस थ्रो के फ़ाइनल में जगह बनाई थी लेकिन सोमवार को उन्हें छठे स्थान से संतोष करना पड़ा और पदक की रेस से बाहर हो गईं.
अपनी ओलंपिक रेस में पदक के बहुत करीब पहुँच चुके मिल्खा सिंह की आख़िर तक यही इच्छा रही कि एथलेटिक्स में भारत को मेडल मिले.
अब ओलंपिक के फ़ाइनल में जगह बनाने वाली पंजाब की कमलप्रीत कौर को ख़ूब वाहवाही मिल रही थी. ये भी सच है कि बहुत से लोग इससे पहले न उनके नाम से वाकिफ़ थे और न उनके खेल से.
ओलंपिक में जाने से पहले बीबीसी को दिए इंटरव्यू में मैने कमलप्रीत से जब उनके खेल के बारे में पूछा था उन्होंने जवाब दिया था, "जब मैंने राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने शुरू किए तो तो सभी लोग आकर बधाई देने लगे. लेकिन बधाई देने के बाद वो पूछते थे कि ये डिस्कस आख़िर होता क्या है. कैसे खेलते हैं ?"
लेकिन सुर्खियों से दूर कमलप्रीत ने पिछले दो-तीन सालों से लगातार मेहनत कर ओलंपिक तक का सफ़र तय किया है.
पंजाब के गांव से शुरू हुआ सफ़र
कमलप्रीत पंजाब में मुख़्तसर साहब ज़िले के एक छोटे से गाँव आती हैं और बकौल कमलप्रीत जब उन्होंने खेलना शुरु किया तो वहाँ खेल के नाम कुछ ख़ास नहीं था.
पूछते पाछते वो बादल गाँव के स्पोर्ट्स सेंटर पहुँचीं जहाँ से उन्होंने खेलना शुरू किया. अच्छी कद काठी वाली कमलप्रीत ने डिस्कस में हाथ आज़माया और सफलता भी मिलने लगी.
कमलप्रीत को इस बात का मलाल है कि करियर के शुरुआती सालों में गाँव में ठीक से मार्गदर्शन मिला होता तो वो टोक्यो नहीं रियो ओलंपिक में दावेदार होतीं.
लेकिन इससे भी पहले कमलप्रीत को एक और चुनौती को पार करना पड़ा. अक्सर आज भी गाँव-कस्बों में लड़कियों को खेलों में भेजने को लेकर संकोच रहता है.
कमलप्रीत कहती हैं कि गाँव में जैसा माहौल था उसके कारण माँ-बाप भी यही चाहते थे कि बेटी कुछ पढ़ लिख जाए और शादी हो जाए, लेकिन कमलप्रीत अपनी बात पर अड़ी रहीं और परिवार को जल्द ही मना लिया.
परिवार के समर्थन से जो हिम्मत मिली और कमलप्रीत ने जो फ़ैसला लिया था, वो पूरी तरह उस पर खरी उतरीं और 2019 में उन्होंने डिस्कस थ्रो में कई साल पुराना नेश्नल रिकॉर्ड तोड़ा.
खेती-किसानी की वजह से माँ-बाप कमलप्रीत के साथ नहीं जा पाते थे और न ही सफ़र के लिए फ़्लाइट की टिकट दे पाते थे, लेकिन आगे बढ़ने के लिए कमलप्रीत का हौसला ही काफ़ी था.
इस साल उन्होंने फ़ेडरेशन कप में 65.06 मीटर का थ्रो डाला था और कुछ दिन बाद इसी साल 66.59 मीटर का. 65 मीटर को पार करने वाली वो पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं.
कमल कहती हैं कि शुरुआती दौर में वो ट्रेनिंग तो करती थीं, लेकिन खेल के दूसरे पहलुओं के बारे में उन्हें अंदाज़ा नहीं था जैसे सही डाइट और खाना.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा था, "गाँव में यही समझते थे कि सब्ज़ी रोटी खाना अच्छी डाइट है, लेकिन ये गाइडेंस तो बाद में मिली कि न्यूट्रीशन का मतलब क्या होता है. फिर मैंने डाइट पर ध्यान देना शुरू किया.."
पिछले दो साल से लगातार कमलप्रीत ने अपने प्रदर्शन में सुधार किया है जो ओलंपिक में नज़र भी आ रहा है.
क्रिकेट से भी है लगाव
कमलप्रीत हरफ़नमौला हैं और क्रिकेट भी खेलती हैं- न सिर्फ़ खेलती हैं बल्कि क्रिकेटर बनना भी चाहती हैं. उनका सपना है कि जब उन्हें मौका मिलेगा तो वो क्रिकेट में भी हाथ आज़माना चाहेंगी.
पर फ़िलहाल तो टार्गेट और फ़ोकस डिस्कस थ्रो और ओलंपिक मेडल पर है.
जब ओलंपिक की फ़ाइनल में कमलप्रीत जगह बना रही थीं तो उनके पिता खेत में काम कर रहे थे क्योंकि किसानी का काम रुक नहीं सकता था.
उनके परिवार को भी बेटी का इंतज़ार है. पदक मिल जाने की इच्छा तो है ही पर ओलंपिक तक पहुँच पाना भी कमलप्रीत के परिवार के लिए किसी पदक से कम नहीं है.
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