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पीवी सिंधु के कोच पार्क ताई संग, जिन्होंने उन्हें डबल ओलंपिक मेडलिस्ट बनाया
पार्क ताई संग 2002 में बुसान एशियाई खेलों के गोल्ड मेडल विजेता हैं. 2004 की एथेंस ओलंपिक गेम्स के क्वॉर्टर फ़ाइनल तक पहुँचे थे, लेकिन इंडोनेशिया के सोनी कुंकोरो से हार गए थे.
सिंधु के साथ जुड़ने से पहले पार्क दक्षिण कोरिया की राष्ट्रीय बैडमिंटन टीम के साथ 5 साल तक (2013 से 2018) कोच के रूप में जुड़े हुए थे.
पार्क सिंधु के कोच के रूप में तब जुड़े, जब सिंधु 2019 में वर्ल्ड चैंपियन का ख़िताब जीत चुकी थीं लेकिन उनकी उस वक़्त की कोच किम जी ह्युं को अपने पति की तबीयत ख़राब होने के चलते वापस दक्षिण कोरिया जाना पड़ा.
पार्क जानते थे कि सिंधु के गेम में अगर कोई कमज़ोरी है, तो वह है उनका डिफ़ेन्स और नेट गेम.
लॉकडाउन में सिंधु की कमियों पर किया काम
जब कोरोना वायरस के चलते पूरी दुनिया में लॉकडाउन के चलते सभी खेल प्रतियोगिताएँ बंद कर दी गईं, तब पार्क ने सिंधु की इन्हीं दो कमियों पर काम करना शुरू किया.
सबसे पहले तो सिंधु का ट्रेनिंग बेस बदला. हैदराबाद की गोपीचंद अकादमी से सिंधु गच्चीबोली स्टेडियम में शिफ्ट कर गईं.
यह एक महत्वपूर्ण बदलाव था क्योंकि गच्चीबोली स्टेडियम, टोक्यो के स्टेडियम से मिलता जुलता है, इसलिए ये एक तरह से ओलंपिक की नक़ल की तरह था. इस स्टेडियम में प्रैक्टिस करने से सिंधु को शटल की हवा में जो ड्रिफ्ट होती है, उसे समझने और उस पर काम करने का मौक़ा मिला.
साथ ही सिंधु की फिटनेस पर भी काम हुआ जो उनके डिफ़ेंस को मज़बूत करने के लिए बहुत ज़रूरी था.
सिंधु की अच्छी लंबाई अटैकिंग गेम के लिए अच्छी है, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वियों ने अक्सर उन्हें नेट के पास ड्रॉप शॉट्स से इसका लाभ भी उठाया है. लंबे खिलाड़ियों को नेट के पास ड्रॉप शॉट्स को रिटर्न करने में मुश्किल भी होती है और काफी ताक़त और ऊर्जा भी ख़र्च होती है.
टोक्यो ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल मुक़ाबले में जापान की अकने यामागुची ने कई बार ड्रॉप शॉट्स खेले, लेकिन सिंधु ने बेहतरीन बचाव किया. इस मैच से साबित हो गया था कि सिंधु को अब नेट गेम में फँसाना आसान नहीं होगा.
क्योंकि पार्क ख़ुद ओलंपिक खेलों में क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं पहुँचे थे, इसलिए सिंधु का सेमी फइनल में पहुँचना, उनके लिए एक यादगार पल था.
सिंधु की जीत पर क्या बोले पार्क
सेमी फइनल में चीनी ताइपे की खिलाड़ी ताई ज़ू जिंग को हराना बेहद मुश्किल काम था लेकिन सिंधु ने ज़बरदस्त खेल दिखाया. वो चाहे मैच हार गईं लेकिन इस मैच के बाद ये स्पष्ट था कि सिंधु की अटैकिंग गेम में भी पार्क ने काफ़ी बदलाव लाया है. सिंधु बैक कोर्ट से भी अच्छा खेल रही थीं और यही उनके कांस्य पदक के मैच में बहुत काम आया.
जहाँ सिंधु भारत के खेल इतिहास में दो बार ओलंपिक मैडल जीत कर सबसे सफल महिला खिलाड़ी बन गईं, वहीं पार्क के लिए भी यह अद्भुत क्षण था.
सिंधु की जीत के बाद उन्होंने कहा, "आज से पहले मैंने ख़ुद एक खिलाड़ी के तौर पर या एक कोच के रूप में कभी ओलंपिक मेडल नहीं जीता है, इसलिए मेरे कोचिंग करियर के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण क्षण है. इस वक़्त ये बता पाना बेहद मुश्किल है कि ये सफलता मेरे लिए क्या मायने रखती है. हमने सिंधु की नेट गेम और डिफ़ेंस पर जो काम किया उसका रिजल्ट टोक्यो में देखने को मिला, इसलिए ये काफ़ी संतोषजनक है."
सिंधु कहती हैं कि पार्क के साथ उनका अच्छा तालमेल है और वो एक दूसरे की आँखों से पहचान लेते हैं कि क्या कहना चाह रहे हैं.
सिंधु अपने पहले कोच महबूब अली से लेकर दक्षिणी कोरियाई पार्क तक तीन विदेशी प्रशिक्षकों के साथ ट्रेनिंग कर चुकी हैं.
2016 के रियो ओलंपिक के रजत पदक जीतने तक सिंधु भारत के जाने-माने बैडमिंटन कोच पी गोपीचंद के साथ थीं, उसके बाद सिंधु ने इंडोनेशिया के मुल्यो हंड्यो और कोरिया के किम जी ह्युं के साथ भी ट्रेनिंग की है.
(पीटीआई के खेल पत्रकार अमनप्रीत सिंह से बातचीत पर आधारित )
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