यशपाल शर्मा: 1983 वर्ल्ड कप के हीरो जिन पर आख़िरी वक़्त तक रहा क्रिकेट का जुनून

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- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
मंगलवार की सुबह टीवी स्क्रीन पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ आई. साल 1983 में विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट जीतने वाली भारतीय टीम के अहम खिलाड़ी यशपाल शर्मा का ह्रदय गति रूक जाने से निधन हो गया है.
यशपाल शर्मा 66 साल के थे. यह दुखद समाचार सुनकर यक़ीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है क्योंकि यशपाल शर्मा पूर्ण रूप से स्वस्थ दिखाई देते थे.
कुछ दिन पूर्व ही वह एक स्पोर्ट्स चैनल पर लगातार आईपीएल और उसके बाद भारत-इंग्लैंड टेस्ट सिरीज़ के अलावा भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच खेले गए विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल मैच पर भी विशेषज्ञ के तौर पर टिप्पणी दे रहे थे.

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मेरे एक मित्र जो उन्हीं के साथ कार्यक्रम कर रहे थे उन्होंने मुझे बड़े जोश के साथ बताया कि पिछले दिनों यशपाल शर्मा अपने साथ 1983 में इंग्लैंड में जीते गए विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट के फ़ाइनल में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए गए विकेट को लेकर आए थे और फ़िर उस विकेट के साथ फ़ोटो भी खिंचवाई.

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यादगार करियर
यशपाल शर्मा के अकस्मात निधन से जहां उनका भरा-पूरा ओजपूर्ण चेहरा आंखों के सामने आ रहा था, वहीं पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान का चेहरा भी ऑंखो के सामने घूमने लगा क्योंकि उनके निधन का समाचार भी ऐसे ही अचानक मिला था. दोनों के व्यक्तित्व में ग़ज़ब की समानता थी. दोनों बेहद उर्जावान थे और हमेशा शानदार परिधान के शौक़ीन भी.
यशपाल शर्मा साल 1978 से लेकर साल 1985 तक भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य रहे. उन्होंने साल 1979 में इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अपना पहला और साल 1983 में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ अपना आख़िरी टेस्ट मैच खेला.
उन्होंने 37 टेस्ट मैच में दो शतक और नौ अर्धशतक की मदद से 1606 रन बनाए. यशपाल शर्मा ने 42 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच भी खेले, जिनमें उन्होंने चार अर्धशतक की मदद से 883 रन बनाए. प्रथम श्रेणी में तो यशपाल शर्मा ने 21 शतक और 46 अर्धशतक की मदद से 8933 रन बनाए.
वर्ल्ड कप के हीरो
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यशपाल शर्मा 1983 में हुए विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में भारत की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले खिलाड़ी इसलिए माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने सेमीफ़ाइनल में मेज़बान इंग्लैंड और इससे पहले वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ ज़ोरदार अर्धशतकीय पारी खेली थी.
यशपाल शर्मा को पिच पर जमकर खेलने वाले बल्लेबाज़ के रूप में जाना जाता था. वह बेहद हाई लिफ़्ट के साथ बल्लेबाज़ी करते थे यानी गेंद खेलने से पहले उनका बल्ला हवा में उठा रहता था. यशपाल शर्मा एक शानदार फ़ील्डर भी थे. वह अक्सर कवर में फील्डिंग करते थे. इसके अलावा समय पड़ने पर वह विकेटकीपर की भूमिका भी निभाते थे.

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छक्के जड़ने के उस्ताद
यशपाल शर्मा को शायद क्रिकेट और सिर्फ़ क्रिकेट से ही मोहब्बत थी. इसका इससे बढ़कर और क्या सबूत होगा कि वह अंतिम साँस लेने तक क्रिकेट से जुड़े रहे.
अंतराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद वह अंपायर और कमेंटेटर के अलावा क्रिकेट समीक्षक बने.
क्रिकेट से उनका लगाव इतना अधिक था कि वह मौक़ा मिलते ही दिल्ली राज्य क्रिकेट लीग के मैच खेलना नहीं भूलते थे. यशपाल शर्मा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत थे और बैंक की तरफ़ से ही लीग खेलते थे. हमने कई बार उन्हें अरूण जेटली स्टेडियम जो पहले फ़िरोज़शाह कोटला मैदान कहलाता था वहॉ खेलते देखा. उन दिनों फ़िरोज़शाह कोटला मैदान के मुख्य मैदान के अलावा कोटला नंबर दो के नाम से एक और मैदान था जिसके चर्चे चलने पर पुराने स्कोरर बताते थे कि यहां यशपाल शर्मा ने दोहरा शतक भी लगाया है. कोटला नंबर दो चौड़ाई में बेहद कम था जिसकी वजह से वहां ख़ूब चौक्के छक्के लगते थे.

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दिलीप कुमार को श्रेय
एक खिलाड़ी के रूप में कामयाब होने के बाद वह अंपायर भी बने. यशपाल शर्मा और मनिंदर सिंह ने नब्बे के दशक में अंपायरिंग का लेवल वन कोर्स सफलतापूर्वक पूरा किया था.
यशपाल शर्मा ने घरेलू क्रिकेट में ढेरों रन बनाए जिसके आधार पर उनका चयन भारत के लिए हुआ लेकिन वह इसका श्रेय पिछले दिनों दिवंगत हुए फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार को देते थे. यशपाल शर्मा कहते थे कि एक रणजी ट्रॉफ़ी मैच में उनकी बल्लेबाज़ी से प्रभावित होकर दिलीप कुमार ने उनके नाम की सिफ़ारिश बीसीसीआई के सदस्य राजसिंह डूंगरपुर से की थी. यशपाल शर्मा को दिलीप कुमार की फ़िल्म क्रांति बेहद पसंद थीं जिसका कैसेट वह विदेशी दौरे में भी साथ रखते थे.
यशपाल शर्मा बीसीसीआई की चयन समिति में भी रहे. उन्होंने उस समय भारत के कप्तान सौरव गांगुली को उनकी पसंद की टीम चुनने में मदद की. यशपाल शर्मा कभी भी किसी खिलाड़ी कीं तीखी आलोचना नहीं करते थे.

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जूनियर खिलाड़ियों का रखते थे ध्यान
फ़िलहाल भारत के पूर्व क्रिकेटर चेतन शर्मा बीसीसीआई की चयन समिति के अध्यक्ष है. चेतन शर्मा ने उनके कहने पर ही क्रिकेट खेलना शुरू किया. यशपाल शर्मा रिश्ते में चेतन शर्मा के मामा लगते थे.
यशपाल शर्मा अक्सर टीवी पर कई शो में साल 1983 में विश्व कप जीतने वाली टीम के खिलाड़ियों के साथ दिख जाते थे. वह इस टीम को अपना परिवार मानते थे और कहते थे कि वह सब फ़ोन के माध्यम से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं.
यशपाल शर्मा के साथी क्रिकेटर उन्हें एक ज़िंदादिल इंसान के तौर पर याद करते हैं जिनके पास ख़ूब क़िस्से कहानियाँ थी. टीवी चैनल पर भी वह लगभग समझाने वाले अंदाज़ में ही बात करते थे.
यशपाल शर्मा खिलाड़ियों का बेहद ध्यान रखते थे ख़ासकर जूनियर खिलाड़ियों का. हमें याद हैं कि एक बार वह भारत की जूनियर टीम जो विश्व कप के लिए दिल्ली में तैयारी कर रही थी उसकी देखरेख कर रहे थे. अचानक हमने देखा कि वह बहुत ग़ुस्से से स्टेडियम की कैंटीन के स्टॉफ को डॉट रहे थे और कह रहे थे कि इतनी गर्मी है, सब बच्चों को लस्सी, दूध, जूस और सारा खाना बेहतर मिलना चाहिए.

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1983 वर्ल्ड कप में कभी टिककर नहीं बैठे
यशपाल शर्मा एक तरफ़ जहॉ बेहद मिलनसार थे और सबसे हंसकर मिलते थे वहीं वह मीडिया से भी मर्यादित दूरी बनाकर रखते थे. वह साफ़ कहते थे कि बात ही बात में कुछ और बात ना बन जाए इसलिए वह बहुत कम और अपने जानकार पत्रकारों से ही बात करते थे.
1983 के विश्व कप के तो बहुत से क़िस्से हैं लेकिन उन्होंने अपने से जुड़ी एक बात हमें बताई थी. दरअसल दिल्ली के प्रगति मैदान के एक रेस्तराँ में डीडीसीए ने अंपायरों का एक सम्मेलन कराया जिसमें पूर्व कप्तान कपिल देव भी थे. शाम के समय रेस्तराँ में ही एक फ़व्वारे के पास यशपाल शर्मा नाश्ते का आन्नद ले रहे थे. उन्होंने कहा कि 1983 में विश्व कप में मिली जीत का रहस्य हर खिलाड़ी को अपने ऊपर होने वाला भरोसा था. आगे उन्होंने कहा कि मुझे कभी भी ड्रैसिंग रूम में टिककर बैठने की आदत नहीं थी. वह हमेशा इधर से उधर घूमते रहते थे. उन्हें लगता था उनके बैठने से भारत का कोई विकेट गिर जाएगा.
भारत के लिए इतनी चिंता करने वाले यशपाल शर्मा अब हमारे बीच नहीं है, विश्वास नहीं होता कभी टिककर नहीं बैठने वाले का दिल ऐसे भी बैठ सकता है कि वह दोबारा धड़के ही नहीं.
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