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IPL 2020: राजस्थान रॉयल्स की ‘टैबू’ तोड़ने की मुहिम
- Author, वंदना
- पदनाम, भारतीय भाषाओं की टीवी एडिटर
उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव में लड़कों से दंगल करती एक लड़की और वहाँ से राष्ट्रमंडल खेलों और एशियन गेम्स में मेडल जीतने तक का सफ़र.
इस सफ़र में 22 साल की पहलवान दिव्या काकरन ने कई चुनौतियाँ पार की हैं, वो भी कुश्ती जैसे पुरुष प्रधान खेल में.
पर एक चुनौती ऐसी है जिससे कई महिला खिलाड़ी अब भी जूझ रही हैं और वो है पीरियड्स और इस पर छाई रहने वाली चुप्पी.
दिल्ली के एक जिम में सुबह की प्रैक्टिस के बाद दिव्या जब इस मुद्दे पर बात करती हैं तो खुल कर बोलती हैं.
दिव्या बताती हैं, "कई बार लड़कियाँ अपने कोच को नहीं बता पातीं कि हमें ये प्रॉब्लम है. ऊपर से टॉयलट भी अच्छे नहीं होते कि जाकर पैड चेंज करें. अब बार-बार कोच को क्या बोलें. डर लगा रहता है कि ट्रेनिंग के बीच कपड़े गंदे न हो जाएँ.अलग ही हिचकिचाहट रहती है. कोच को अगर पता रहता था कि हमें ये प्रॉब्लम है तो वो मैट पर चढ़ने नहीं देते थे. वो सोचते हैं कि हम साफ़ नहीं हैं. मंगलवार को अखाड़े में प्रसाद बाँटते हैं..तो लेने नहीं देते थे."
अब भले ही दिव्या एक नामी खिलाड़ी हो गई हैं और उन्हें ऐसी दिक्क़तों का सामना कम करना पड़ता है लेकिन दिव्या जैसी कई लड़कियाँ हैं जो खेल के दौरान इस समस्या से गुज़रती हैं.
माहवारी और खिलाड़ियों को लेकर दोबारा बहस इसलिए भी शुरू हुई है क्योंकि इस बार आईपीएल टीम राजस्थान रॉयल्स ने सैनिटरी पैड बनाने वाली कंपनी नाइन के साथ डील की है. ऐसा करने वाली वो चंद स्पोर्ट्स टीमों में से एक है.
क्या कहना है टीम प्रबंधन का
राजस्थान रॉयल्स के सीओओ जेक लश मैक्क्रम ने बीबीसी से बातचीत में बताया, "नामी खिलाड़ियों का इस मुद्दे पर बात करना बड़ी पहल है. रॉबिन उथप्पा, बेन स्टोक्स, स्टीव स्मिथ ये खिलाड़ी युवाओं के लिए हीरो हैं, लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए. जब ये लोग पीरियड्स, माहवारी पर बात करेंगे... तो इस चर्चा को घर-घर ले जाना आसान होगा."
समस्या मानसिकता के साथ-साथ हाइजीन से भी जुड़ी हुई है. सुनीता गोदारा अंतरराष्ट्रीय मैराथन रनर रह चुकी हैं और अब युवा खिलाड़ियों को कोचिंग देती हैं.
वो कहती हैं, "ट्रेनिंग के दौरान खिलाड़ियों को बहुत पसीना आता है. महिला खिलाड़ियों को ये बताना ज़रूरी होता है कि हर ट्रेनिंग के बाद पैड बदलना चाहिए वरना कई तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं या घाव हो सकते हैं. लेकिन बहुत बार, ख़ासकर छोटी जगहों पर इस बारे में बात नहीं की जाती क्योंकि कोच और खिलाड़ी दोनों झिझकते हैं."
हालात बदलने के लिए सुनीता गोदारा के कुछ सुझाव हैं.
उनका कहना है, "पहले तो कोच को मामले की संवेदनशीलता समझाना ज़रूरी है. कोच और खिलाड़ी दोनों के लिए सेशन होने चाहिए, उसमें वरिष्ठ महिला खिलाड़ी को शामिल करें, डॉक्टर को शामिल करें."
"कोच को लगता होगा कि लड़कियाँ बहाना कर रही हैं पर दरअसल वो इसलिए ट्रेनिंग मिस कर देती हैं क्योंकि उनके पीरियड्स चल रहे होते हैं और वो किसी को बता नहीं पातीं."
दिव्या काकरन सवाल करती हैं कि खिलाड़ी के लिए तो एक-एक दिन अहम होता है पर कई बार लड़कियाँ महीने में 4-5 ट्रेनिंग मिस कर देती हैं क्योंकि उन्हें बताने वाला कोई नहीं होता कि उस दौरान ट्रेनिंग को बेहतर तरीके से कैसे मैनेज करना है.
माहवारी के प्रति सामाजिक रवैया न सिर्फ़ खिलाड़ियों के प्रदर्शन को प्रभावित करता है बल्कि इस बात पर भी असर डालता है कि वो कौन से खेल चुनती हैं.
महिला खिलाड़ियों की मुश्किल
बीबीसी ने साल 2020 में भारत के 14 राज्यों में खेल से जुड़ा सर्वे किया था जिसके मुताबिक, 25 फ़ीसदी लोगों ने ये कहा कि कुछ ख़ास खेल महिलाओं के लिए ठीक नहीं हैं और उसका एक कारण माहवारी था.
वहीं, बीबीसी के एलीट ब्रिटिश स्पोर्ट्सवुमेन सर्वे के मुताबिक, 60 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि पीरियड्स की वजह से उनका प्रदर्शन प्रभावित हुआ और उन्होंने इसकी वजह से ट्रेनिंग या प्रतियोगिता छोड़ी थी. 40 फ़ीसदी ने कहा कि कोच के साथ इस बारे में बात करने में वो असहज महसूस करती हैं.
सैनिटरी पैड फेंकने के लिए अलग से डिब्बे न होना, खेल के दौरान सफ़ेद कपड़े.. ऐसी कई दिक़क्तों का ज़िक्र महिला खिलाड़ियों ने किया है.
एक खिलाड़ी ने बीबीसी को बताया, "जब मैं युवा थी, तो ये मेरे लिए बड़ी समस्या थी. मैं हर प्रतियोगिता में टॉयलेट पेपर साथ लेकर जाती थी कि पता नहीं वहाँ मिले न मिले. ऐसे शौचालय भी होते थे जिनके दरवाज़े नहीं होते थे."
कई देशों में माहवारी के दौरान महिला खिलाड़ियों की मदद के लिए टेक्नॉलजी का सहारा लिया जा रहा है.
जुलाई 2019 में अमरीकी फ़ुटबॉल टीम ने वर्ल्ड कप जीता था. उनकी सफलता का एक कारण यह भी माना गया कि ऐप के ज़रिए हर महिला खिलाड़ी के पीरियड्स को ट्रैक किया जाता था और उसी हिसाब से उनकी डाइट और ट्रेनिंग रखी जाती थी.
कोच सुनीता गोदारा कहती हैं, "भारत में भी जब कैंप में खिलाड़ियों की प्रोफ़ाइलिंग होती है तो महिला खिलाड़ियों के लिए पीरियड्स का भी कॉलम होना चाहिए. ऐसे में अगर लड़कियाँ हिचकती भी हैं तो कोच को ख़ुद से ही पता रहेगा और वो उनकी ट्रेनिंग और डाइट का ध्यान रख पाएँगे."
क्या है चुप्पी की वजह
माहवारी को लेकर खेल जगत में किस कदर चुप्पी रही है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसी सैनिटरी पैड को टूर्नामेंट का स्पॉन्सर बनाने के बारे में कुछ साल पहले तक सोचा भी नहीं जा सकता था.
बात 1995 की है जब महिला टेनिस एसोसिएशन टूर ने महिलाओं के लिए सैनिटरी प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी से करार करने से सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि इससे छवि पर बुरा असर पड़ेगा.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने हेडलाइन छापी थी, "टेनिस: छवि के चक्कर में महिला टेनिस डील डूबी."
जबकि एक अन्य अख़बार की सुर्खी थी, "टेनिस टूर ने दिखाया कि महिलाओं का हाइजीन अब भी एक निजी मामला ही है." ('Tennis tour shows female hygiene's still a private enterprise').
न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक मार्टिना नवरातिलोवा ने कहा था, "खिलाड़ी इसका समर्थन करना चाहते थे. लेकिन हम अपने लोकल स्पॉन्सर को नहीं खो सकते थे जहाँ से 35 मिलियन डॉलर आते हैं क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि वुमेन टेनिस एसोसिएशन एक सैनिटरी ब्रैंड के साथ जुड़े. इसे स्टिगमा की तरह नहीं देखना चाहिए लेकिन ऐसा है."
तब से लेकर अब तक चीज़ें बदली हैं. आप टीवी पर सैनिटरी पैड के विज्ञापन देखते हैं. 2009 में सरीना विलियम्स ने एक कंपनी के लिए विज्ञापन किया जो महिलाओं के लिए सैनिटरी प्रोडक्ट बनाती है. भारत में साइना नेहवाल और पीवी सिंधु विज्ञापन कर चुकी हैं.
यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 42 फ़ीसदी लड़कियों के पास माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड जैसे सुरक्षित माध्यम उपलब्ध नहीं हैं.
इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से भाषण में सैनिटरी पैड पर बात करते हुए कहा था कि पाँच करोड़ महिलाओं को एक रुपये में पैड मुहैया करवाए गए हैं.
लाल किले से भाषण में सैनिटरी पैड शब्द शायद पहले नहीं सुना गया.
ये सांकेतिक या सिम्बॉलिक क़दम हो सकता है. पर उम्मीद यही है कि इसी बहाने माहवारी जैसे मुद्दों पर खुले में बहस होती रही.
दिव्या काकरन भी अपनी बात कुछ यूँ ही समेटती हैं, "आख़िर, माहवारी एक स्वभाविक प्रक्रिया है, तो महिला खिलाड़ियों से अलग बर्ताव क्यों हो? अगह हमें और ओलंपिक मेडल जीतने हैं तो ऐसी बातों से ऊपर उठकर खेलना होगा."
दिव्या जिन्होंने इस मुद्दे पर जागरूक करने के लिए अपनी माँ, दादी और कोच को भी समझाया और आज वो अर्जुन पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम उम्र की खिलाड़ियों में से एक हैं. उन्होंने इस साल एशियन कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड तो जीता ही है, अब तैयारी अगले ओलंपिक की है.
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