साइना के साथ कोर्ट पर जंग तो होनी ही चाहिए: पीवी सिंधू

    • Author, सूर्यांशी पांडेय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बॉलीवुड की फ़िल्म की तरह साल 2018 पीवी सिंधु के लिए 'हैप्पी एंडिंग' लेकर आया.

जैसे फ़िल्म में ड्रामा, सस्पेंस के बाद अंत में सब ठीक हो जाता है, ठीक उसी तरह सात टूर्नामेंट में फ़ाइनल में पहुंचने के बाद भी पीवी सिंधु को जीत हासिल नहीं हुई थी, लेकिन साल के अंत में बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स का मुक़ाबला उन्होंने अपने नाम कर लिया.

सिंधु, ये नाम अब बैडमिंटन खेल के साथ मज़बूती से जुड़ गया है. वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स का मुक़ाबला जीतकर सिंधु ने इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया.

वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स का ख़िताब जीतने वाली वह पहली भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं.

बीते साल में इस उपलब्धि के बाद सिंधु से एक मुलाक़ात तो ज़रूरी थी.

इस मुलाक़ात में सिंधु ने अपनी निजी ज़िंदगी से लेकर साइना नेहवाल के साथ अपनी खट्टी-मिठी 'दोस्ती' का भी ज़िक्र किया

आप 23 साल की उम्र में बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स का मुक़ाबला जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं हैं, वर्ल्ड रैंकिंग में तीसरे स्थान पर हैं तो यह सारी सफलता जश्न से ज़्यादा ज़िम्मेदारी तो नहीं लगती आपको?

ज़िम्मेदारी तो लगती है. बहुत ख़ुश हूं कि साल का अंत होते-होते मैं ये टूर्नामेंट जीत पाई और वो भी ऐसा करने वाली पहली भारतीय बनी. साल 2018 में मैं कई टूर्नामेंट में फ़ाइनल्स तक भी पहुंची, तो नए साल में इसी ऊर्जा से आगे बढ़ूंगी.

2018 में 7 फ़ाइनल्स में आप पहुंचीं लेकिन सभी में रनर-अप रहीं, फ़ैन्स भी काफ़ी निराश थे. अख़बारों में लिखा जाने लगा कि सिंधु को 'फ़ाइनल-फ़ोबिया' है. इन आलोचनाओं से कैसे निपटीं?

हां, इस बात का मलाल है कि कई अहम मौक़ों पर मैं फ़ाइनल्स में आकर रनर-अप रही, लेकिन आप अगर इसे इस तरह से देखें कि मैं फ़ाइनल्स तक पहुंची. मुझे बुरा तब ज़्यादा लगता जब मैं पहले ही राउंड में बाहर हो जाती. कम से कम इस बात का सुकून था कि मैं अंत तक लड़ी. आप देखें तो 2018 के आख़िर में आकर मैंने बीडब्ल्यूएफ़ वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स का मुक़ाबला जीता. नए साल में मेरा जवाब यही रहेगा कि अब 'नो मोर सिल्वर!'

क़िस्मत की बात की है आपने. लेकिन 23 साल में इतनी उपलब्धि हासिल करना क़िस्मत से ज़्यादा मेहनत की बात है. पिता वॉलीबॉल प्लेयर थे, फिर बैमिंटन का रैकेट कैसे पकड़ा?

हां, 8 साल की उम्र में मैंने बैडमिंटन खेलना शुरू किया था. मेरे माता-पिता दोनों ही वॉलीबॉल प्लेयर रहे तो कई लोग ये पूछते भी थे कि मैं वॉलीबॉल में क्यों नहीं गई. बैडमिंटन चुनना मेरा निजी फ़ैसला था. मेरे माता-पिता ने कभी नहीं रोका, बल्कि हर वक़्त मेरा साथ दिया और चूंकि वह ख़ुद प्लेयर्स हैं तो उन्हें पता रहता है कि कब-कब मुझे सपोर्ट की ज़रूरत होती है.

कोर्ट पर आप बहुत आक्रामक रहती हैं और पुलेला गोपीचंद भी कहते हैं कि आप आक्रामक खिलाड़ी हैं, तो आप गोपीचंद की कोचिंग शैली के बारे में क्या सोचती हैं?

देखिए, खेल के दौरान और प्रैक्टिस के दौरान कोर्ट पर कोच को सख़्त रहना ही पड़ता है क्योंकि वह हमें विश्व स्तर के लिए तैयार करने की कोशिश में लगे रहते हैं. लेकिन कोर्ट के बाहर वह काफ़ी कूल रहते हैं. सभी प्लेयर्स के साथ हंसी-मज़ाक़ करते हैं.

गोपीचंद की एकेडमी से पहले आपने भारतीय रेलवे के कोर्ट पर भी बैडमिंटन खेला था और वहां आपके कोच रहे थे महबूब अली...उनकी कोई याद जो आज भी ज़हन में ताज़ा है?

मैंने सही माइनों में महबूब अली के साथ ही बैडमिंटन का सफ़र शुरू किया था. उन्होंने मुझे बैडमिंटन की बारीकियां जैसे ग्रिप, मूवमेंट्स आदि सिखाईं.

साइना नेहवाल के साथ जब पीवी सिंधु खेलती हैं..चाहे उनके ख़िलाफ़ हो या साथ, कहा जाता है कि दोनों एक-दूसरे की 'दुश्मन' हैं...क्या वाक़ई ऐसा है?

मुझे लगता है कि कोर्ट पर ऐसी जंग रहनी चाहिए जिससे प्रतिस्पर्धा की भावना बनी रहे. ऐसे में जब हम एक दूसरे के ख़िलाफ़ खेलते हैं तो आप कह सकते हैं कि हम दुश्मन की तरह रहते हैं. और वह ज़रूरी भी है. कोर्ट से बाहर हम एक दूसरे के साथ ठीक हैं.

आप और साइना 2014 में हुए उबर कप में एक बार साथ डबल्स खेली थीं, तो दोबारा मौक़ा मिला तो क्या आप उनके साथ खेलेंगी?

उबर कप में जो हम एक बार साथ खेले थे वो इसलिए खेले थे क्योंकि वो टीम इवेंट था. अगर दोबारा साथ खेलना पड़े और कोई दूसरा खिलाड़ी नहीं मिला तो ज़रूर!

कोर्ट की बहुत बात हुई, वहाँ तो आप आक्रामक रहती हैं, लेकिन घर में किसकी डांट से सबसे ज़्यादा डर लगता है मां की या पिता की?

पहली बात तो मैं ज़्यादा घर में रहती ही नहीं क्योंकि इतने टूर्नामेंट्स होते हैं. लेकिन आजकल थोड़ा वक़्त निकालकर घर में रहती हूं तो अपने भांजे के साथ समय बिताती हूं. 5 साल का है वो. उसके साथ समय बिताती हूं तो बहुत सुकून मिलता है.

आपकी बहन पीदिव्या अलग तरह का खेल खेलती हैं और आप बैडमिंटन खेलतीं हैं तो आप दोनों किस तरह घर में समय बिताती हैं?

वो पहले खेलती थी, अब वह गायनेकोलॉजिस्ट है. उसने डॉक्टरी की पढ़ाई करके ये प्रोफ़ेशन चुना है. हम दोनों के बीच सात साल का अंतर है लेकिन आप कह सकती हैं कि मैं और मेरी बहन बहुत अच्छी दोस्त हैं. हम दोनों एक-दूसरे से सब कुछ शेयर करते हैं. वह मुझे सलाह भी देती रहती है.

वर्ल्ड टूर फ़ाइनल्स में आपने सबको हरा दिया, यहां तक कि नंबर एक खिलाड़ी ताई ज़ू यिंग को भी. चीन और जापान के खिलाड़ियों में ऐसी क्या बात है जो उन्हें चोटी का खिलाड़ी बनाती है?

देखिए आजकल खिलाड़ी चाहे जिस देश का हो, हर एक की अपनी खेलने की शैली है. हम एक ही तरीक़े के साथ हर खिलाड़ी के साथ नहीं खेल सकते. सबके साथ अलग-अलग स्ट्रैटेजी के साथ खेलते हैं. ताई ज़ू यिंग वो डिसेप्टिव तरीके से खेल खेलतीं है, अकाने यामागुची या फिर नोज़ोमी ओकुहारा हैं वह रैली-प्लेयर्स हैं. तो सबके ख़िलाफ़ अलग शैली अपनानी पड़ती है.

एक बात और है, विश्व रैंकिंग के पहले 15 खिलाड़ी कई माइनों में एक-दूसरे के बराबर हैं. यानी कि उस रैंकिंग के किसी भी खिलाड़ी के साथ आप खेलोगे तो आपको उनको हराने के लिए उतनी ही मेहनत करनी होगी जितनी कि पहले पायदान पर बैठे खिलाड़ी को हराने के लिए करनी होती है. सबसे ज़रूरी बात ये है कि जितना हम विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेलेंगे उतना ही हम उनके खेल को समझेंगे. तो उस दिन कोर्ट पर जो बेहतर खेलता है वह जीत जाता है.

प्रीमियर बैडमिंटनलीग में हैदराबाद हंटर्स की ज़िम्मेदारी पिछले साल कैरोलिना मारिन के कंधों पर थी और टीम ने प्रीमियर बैडमिंटन लीग का ख़िताब भी जीता, इस साल हैदराबाद हंटर्स की ज़िम्मेदारी आप पर है. क्या टीम इतिहास दोहरा पाएगी?

टीम में सब फ़ाइटर हैं. सब जीतने के लिए आए हैं. हम एक टीम की तरह खेलेंगे, जीत जाएंगे तो अच्छा है लेकिन हमारा लक्ष्य है कि अपने खेल को सही तरह और मज़े लेते हुए खेलना.

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