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लुका मॉडरिच: युद्ध और मुश्किलों ने बनाया दुनिया का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी
साल 2018 का फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप कई मायने में ख़ास रहा. वर्ल्ड कप जीतकर चैंपियन भले ही फ्रांस की टीम बनी हो लेकिन दिल क्रोएशिया ने जीता.
सेमीफ़ाइनल मैच में जब क्रोएशिया ने इंग्लैंड पर ज़बरदस्त जीत हासिल की तो टीम के एक प्रशंसक से सवाल पूछा गया कि क्या क्रोएशिया फ्रांस के साथ फ़ाइनल मैच में प्रेशर झेल पाएगा.
इस सवाल के जवाब में प्रशंसक ने कहा, ''आप लुका मॉडरिच को जानते हैं. वो बारूदी सुरंगों के बीच बिना डरे फ़ुटबॉल खेला करते थे. ठीक उनकी तरह ही हम भी डरते नहीं.''
मॉडरिच के खेल और उनके प्रति लोगों के प्यार का अंदाज़ा इस बयान लगाया जा सकता है.
युद्ध के बीच बड़ा हुआ एक बच्चा
हाल ही में क्रोएशियाई खिलाड़ी लुका मॉडरिच ने पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनॉल्डो और अर्जेंटीना के खिलाड़ी लियोनल मेसी को पीछे छोड़कर साल 2018 के फ़ीफा बेस्ट प्लेयर का ख़िताब जीता है.
लुका को 'चाइल्ड ऑफ वॉर' कहा जाता है यानी एक बच्चा जो युद्ध के हालात में पला-बढ़ा.
लंदन के रॉयल फेस्टिवल हॉल के एक भव्य समारोह में ट्रॉफ़ी हाथ में लेने तक लुका ने एक बेहद लंबा सफ़र तय किया है. इस सफ़र में उन्होंने 1991 की वो ख़ूनी जंग देखी है जो क्रोएशिया और स्लोवेनिया के यूगोस्लाविया से ख़ुद को स्वतंत्र कराने के बाद शुरू हुई थी.
अपने दौर के कई बच्चों की तरह इस हिंसा में लुका मॉडरिच ने शरणार्थी का जीवन बिताया.
लुका मॉडरिच जब छोटे थे तो क्रोएशियाई बंदरगाह जडार की सड़कों पर फुटबॉल खेला करते थे. यहां किक मारने के लिए वो तब रुकते जब सर्बिया की ओर से बमबारी की जाती थी.
अपनों को ख़ोने का ग़म और फ़ुटबॉल
लुका मॉडरिच के लिए फ़ुटबॉल खेलना अपनों को खोने के ग़म को कम करने का एक तरीका बन गया.
उन्होंने अपने दादा और परिवार वालों को सर्बियाई हमले में खो दिया था. उस दौर में बच्चों को शरणार्थी कैंपो से ज़्यादा दूर न जाने की हिदायत दी जाती थी. उन्हें किसी भी सामान के पास जाने की मनाही थी क्योंकि इनके बम होने का खतरा बना रहता था.
साल 2008 में एक बार युद्ध के बारे में बात करते हुए मॉडरिच ने कहा था, ''मैं महज छह साल का था और वो बेहद कठिन वक़्त था. मेरे ज़ेहन में वो यादें अब भी बिलकुल ताज़ा हैं लेकिन ये ऐसा कुछ है जिसे आप कभी याद नहीं करना चाहेंगे.''
'युद्ध ने मुझे मज़बूत बनाया'
लुका मॉडरिच एक क्रोएशियाई हैं और इस देश की जनसंख्या लगभग 40 लाख है.
युद्ध के ज़िक्र पर लुका मॉडरिच कहते हैं, ''युद्ध ने मुझे मजबूत बनाया. मैं हमेशा युद्ध को खुद के साथ जोड़े नहीं रखना चाहता लेकिन मैं अपने जीवन के उस हिस्से को भूलना भी नहीं चाहता.''
इस बार इस छोटे से देश ने फ़ुटबॉल की दुनिया के सबसे बड़े खिताब के लिए फ़ाइनल मैच खेला. इससे पहले साल 1950 में उरूग्वे ने विश्व कप का फाइनल मैच खेला था.
छोटी सी टीम और बड़ा कमाल
विश्व कप 2018 में इंग्लैंड और क्रोएशिया के बीच सेमीफाइनल मैच के दिन क्रोएशियाई अख़बार 'जूटारंजी' ने एक संपादकीय छापा.
अख़बार ने लिखा, '' अपने पसीने, खून, आंसू और पूरी एकता के साथ लड़ो. ''
इसमें आगे लिखा गया था, ''एक छोटा और कम जनसंख्या वाला देश भी बड़ा और प्रसिद्ध हो सकता है अगर वो एक साथ मैदान में उतरें तो.''
लंबी लड़ाई के बाद आज़ादी पाने वाले क्रोएशिया का राष्ट्रवाद कभी-कभी एक अज़ीबोग़रीब शक्ल भी अख्तियार कर लेता है.
विश्वकप की ग्रुप स्टेज में अर्जेंटीना को 3-0 से हराने के बाद क्रोएशियाई खिलाड़ियों ने ड्रेसिंग रूम में वो गाना गाया था जो क्रोएशिया के दक्षिणपंथी चरमपंथी गाया करते थे.
इन आलोचनओं के बाद भी लुका मॉडरिच का हाथ में ट्रॉफी थामना क्रोएशिया के लिए एक गौरवान्वित करने वाला पल है.
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