यहां तालाब में तैरकर तैयार होते हैं इंटरनेशनल तैराक

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- Author, प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
2006 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोहा में आयोजित एशियन गेम्स में भाग लेने वाली प्रियंका यादव अभी दिल्ली के तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में स्वीमिंग कोच हैं.
प्रियंका ने आधा दर्जन राष्ट्रीय स्तर के मेडल प्राप्त किए हैं. बतौर खिलाड़ी प्रियंका अभावों व संघर्षों से जूझती रही हैं.
वह कहती हैं, ''मैंने छह साल की उम्र से ही तैराकी शुरू कर दी थी. गांव के तालाब में हम तैरते जरूर थे, लेकिन वहां न हमें स्वीमिंग की बारीकी सिखाई जाती थी और न कोई कोच होता था. हमें जो और जैसे समझ में आया, सीखा. हमें अच्छी क्वालिटी के स्वीमिंग कॉस्ट्यूम भी नहीं मिलते थे, सस्ते स्वीमिंग कॉस्ट्यूम जल्दी फट जाते थे. शायद स्वीमिंग बहुत लोकप्रिय खेल नहीं है, इसीलिए अभावों ने कभी पीछा नहीं छोड़ा. किसी भी स्तर पर हमें प्रमोट भी नहीं किया गया.''

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हरेंद्र ने पांच साल की उम्र से ही तैराकी शुरू कर दी थी. वह अपने गांव के तालाब में प्रतिदिन चार घंटे से ज़्यादा तैराकी करते थे. उन्होंने राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है.
वह कहते हैं कि संसाधनों के अभाव और बेहतर कोच नहीं होने के कारण उन्होंने अपने तैराकी के सपने को पूरा करने के लिए आर्मी ज्वाइन की. वह इंडियन आर्मी की ओर से सन 2010 में जर्मनी में आयोजित वर्ल्ड मिलिट्री चैंपियनशिप और ब्राज़ील में आयोजित वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स में कुछ प्वाइंट से ही चूके थे. उन्होंने जूनियर नेशनल स्वीमिंग में सिल्वर मेडल सहित नेशनल लेवल की प्रतियोगिताओं में सात मेडल प्राप्त किया है.
हर घर में एक तैराक

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दोनों खिलाड़ी उत्तर प्रदेश के अत्यधिक पिछड़े ज़िले कुशीनगर से क़रीब 20 किलोमीटर दूर देवरिया देहात गांव के रहने वाले हैं.
राष्ट्रीय राजमार्ग- 28 से सटे इस गांव की आबादी दो हज़ार है. गांव ने देश को तीन दर्जन से ज़्यादा तैराक दिए हैं. गांव के हर घर में एक तैराक है.
सन् 1885 में पानी के लिए गांव वालों ने यह तालाब खोदा था जिससे नहाना, धोना, सिंचाई व पेयजल आदि का काम लिया था. बच्चे यहां खूब नहाते व तैरते थे.
नब्बे के दशक में गांव के बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों में जाने लगे तो तालाब की महत्ता समझ में आई. वे विश्वविद्यालयों में होने वाली तैराकी प्रतियोगिता में भाग लेने लगे.
प्रतियोगिताओं में मिले उत्साह और सम्मान के कारण उन्होंने तैराकी को ही अपना लक्ष्य बना लिया. बाद में यहां से कई दर्जन प्रतिभाशाली तैराक निकले जिन्होंने तैराकी के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लिया.

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तैराकी प्रतियोगिता, लेकिन फ़ंड नहीं
क़रीब दो दशकों में इस तालाब में तैराकी सीख कर सीमित संसाधनों के बावजूद आधा दर्जन से ज़्यादा नेशनल और इंटरनेशनल खिलाड़ी तैयार हुए हैं. न सिर्फ़ इस गांव बल्कि आसपास के गांव के बच्चे भी इस तालाब में तैराकी सीखने आते हैं.
यहां हर समय और हर मौसम में तीन सौ से ज़्यादा बच्चे सुबह शाम तैराकी की ट्रेनिंग लेते हैं. ग्राउंड ट्रेनिंग के लिए बच्चे खेतों की मेड़ों पर दौड़ते हैं. तराई क्षेत्र होने के कारण यहां भरपूर पानी है.
स्थानीय पत्रकार उपेंद्र तिवारी कहते हैं, ''अगर इस तालाब को आधुनिक स्वीमिंग पूल में बदल दिया जाए तो पानी की बर्बादी भी नहीं होगी. चारों ओर खेत हैं. स्वीमिंग पूल के पानी को खेतों में बहा दिया जाएगा.''

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नेशनल खिलाड़ी रह चुके और वर्तमान में बच्चों को तैराकी सिखाने वाले कोच पितांबर चैहान कहते हैं कि यहां पर हर साल ज़िला और मंडल स्तर की सरकारी स्कूलों की तैराकी प्रतियोगिता होती है, लेकिन शासन ने तालाब को एक बेहतर स्वीमिंग पूल या संसाधन युक्त बनाने का प्रयास नहीं किया है.
यहां पर अभी भी गांववाले आपस में चंदा करके तालाब के पानी को साफ़ करते हैं या तालाब को ठीक कराते हैं.
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