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पाकिस्तानी क्रिकेट: जानलेवा बीमारी का इलाज सिरदर्द की गोली से
- Author, अब्दुल शकूर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची
साल 2016 के वर्ल्ड टी ट्वेंटी में भारत के ख़िलाफ़ हार के बाद मुझे कोलकाता हवाई अड्डे पर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष शहरयार खान से बात करने का मौका मिला तो उन्होंने यह कहकर हैरान कर दिया था कि इस हार पर उन्हें बेशक निराशा हुई है लेकिन इस टीम से लोगों को अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए क्योंकि यह इस समय विश्व रैंकिंग में सातवें स्थान पर है.
और केवल एक साल बाद चैंपियंस ट्रॉफी में पाकिस्तानी टीम ने भारत के ख़िलाफ़ हार का सामना किया है तो मुझे पाकिस्तानी क्रिकेट में पाई जाने वाली सोच में कोई बदलाव नज़र नहीं आया है, क्योंकि कप्तान सरफराज अहमद मैच से पहले ही यह कह चुके थे कि हमारे पास तो हारने के लिए कुछ है ही नहीं. हम तो इस समय विश्व रैंकिंग में आठवें स्थान पर खड़े हैं.
सवाल यह उठता है कि क्या शहरयार ख़ान और सरफराज अहमद की इस बात को अपनी कमजोरियों और कमियों को विश्व रैंकिंग के तले छिपाने की कोशिश समझा जाए?
अगर वाकई ऐसा है तो पाकिस्तान ने जब टेस्ट मैच में वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ जीत हासिल की तो यह बयान भी सामने आना चाहिए था कि इन उपलब्धियों में जाहिर तौर पर कोई हमारा हाथ नहीं, क्योंकि हमने तो अपने से कमजोर टीम को हराया है.
पाकिस्तानी क्रिकेट की स्थिति यह है कि जानलेवा बीमारी का इलाज सिरदर्द की गोली से किया जा रहा है.
कोई राष्ट्रीय टीम तभी मजबूत नींव पर खड़ी हो सकती है जब उसके सभी पहलू सही दिशा में काम कर रहे हों.
पाकिस्तानी क्रिकेट का सबसे कमजोर विभाग उसकी घरेलू क्रिकेट है जो आज भी चर्चा में उलझी हुई है कि क्षेत्रीय क्रिकेट उपयुक्त है या डिपार्टमेंटल क्रिकेट.
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का पूरे देश में क्रिकेट अकादमियां खुली होने का दावा है. लेकिन यह मामला केवल फोटो सेशन तक ही सीमित है.
नेशनल एकेडमी, टीम प्रबंधन और चयनकर्ताओं के बीच जिस तरह का प्रभावी संपर्क होना चाहिए उसका अभाव दिखता है. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण उमर अकमल की फिटनेस के मामले में दिखता है.
उमर अकमल को पाकिस्तानी टीम के विदेशी ट्रेनर और फिजियो ने फिट घोषित कर दिया था और इसके कुछ ही दिनों बाद एकेडमी के घरेलू ट्रेनर ने भी उमर अकमल को फिट घोषित कर दिया.
इसी आधार पर चयनकर्ताओं ने उन्हें चैंपियंस ट्रॉफी टीम में शामिल कर लिया लेकिन जब वह इंग्लैंड पहुंचे तो प्रमुख कोच मिकी आर्थर ने उनकी फिटनेस पर असंतोष जताते हुए उन्हें स्वदेश वापस भेजने में देर नहीं लगाई.
2015 विश्व कप के बाद सभी टीमों ने अपनी खामियों को स्वीकार कर उन्हें दूर करने की कवायद शुरू कर दी थीं. इन टीमों को अच्छी तरह पता था कि वनडे क्रिकेट के तौर-तरीके बदल गए है और जरूरी बदलाव लाकर ही वे अपनी क्रिकेट में सुधार ला सकते हैं.
इस संबंध में सबसे बड़ा उदाहरण इंग्लैंड की टीम का है जिसके लिए विश्व कप बुरा सपना साबित हुआ था लेकिन अब यही टीम दूसरों के लिए बुरा सपना बन चुकी है.
पाकिस्तानी क्रिकेट के साथ सबसे बड़ा मसला यह है कि एक बड़ी हार के बाद कप्तान या कोच बदलने का नाटक तो किया जाता है लेकिन असल समस्या को जड़ से ख़त्म करने के लिए कुछ नहीं किया जाता.
पाकिस्तानी क्रिकेट का थिंक टैंक अब तक यही निर्धारित नहीं कर सका है कि किस प्रारूप के लिए कौन सा खिलाड़ी उपयुक्त है.
फर्स्ट क्लास क्रिकेट में रन के अंबार लगाने वाले बल्लेबाज को वनडे या टी-ट्वेंटी में शामिल कर लिया जाता है और जो सीमित ओवरों वाले क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, उन्हें टेस्ट टीम में शामिल कर लिया जाता है.
इस कड़ी में नया नाम आसिफ जाकिर है जिन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन किया लेकिन उसका पुरस्कार उन्हें वनडे टीम में शामिल करके दिया गया और वह खेले बिना वेस्टइंडीज से वापस भी आ गए.
आज कल के वनडे में 300 रन आम बात हो गई है, बल्कि 300 रन करके भी टीमें हार रही हैं. जबकि पाकिस्तानी टीम आज भी खेल के वही तरीके अपनाए हुए है जो अब प्रचलन से बाहर हो चुके हैं.
इन बदलावों से यह जरूर होगा कि वरिष्ठ बल्लेबाजों पर गाज गिरेगी लेकिन सच तो यही है कि यह बल्लेबाज मैच विनिंग नहीं बल्कि अपने करियर बचाने वाली पारी खेल रहे हैं.
सरफराज अहमद ने यह बात तो बड़ी आसानी से कह दी कि इस समय पाकिस्तानी टीम आठवें स्थान पर खड़ी है. लेकिन वो ये भूल गए हैं कि नंबर आठ से नीचे नंबर नौ है और अगर पाकिस्तानी टीम नंबर नौ पर आ गई तो उसे 2019 के विश्व कप में भाग लेने के लिए भी ख़ुद को साबित करना होगा.
क्या उस समय भी उनके पास गंवाने के लिए कुछ नहीं होगा.
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