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सोशल: सबरीमला विवाद पर स्मृति ईरानी ने पूछा, ख़ून से भीगा पैड लेकर दोस्त के घर जाएंगे?
"ये तो सिर्फ़ कॉमन सेंस की बात है. क्या आप पीरियड्स के ख़ून में भीगा सैनिटरी नैपकिन लेकर अपने दोस्त के घर जाएंगी? आप नहीं जा सकतीं. और फिर आप सोचती हैं कि भगवान के घर में ऐसा करना सम्मानजनक होगा?"
ये कहना है केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी का.
स्मृति ईरानी ने ये बातें तब कहीं जब मुंबई में आयोजित 'यंग थिंकर्स कॉन्फ़्रेंस' में उनसे केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के बारे में पूछा गया.
स्मृति ने कहा, "मैं मौजूदा वक़्त में कैबिनेट मंत्री हूं इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बारे में कुछ नहीं बोल सकती...मेरा मानना है कि मुझे प्रार्थना करने का अधिकार है लेकिन अपमान करने का नहीं. हमें इसी अंतर को समझना होगा और इसकी इज़्ज़त करनी होगी."
स्मृति ईरानी के इस बयान का वीडियो भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध है. वीडियो इंटरनेट पर आते इस पर चर्चा और बहस होने लगी. साथ ही #SmritiIrani ट्रेंड भी करने लगा.
बहुत से लोग स्मृति के इस बयान को अपरिपक्व और ग़लत बता रहे हैं तो कुछ इसका समर्थन भी कर रहे हैं.
एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, "प्रिय स्मृति ईरानी, कोई मासिक धर्म के ख़ून से भीगा पैड अपने पर्स में लेकर नहीं घूमता लेकिन महिलाएं अपने दोस्तों के घर ज़रूर जाती हैं. वो फ़िल्में देखती हैं, खाना बनाती हैं, खेलों में हिस्सा लेती हैं और देश के लिए मेडल भी जीत कर लाती हैं. तो फिर आपकी बातों का क्या मतलब है?"
एक दूसरे ट्विटर यूज़र ने लिखा, "स्मृति ईरानी एक महिला के तौर पर अपने विचार रख रही हैं. रूढ़िवादी महिलाओं को भी बोलने की आज़ादी है. वो ऐसे ही मूल्यों के साथ पली-बढ़ी हैं."
हालांकि बात बढ़ने पर स्मृति ने एक ट्वीट करके कहा कि यह 'फ़ेक न्यूज़' है और वो इससे जुड़ा 'अपना वीडियो' पोस्ट करेंगी.
इस पूरे मामले को 'फ़ेक न्यूज़' बताने पर भी स्मृति ईरानी की आलोचना हो रही है.
नम्रता ददवाल ने ट्विटर पर लिखा, "इसे फ़ेक न्यूज़ बताना थोड़ा ज़्यादा हो गया. कई चैनलों के पास वीडियो में स्मृति ईरानी के बयान के सबूत हैं."
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने सबरीमला मंदिर के द्वार हर उम्र और हर तबके की महिलाओं के लिए खोलने का आदेश दिया था.
अदालत ने कहा था कि धार्मिक पितृसत्ता को इस बात की इजाज़त नहीं दी जा सकती कि वो किसी की आस्था और धर्म पालन की आज़ादी पर रोक लगाए.
इससे पहले सबरीमला मंदिर में 10-50 साल तक की महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त नहीं थी. अदालतन ने इस परंपरा अवैध, असंवैधानिक और मनमानी भरा बताया था.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और पुलिस की सुरक्षा के बाद भी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश के लिए अब भी संघर्ष करना पड़ रहा है.
मंदिर में प्रवेश की कोशिश करने वाली कई महिलाओं, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को मारपीट का सामना तक करना पड़ा है.
फ़िलहाल मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद और राजनीति जारी है.
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