You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
#PehlaPeriod: बेटे के हाथ, लड़कियों के ‘डायपर’
माहवारी पर आधारित सिरीज़ #PehlaPeriod की दूसरी किस्त में अपना अनुभव बता रही हैं शिल्पी झा.
मैं 10 साल की थी, जब पहली बार पीरियड्स आए. उस उम्र से काफी छोटी जब लड़कियों के पीरियड्स आते हैं.
मैं अपनी बहनों के साथ मौसी के घर गई थी जब मुझे बाथरूम में खून नज़र आया.
मौसी ने हाथ में कॉटन पकड़ाते हुए कहा,परेशान होने की बात नहीं है, सभी लड़कियों को एक बार होता है.
मैंने 'एक बार' को शाब्दिक अर्थ में लिया. दूर तक अंदेशा नहीं हुआ कि ये हर महीने आने वाली बला है.
घर पहुंचकर जब मां और दादी को बताया तो उन्हें जैसे शॉक लगा. 'इतनी जल्दी?' दोनों ने एक साथ कहा.
उस एक दिन ने शरीर और मन को ही नहीं, मेरे लिए रिश्तों को भी बदल दिया. मैं अपने दादा जी के बहुत करीब थी, हर बात उनसे शेयर करती थी.
अगले दिन भी उनके साथ बिस्तर पर लेटी थी जब उन्होंने पूछा, ''कुछ उल्टा-सीधा खा लिया क्या जो पेट खराब हो गया?''
मैं चौंक गई, फिर पता चला मेरे पेट दर्द की ये कैफ़ियत उन्हें दादी से मिली. मुझे बस हां में हां मिलाना था.
इस तरह के तमाम अनकहे संवाद और नियम स्थापित हो गए थे जिनका पालन चुपचाप करना था.
मैं अपनी क्लास की सबसे लंबी लड़कियों में थी, एकदम से लंबाई का बढ़ना भी रुक गया.
कुछ ही महीनों बाद मुझे हॉस्टल जाना था. हमारी पीढ़ी में लड़कियों के मन में भी पीरिएड्स को लेकर संवेदनशीलता की इतनी कमी थी कि गर्ल्स हॉस्टल में भी मेरा मज़ाक बनता.
दर्द में हॉस्टल की नर्स भी हिकारत की नज़र से देखती थी. ज़्यादा ब्लीडिंग के चलते लगभग हर महीने घर आना पड़ता था.
थोड़े समय के बाद खून के थक्के बनने की तकलीफ़ होने लगी. दर्द बहुत ज्यादा बढ़ गया.
एक बार दादाजी परेशान हो गए तो मुझे शहर के जाने-माने सर्जन के पास ले गए. उन्होंने कई तरह के टेस्ट करवा डाले.
ये जानते हुए भी कि किसी में कुछ नहीं निकलने वाला, चार दिन में सब नार्मल हो जाएगा, मैं सब कराती रही, क्योंकि ना मैं, ना मम्मी और ना ही दादी संकोच के मारे दादाजी के सामने ये बता पाए कि दर्द की असली वजह क्या है.
कई दिनों बाद जब कुछ नहीं निकला तो दादाजी ने एक दिन खुद ही पूछा, "भाई साहब पूछ रहे हैं कि पीरियड्स का दर्द तो नहीं है?"
इस बार मां और दादी के पहले ही मैंने ज़ोर से बोल दिया, "हां वही है." दादाजी चुपचाप बाहर चले गए.
एक सामान्य बायलॉजिकल प्रक्रिया को लेकर इतना संकोच, और दुविधा लड़कियों का मानसिक कष्ट इतना ज़्यादा बढ़ा डालती है कि उसके सामने शरीर का दर्द ही छोटा लगने लगे.
वो भी तब जबकि मैं अपेक्षाकृत खुले माहौल में बड़ी हुई.
हॉस्टल में रहना मेरे लिए तब नॉर्मल हुआ जब साथ की सभी लड़कियों के पीरियड्स भी आने लगे.
उन दिनों 'व्हिस्पर' और 'स्टेफ्री' लग्ज़री थे. वैसे तो 'व्हिस्पर' नाम ही आपत्तिजनक है जिसका बहिष्कार किया जाना चाहिए.
व्हिस्पर का मतलब होता है फुसफुसाना या बेहद धीमी आवाज में बात करना.
इसलिए यह नाम कहीं न कहीं इस धारणा को पुख़्ता करता है कि पीरियड्स के बारे में फुसफुसाकर बात की जानी चाहिए, खुलकर नहीं.
जब पैड खरीदने की स्थिति में आए तो वो मेडिकल स्टोर से हमें पेपर और फिर काली पॉलीथिन में पैक करा कर मिलता.
बड़ी हास्यास्पद स्थिति होती थी क्योंकि दूर से ही पता चलता था कि काली पन्नी के अंदर पैड के अलावा और कुछ नहीं होगा.
अमेरिका में पहली बार शेल्फ से उठाकर जब शॉपिंग कार्ट के अंदर पैड डाला तो एक अलग किस्म की आज़ादी महसूस हुई.
उसके बाद से काली पॉलीथिन कभी घर नहीं आई, भारत में भी नहीं. बचपन की कुंठा इस रूप में बाहर आई कि पति से मैंने पीरिएड्स को लेकर ख़ूब खुलकर बात की.
मंदिर नहीं जाना, किचन में नहीं घुसना जैसे ढकोसले भी छोड़ दिए.
अब बेटी उस उम्र में है जब उसे इस अनुभव से गुज़रना होगा. लेकिन वो तैयार है, हम अक़्सर इस बारे में खुलकर बात करते हैं.
मुझसे ही नहीं, वो अपने पापा से भी इस बारे में आराम से पूछती है. दरअसल, पीरियड्स की बायलॉजिकल प्रक्रिया उसने पापा से ही समझी.
इसका मक़सद अपने घर में पीरियड्स से जुड़ी सारी शर्म, सारे संकोच हटा देना है.
उससे ज्यादा सुख़द बदलाव ये कि उसका जुड़वा भाई भी पीरियड्स के बारे में जानता है.
कुछ महीने पहले उनके स्कूल में वर्कशॉप हुई जिसमें लड़के-लड़कियों को आने वाले समय में शारीरिक बदलावों के बारे में बताया गया.
बेटे ने स्कूल से आकर बताया कि कैसे उन्हें लड़कियों के 'डायपर' हाथ में दिए गए. उसे पता है कि उन दिनों में लड़कियों को तकलीफ होती है और उनके साथ संयम से पेश आना होता है.
हालांकि वो समय अभी भी दूर है जब 'उन दिनों' की जगह 'पीरियड्स' शब्द का उच्चारण बिना झिझक के किया जा सकेगा.
---------
कैसा लगता है जब एक बच्ची को अपनी फ्रॉक पर खून के धब्बे दिखाई देते हैं? कितना समझते हैं आप इसके बारे में?
वजाइना से निकलने वाले खून से सने कपड़े को धोना, सुखाना, अगली बार फिर उसे इस्तेमाल करना और अख़बार में लिपटे हुए पैड को छिपाकर बाथरूम में ले जाना...कैसे होते हैं ये अनुभव?
यही समझने के लिए इस सिरीज़ में महिलाएं पहली माहवारी का अपना अनुभव साझा कर रही हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)