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सबरीमला पर टिप्पणी में सऊदी अरब से गई नौकरी
सऊदी अरब में बुधवार को सोशल मीडिया पर महिलाओं के ख़िलाफ़ 'आपत्तिजनक टिप्पणी' करने के मामले में एक भारतीय व्यक्ति को नौकरी से निकाल दिया गया.
केरल के दीपक पवित्रम रियाद के लुला हाइपरमार्केट में काम करते थे. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार सोशल मीडिया पर उन्होंने मंगलवार को महिलाओं के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह से ग्रसित और असंवेदनशील टिप्पणी पोस्ट की थी.
लुला ग्रुप के पीआरओ वी नंदकुमार ने ख़लीज टाइम्स से कहा है, ''सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और पूर्वाग्रह से ग्रसित टिप्पणी करने को लेकर हमारे यहां सख़्त नियम हैं. हम सोशल मीडिया के दुरुपयोग को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते हैं. गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के तहत आने वाले सभी देशों में विविध संस्कृति के लोग रहते हैं. हम सभी की संस्कृति और धार्मिक भावना का सम्मान करते हैं.''
हाल के समय में यह दूसरा वाक़या है जब सोशल मीडिया की पोस्ट के लिए किसी भारतीय को गल्फ़ में नौकरी से निकाला गया हो. इससे पहले अगस्त महीने में केरल के ही एक व्यक्ति को ओमान में बाढ़ पीड़ितों पर अपमानजनक टिप्पणी के लिए नौकरी से निकाला गया था.
हालांकि दीपक ने इस पोस्ट के लिए माफ़ी मांग ली थी फिर भी नौकरी से निकाल दिया गया. भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को सबरीमला मंदिर में महिलाओं के आने पर लगी रोक को ख़त्म कर दिया था.
बुधवार को जब मंदिर खुला तो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जमकर विरोध-प्रदर्शन हुए और अभी तक महिलाओं का मंदिर में प्रवेश संभव नहीं हो पाया.
खाड़ी के देशों में केरल के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं. संयुक्त अरब अमरीत में केरल के लोग सबसे ज़्यादा हैं. इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारवंशियों की तरफ़ से देश में भेजे जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा में केरल का सबसे बड़ा योगदान होता है.
इसमें केरल का 40 फ़ीसदी हिस्सा होता है जबकि पंजाब 12.7 फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर, तमिलनाडु (12.4 फ़ीसदी) तीसरे नंबर पर, आंध्र प्रदेश (7.7 फ़ीसदी) चौथे नंबर पर और 5.4 फ़ीसदी के साथ उत्तर प्रदेश चौथे नंबर पर है.
केरल की कुल तीन करोड़ आबादी है और इसके 10 फ़ीसदी लोग अपने प्रदेश में नहीं रहते हैं. सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज का कहना है कि केरल से खाड़ी के देशों में पलायन कोई नया नहीं है.
सीडीएस के अनुसार, ''केरल भारत का एकलौता राज्य है जहां से खाड़ी के देशों में पिछले 50 सालों से पलायन जारी है. केरल के लोगों का खाड़ी के देशों में एक मजबूत नेटवर्क है. यहां हर किसी का कोई न कोई चाचा या मामा रहता ही है.''
केरल में शहरीकरण की जो तेज़ रफ़्तार है उसके पीछे केरल के उन लोगों की कड़ी मेहनत है जो परिवार से दूर खाड़ी के देशों में रहकर अपने देश में पैसे भेजते हैं. सीडीएस का कहना है कि केरल में 2001 से 2011 के बीच 360 नए शहर बने हैं.
केरल से खाड़ी के देशों के संबंध चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभिक दौर में ही शुरू हो गए थे. तब अरब के व्यापारी मसाले के व्यापार के लिए आते थे. अरब के लोग न केवल मसालों के व्यापार के लिए आते थे बल्कि वे तटीय इलाकों पर यहां के लोगों से घुलने-मिलने भी लगे. मोरक्को के रहनेवाले इब्ने बतूता भी 14वीं शताब्दी में केरल आए थे. इसी तरह केरल के नाविकों ने भी अरब के व्यापारियों के साथ वहां जाना शुरू किया.
जब 1950 के दशक में फ़ारस की खाड़ी में पेट्रोलियम का विशाल भंडार मिला तो आर्थिक और व्यापार के नए मौक़े अचानक से बढ़ गए. यह केरल के लोगों के लिए भी रोज़गार के लिए बेहतरीन मौक़ा था और इन्होंने इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया.
भारतीय विदेश मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार इस साल 7 लाख 81 हज़ार लोग काम के लिए विदेश गए, जिनमें से 96 फ़ीसदी लोग सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, क़तर और ओमान गए. मानव विकास सूचकांक में सभी भारतीय राज्यों में केरल सबसे आगे है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान खाड़ी के देशों से आने वाली कमाई का है.
अगर केरल में खाड़ी के देशों के रोज़गार को छोड़ दें, तो वहां भारी बेरोज़गारी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इंडस्ट्रियल रैंकिंग में केरल 12वें नंबर पर है. सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज़ का कहना है कि 1960 के दशक में केरल की वामपंथी सरकार के भूमि सुधार और 1990 के दशक के बीच खाड़ी के देशों में भारी पलायन हुआ. सीडीएस के अध्ययन का कहना है कि केरल में इसी दौरान बेरोज़गारी का ग्राफ सबसे ऊपर रहा है.
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