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मुस्लिम देशों से केरल का इतना गहरा रिश्ता क्यों है
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
भारत के दक्षिणी राज्य केरल में आई विनाशकारी बाढ़ की चिंता खाड़ी के देशों में भी नज़र आ रही है.
संयुक्त अरब अमीरात में केरल के लोग भारी संख्या में रहते हैं. यूएई में जितने भारतीय प्रवासी हैं उनमें सबसे ज़्यादा केरल के लोग हैं.
यूएई की अर्थव्यवस्था में इन मलयालम भाषी लोगों की अहम भूमिका है.
मंगलवार को जब केरल के मुख्यमंत्री ने कहा कि यूएई ने बाढ़ से हुई बर्बादी से उबरने के लिए 700 करोड़ रुपए की मदद की पेशकश की है तो भारतीय मीडिया में मदद की यह राशि सुर्खी बन गई.
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करने के बाद 500 करोड़ रुपए की तत्काल मदद की घोषणा की थी. अब ख़बर आ रही है कि भारत सरकार ने यूएई की इस मदद को लेने से इनकार कर दिया है.
खाड़ी के कई अन्य देशों से भी केरल में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए पेशकश आई है. इसके साथ ही वहां रह रहे केरल के प्रवासियों ने भी पैसे भेजकर मदद की है.
भारत दुनिया के उन देशों में शीर्ष पर है जहां के विदेश में रहने वाले नागरिक अपने देश में सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भेजते हैं.
विश्व बैंक के अनुसार दुनिया भर के भारतीय प्रवासी जितनी विदेशी मुद्रा अपने देश में भेजते हैं, उतनी किसी भी देश के प्रवासी नहीं भेजते हैं. 2017 में भारतवंशियों ने 69 अरब डॉलर भेजा जो पाकिस्तान की अभी की कुल विदेशी मुद्रा भंडार से सात गुना से भी ज़्यादा है. इसके साथ ही यह भारत के 2018-19 के रक्षा बजट से डेढ़ गुना ज़्यादा है.
1991 की तुलना में भारतीय प्रवासियों से देश में आने वाली विदेशी मुद्रा में 22 गुने की बढ़ोतरी हुई है. 1991 में यह राशि महज़ तीन अरब डॉलर थी.
हालांकि पिछले 6 सालों में भारत की जीडीपी में इस राशि के हिस्से में 1.2 फ़ीसदी की गिरावट आई है. पहले यह हिस्सा 2.8 फ़ीसदी था. विश्व बैंक की हालिया माइग्रेशन रिपोर्ट के अनुसार भारत के बाद इस मामले में चीन, फ़िलीपींस, मेक्सिको, नाइजीरिया और मिस्र हैं.
केरल सबसे आगे
इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार भारवंशियों की तरफ़ से देश में भेजे जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा में केरल का सबसे बड़ा योगदान होता है.
इसमें केरल का 40 फ़ीसदी हिस्सा होता है जबकि पंजाब 12.7 फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर, तमिलनाडु (12.4 फ़ीसदी) तीसरे नंबर पर, आंध्र प्रदेश (7.7 फ़ीसदी) चौथे नंबर पर और 5.4 फ़ीसदी के साथ उत्तर प्रदेश चौथे नंबर पर है.
केरल की कुल तीन करोड़ आबादी है और इसके 10 फ़ीसदी लोग अपने प्रदेश में नहीं रहते हैं. सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज का कहना है कि केरल से खाड़ी के देशों में पलायन कोई नया नहीं है.
सीडीएस के अनुसार, ''केरल भारत का एकलौता राज्य है जहां से खाड़ी के देशों में पिछले 50 सालों से पलायन जारी है. केरल के लोगों का खाड़ी के देशों में एक मजबूत नेटवर्क है. यहां हर किसी का कोई न कोई चाचा या मामा रहता ही है.''
केरल में शहरीकरण की जो तेज़ रफ़्तार है उसके पीछे केरल के उन लोगों की कड़ी मेहनत है जो परिवार से दूर खाड़ी के देशों में रहकर अपने देश में पैसे भेजते हैं. सीडीएस का कहना है कि केरल में 2001 से 2011 के बीच 360 नए शहर बने हैं.
महिलाओं का अकेलापन
केरल के मल्लपुरम ज़िले के हिस्से में खाड़ी के देशों से आने वाला विदेशी धन सबसे ज़्यादा होता है. खाड़ी के देशों से आने वाले कुल विदेशी धन का 20 फ़ीसदी इसी ज़िले में आता है. केरल की फ़िल्मों और वहां के साहित्य में भी खाड़ी के देशों में पलायन और वहां से आई समृद्धि का असर साफ़ दिखता है.
माध्यमम मलयालम भाषा का दैनिक अख़बार है और यह खाड़ी के देशों से भी छपता है. इसे भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय अख़बार कहा जाता है. इसके कुल 19 संस्करण में से 6 संस्करण खाड़ी के देशों से छपते हैं. खाड़ी के देशों में मलयालम भाषा में छपने वाले प्रकाशनों में केरल की उन पत्नियों का ज़िक्र प्रमुखता से होता है जो पति के विदेश जाने की वजह से अकेलेपन का सामना कर रही हैं.
सीडीएस की स्टडी के अनुसार केरल में ऐसी 10 लाख महिलाएं हैं जिनके पति खाड़ी के देशों में काम कर रहे हैं और वो अकेले जीवन बिताने के लिए विवश हैं. केरल में मलयालम भाषा के हर टीवी चैनल पर आधे घंटे के लिए खाड़ी के देशों पर केंद्रित कार्यक्रम ज़रूर प्रसारित किया जाता है.
केरल और खाड़ी के देशों के संबंधों का इतिहास
केरल से खाड़ी के देशों के संबंध चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभिक दौर में ही शुरू हो गए थे. तब अरब के व्यापारी मसाले के व्यापार के लिए आते थे. अरब के लोग न केवल मसालों के व्यापार के लिए आते थे बल्कि वे तटीय इलाकों पर यहां के लोगों से घुलने-मिलने भी लगे. मोरक्को के रहनेवाले इब्ने बतूता भी 14वीं शताब्दी में केरल आए थे. इसी तरह केरल के नाविकों ने भी अरब के व्यापारियों के साथ वहां जाना शुरू किया.
जब 1950 के दशक में फ़ारस की खाड़ी में पेट्रोलियम का विशाल भंडार मिला तो आर्थिक और व्यापार के नए मौक़े अचानक से बढ़ गए. यह केरल के लोगों के लिए भी रोज़गार के लिए बेहतरीन मौक़ा था और इन्होंने इस अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया.
भारतीय विदेश मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार इस साल 7 लाख 81 हज़ार लोग काम के लिए विदेश गए, जिनमें से 96 फ़ीसदी लोग सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, क़तर और ओमान गए. मानव विकास सूचकांक में सभी भारतीय राज्यों में केरल सबसे आगे है तो इसमें सबसे बड़ा योगदान खाड़ी के देशों से आने वाली कमाई का है.
अगर केरल में खाड़ी के देशों के रोज़गार को छोड़ दें, तो वहां भारी बेरोज़गारी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इंडस्ट्रियल रैंकिंग में केरल 12वें नंबर पर है. सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज़ का कहना है कि 1960 के दशक में केरल की वामपंथी सरकार के भूमि सुधार और 1990 के दशक के बीच खाड़ी के देशों में भारी पलायन हुआ. सीडीएस के अध्ययन का कहना है कि केरल में इसी दौरान बेरोज़गारी का ग्राफ सबसे ऊपर रहा है.
सोने की खरीदारी
सीडीएस का कहना है कि खाड़ी के देशों में पलायन से केरल की पूरी तस्वीर बदली है. इस अध्ययन के अनुसार, ''यहां की अर्थव्यवस्था, ज़मीन की क़ीमत और जीवन शैली में बड़ी तब्दीली आई. अच्छे घर बने, ज्वेलरी की बड़ी संख्या में दुकानें खुलीं और नौकरियां देने वाली एजेंसियों की होर्डिंग्स लगाई गईं जिन पर लिखा होता था- नौकरी, पढ़ाई और पलायन.
केरल की संपन्नता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि तीन करोड़ आबादी वाले राज्य में तीन अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं जबकि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दो ही अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं.
2012 में केरल में विदेशों से 66 हज़ार करोड़ जमा किए गए. ज़्यादातर पैसे खाड़ी के देशों से भेजे गए. 2013 में इसमें 40 फ़ीसदी की बढ़ोतरी के साथ यह रक़म 90 हज़ार करोड़ पहुंच गई. 2014 में इसमें केवल 14 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई और यह राशि 1.4 अरब तक पहुंच गई.
2015 में इसमें 22 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई. खाड़ी के देशों जो केरल के लोग मज़दूरी का काम करते हैं वो अपनी कमाई से वापस आने पर सोना ख़रीदते हैं. सीडीएस का कहना है कि जब उनके पैसे ख़त्म होते हैं तो सोना बेचना शुरू कर देते हैं.
केरल का अरबीकरण?
खाड़ी के देशों में केरल के जितने लोग होते हैं, उनमें सबसे ज़्यादा मुस्लिम होते हैं. इनकी कमाई से केरल की अर्थव्यवस्था पर ही केवल प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि यहां की संस्कृति में भी तब्दीली देखने को मिल रही है.
मुस्लिम मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर हामीद चेंदामंगलूर ने 14 जुलाई 2016 को इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ''केरल के मुसलमानों का अरबीकरण हो रहा है. इसकी मुख्य वजह ये है कि इनके परिजन बड़ी संख्या में मध्य-पूर्व में रहते हैं. जैसे बाक़ी भारत का पश्चिमीकरण हुआ है उसी तरह से केरल के मुसलमानों का अरबीकरण हो रहा है. जो भारतीय इंग्लैंड में रहते हैं उनकी जीवनशैली में भी अंग्रेज़ीपन साफ़ दिखता है. इसी तरह से केरल के मुसलमान अपने घरों में अरबी जीवन शैली तेज़ी से अपना रहे हैं.''
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