You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'कोई महिला बिना चोट खाए सबरीमला मंदिर नहीं पहुंच सकती'
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"वो लोग मलयालम में 'वापस जाओ, वापस जाओ' के नारे लगा रहे थे. शुरू में जो ख़ुद को श्रद्धालु बता रहे थे वे उग्र भीड़ में तब्दील हो गए. पत्थर फेंकने लगे, गालियां देने लगे. कुल डेढ़ घंटे का वक़्त हमें ऊपर चढ़कर वापस पंबा तक आने में लगा और ये डेढ़ घंटे मेरे लिए सबसे डरावने साबित हुए.''
ये कहना है न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टर सुहासिनी राज का, जिन्होंने अपनी सहकर्मी के साथ सबरीमला की चढ़ाई तो शुरू की लेकिन उन्हें आधे रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा.
28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सबरीमला की 150 साल पुरानी वो परंपरा ख़त्म कर दी गई जिसमें 10 से 50 साल की महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित था. लेकिन कई धार्मिक समूह और यहां तक की कुछ राजनीतिक पार्टियां भी देश के सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को अब भी स्वीकार नहीं कर रही हैं.
17 अक्टूबर को मंदिर का कपाट, दर्शन के लिए खोला गया लेकिन विरोध की वजह से अभी तक कोई भी महिला श्रद्धालु दर्शन के लिए मंदिर के अंदर प्रवेश नहीं कर सकी है.
18 अक्टूबर को अमरीकी अख़बार की पत्रकार सुहासिनी, सबरीमला की चढ़ाई करने वाली उन महिला पत्रकारों में शुमार हैं जिन्हें भारी विरोध के कारण बीच रास्ते से ही वापस आना पड़ा.
सुहासिनी ने इन 'श्रद्धालुओं' का हिंसक रूप देखा है.
बीबीसी से बात करते हुए सुहासिनी कहती हैं, "मैं अपनी सहकर्मी के साथ मुरकुट्टम तक पहुंच गई थी. यह सबरीमला मंदिर तक पहुंचने का मध्य बिंदु है. हम यहां सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद की स्थिति को कवर करने गए थे. हम श्रद्धालुओं का इंटरव्यू करना चाहते थे ताकि जान सकें कि चढ़ाई कैसी है? कितना वक़्त लगता है? और किन-किन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है? ज़ाहिर है महिलाओं से बात करना हमारा लिए सबसे अहम था."
भीड़ का डरावना चेहरा
"हमने चढ़ाई शुरू की तो काले कपड़े पहने हुए कुछ लोग हमारे पास आए. हमने उन्हें बताया कि हम श्रद्धालु नहीं हैं, पत्रकार हैं और हम मंदिर के अंदर जाने के इरादे से नहीं आए हैं लेकिन शायद वो लोग कुछ तय इरादे से आए थे."
"पुलिस के घेरे के बीच हम चढ़ाई कर रहे थे लेकिन अचानक हमारे ख़िलाफ़ नारे लगने लगे. वो लोग मलयालम में कह रहे थे 'वापस जाओ, वापस जाओ'. उनकी आवाज़ में विरोध था."
"मंदिर के आधे रास्ते तक पहुंचते-पहुंचते हालात बेकाबू हो गए थे. मुझे लगा कि सैकड़ों की भीड़ ने हमें घेर लिया है. वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे. पत्थर फेंक रहे थे. हमने उनसे बात करने की कोशिश लेकिन वो कुछ भी सुनने को राज़ी नहीं थे."
राजनीतिक पार्टियां भी कर रही हैं विरोध
सुहासिनी कहती हैं कि हमारी सुरक्षा कर रहे पुलिसकर्मी हबीबुल्लाह ने ही हमें बताया कि नारा लगाने वाले लोग बीजेपी युवा मोर्चा के सदस्य हैं.
सुहासिनी कहती हैं भीड़ बेकाबू हो गई थी और हमने आधे रास्ते आने के बाद फ़ैसला किया कि हमें लौट जाना चाहिए. हालांकि पुलिस हमारे साथ थी फिर भी हमने वापस लौट जाने का फ़ैसला किया.
"उस समय जो हालात थे उसे देखकर यही समझ आ रहा था कि मंदिर तक बिना चोट खाए नहीं पहुंचा जा सकता. चाहे वो कोई श्रद्धालु हो या रिपोर्टर. भीड़ की ये उग्रता सिर्फ़ एक औरत के लिए थी और ये देखना अपने आप में ही भयावह था."
भगवा कपड़े पहने लोगों ने दी गालियां
"जब भीड़ आपके ऊपर हमला बोल दे तो आप कुछ भी करके ख़ुद को नहीं बचा सकते."
सुहासिनी कहती हैं, "पुलिस वालों ने मेरे चारों ओर एक कवच बना लिया था. भीड़ को धक्का देकर एक किनारे किया. काले और भगवा कपड़े पहने लोग हमारे रास्ते में बैठकर रास्ता रोकने की कोशिश कर रहे थे. वो लोग मुझे गंदी गालियां दे रहे थे."
ख़ौफ़नाक था वो पल
अपने डर का ज़िक्र करते हुए सुहासिनी कहती हैं, "पुलिस हमारे साथ थी लेकिन फिर भी हमें डर लग रहा था क्योंकि बेकाबू भीड़ कुछ भी कर सकती है. अगर स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस गोली भी चलाती तो किसी की जान जा सकती थी. एक बार भीड़ हावी हो जाए तो स्थिति को काबू करना मुश्किल हो जाता है."
"हम साढ़े 6 बजे पंबा पहुंच गए थे. ये वो जगह है जहां से सबरीमला की चढ़ाई शुरू होती है. पौने सात बजे हमने यहां से चढ़ाई शुरू की थी और साढ़े आठ बजे हम वहां वापस लौट आए थे."
द न्यूज़ मिनट की महिला पत्रकार सरिता भी सबरीमला में कवरेज के दौरान हिंसक भीड़ का शिकार हुईं.
सरिता बताती हैं कि वो निलक्कल बेस कैंप के पास थीं.
"कुछ लोग मेरे पास आए, मैंने उनको बताया कि मैं मीडिया से हूं. मेरे साथ कुछ और लोग भी थे लेकिन हमारी बात को अनसुना करते हुए वे हम पर चिल्लाने लगे कि 'मीडिया वापस जाओ."
"मैंने तय किया कि मैं पंबा चली जाती हूं क्योंकि मुझे निलक्कल और पंबा दोनों ही जगहों पर रिपोर्टिंग करनी थी. मैं केरल ट्रांसपोर्ट की बस पर चढ़ी. इस बस में कई श्रद्धालु थे और वे दूसरे राज्यों के लोग थे. अभी बस चली ही थी कि उसे बीच में रोक दिया गया. एक भीड़ ने पूरी बस को घेर लिया."
"ये भीड़ बेहद उग्र थी. तभी मुझे एक अन्य मीडिया साथी मिल गए. उनकी मदद से मैं सुरक्षित नीचे आ सकी. इसके बाद पुलिस भी आ गई."
सबरीमला में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन जारी है. 19 अक्तूबर को भी तीन महिलाएं बीच रास्ते से भारी प्रदर्शन के कारण वापस लौट आईं. लेफ़्ट को छोड़कर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी भी महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रही हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)