सबरीमला मंदिर में महिलाएं ना आएं, इसकी कोशिशें जारी

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

केरल के जानेमाने सबरीमला मंदिर के कपाट खुलने का वक्त जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, स्वामी अयप्पा के दर्शन के लिए आने वाली महिला भक्तों पर दवाब बढ़ता जा रहा है.

सबरीमला मंदिर के कपाट 17 अक्तूबर को खोले जाएंगे. यहां महिलाओं को प्रवेश ना देने को लेकर कई कोशिशें हो रही हैं.

दबाव बढ़ाने की राजनीति भी गरमाती जा रही है. पूरी कोशिश की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंदिर में प्रवेश के लिए महिलाओं को दिए गए अधिकार का पालन ना हो सके.

मंदिर के प्रवेश द्वार के नज़दीक दर्शन के लिए आ रही महिलाओं को बसों और कारों से निकाला जा रहा है. इन्हें द्वार पर मौजूद दूसरी महलाएं वापिस जाने के लिए कह रही हैं. उनकी दलील है कि महिलाओं के प्रवेश देना परंपराओं के अपमान होगा.

इनमें से एक महिला निशा मनी ने बीबीसी से बात की और कहा, "जो महिलाएं बसों से आएंगी हम उन्हें रोकेंगे. हम उन्हें नीचे उतरने के लिए कहेंगे और उन्हें पूरा मुद्दा समझाएंगे."

"हम कई सालों से मंदिर और इसमें विराजे देवता के उपासक है और हम ऐसे लोगों को मंदिर में नहीं जाने देंगे जिन्हें नहीं जाना चाहिए. ये हमारे परंपरा की बात है. हम अपने नियमों का पालन करेंगे."

निशा मनी की सोच और कुछ वैसी ही है जैसी एक संगठन, अयप्पा धर्म सेना की. धर्म सेना ने कहा है कि 17 अक्टूबर को मंदिर का दरवाज़ा खुलने पर अंदर जाने वाली महिलाओं को पुरुषों और महिला कार्यकर्ताओं के ऊपर से चलकर मंदिर में प्रवेश करना होगा.

धर्म सेना का कहना है कि महिलाओं को रोकने के लिए पुरुष और महिला कार्यकर्ता मंदिर के सामने ज़मीन पर लेट जाएंगे.

अयप्पा धर्म सेना के राहुल ईश्वर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "हम गांधीवादी तरीका अपनाएंगे और रास्ते के बीच ज़मीन पर लेट जाएंगे. अगर आप मंदिर में प्रवेश करना चाहते हैं, तो आपको इसके लिए हमारे सीने पर पैर रख कर आगे बढ़ना होगा."

'नारीवादी बहनों को अपील'

ईश्वर कहते हैं, "हम किसी भी तरह की हिंसा में शामिल नहीं हो रहे हैं. हम किसी को आने से रोक भी नहीं रहे हैं या किसी को परेशान नहीं कर रहे हैं. हम गांधीवादी तरीके से पीड़ित की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. हम चाहते हैं कि हमारी नारीवादी बहनें हमारी भावनाओं का सम्मान करें."

सबरीमला मंदिर पूजा के लिए पांच दिनों तक खोला जाता है. ईश्वर ज़ोर देकर कहते हैं कि "उनकी सेना का कदम सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं करेगा."

अदालत ने 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को स्वामी अयप्पा के मंदिर में प्रवेश करने के लिए अनुमति दे दी थी.

हम महिलाओं का प्रवेश रोकने के पक्ष में नहीं - बीजेपी

ईश्वर का बयान उस दिन आया जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की अगुवाई में पांडलम से शुरु हुआ मार्च राजधानी तिरुवनंतपुरम पहुंचा. पांडलम का शाही परिवार सबरीमला मंदिर के संरक्षक हैं.

हालांकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्रीधरन पिल्लई कहते हैं कि उनकी पार्टी 'कानून तोड़ने' और मंदिर में महिलाओं का प्रवेश रोकने के पक्ष में कतई नहीं है.

पिल्लई कहते हैं कि इस मार्च का आयोजन इसलिए किया गया था ताकि वो स्वामी अय्यप्पा के भक्तों को बता सकें कि उनकी पार्टी 'सबरीमाला को बचाना' चाहती है.

पिल्लई ने सीपीएम की अगुवाई वाली वाम मोर्चा सरकार पर निशाना साधा और कहा कि सबरीमला की परंपरा को ख़त्म करने के लिए वो लोग सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि लाखों लोगों ने इस मार्च का समर्थन किया है, "सरकार को इस विरोध के मायने समझने चाहिए और अपना रुख़ बदलना चाहिए."

वो कहते हैं कि इस मार्च का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकार इस मामले में एक रिव्यू पीटीशन दायर करे और ये सुनिश्चित करे कि कैसे परंपरा फिर से बहाल हो सके.

अदालत के आदेश के बावजूद, ऐसा नहीं लग रहा कि स्वामी अयप्पा मंदिर में महिला भक्तों के लिए आने वाला वक्त आसान होने जा रहा है.

महिला को मिली धमकी

कन्नूर ज़िले में रहने वाली कॉलेज शिक्षिका रेशमा निशांत ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा कि वो इस बार मंदिर जा रही हैं क्योंकि अदालत का आदेश उनके उस सपने को पूरा कर रहा है जो उन्होंने लंबे वक्त से देखा है.

सोशल मीडिया पर उनके इस पोस्ट की कई लोगों ने आलोचना की है. कई लोगों ने तो उनके घर के सामने विरोध प्रदर्शन किया, नारे लगाए, उन्हें गालियां दीं. उन्हें ये धमकी भी दी गई कि अगर उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

रेशमा निशांत कहती हैं, "मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा. मुझे नहीं लगता कि वो किसी जवाब के हकदार भी हैं. मैंने इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है."

रेशमा लंबे समय से व्रत रख रही हैं. हर साल की तरह इस साल भी उन्होंने 41 दिनों तक उपवास में रहने की शपथ ली है.

वो कहती हैं, "इस बार, मेरे उपवास का 41वां दिन 17 अक्टूबर को पड़ेगा. इसलिए मैं 18 अक्तूबर को मंदिर जा सकती हूं."

इस बीच त्रावनकोर देवसम बोर्ड ने मंगलवार को पुजारियों के परिवार, पांडलम के शाही परिवार और अयप्पा सेवा संघ के अधिकारियों की एक बैठक बुलाई है. बैठक में मंदिर में प्रवेश करने संबंधी गतिरोध को ख़त्म करने पर चर्चा होगी ताकि पूजा की जा सके.

इससे पहले पिनाराई विजयन ने एक बैठक बुलाई थी जिसमें हिस्सा लेने से इन तीनों पक्षों ने इनकार कर दिया था.

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ये साफ कर दिया है कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में पुनर्विचार के लिए कोई याचिका दाखिल नहीं करेगी.

उनका कहना है कि इसके उलट उनकी सरकार एक शपथपत्र दाखिल कर कहा है कि सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश दिया जाना चाहिए.

17 अक्तूबर यानी कपाट खुलने वाले दिन महिलाओं की सुरक्षा के मद्देनज़र उन्होंने कहा है, "हर हाल में कानून व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश होगी ".

उन्होंने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (साऊथ ज़ोन) अनिल कांत को स्थिति पर नज़र बनाए रखने के लिए कहा है और आदेश दिए हैं कि जो महिलाएं मंदिर में प्रवेश करना चाहती हैं उनके लिए उचित व्यवस्था की जाए ताकि वो बिना बाधा दर्शन कर सकें.

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