कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रियाएं

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पुणे के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के मामले में पुलिस ने मंगलवार को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारे और कई लोगों को गिरफ़्तार कर लिया.
पुलिस के मुताबिक़, इस मामले में वरवर राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फरेरा को ग़िरफ़्तार किया गया है.
पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी को ये भी बताया है कि दिल्ली, मुंबई, राँची, हैदराबाद और फ़रीदाबाद समेत कई जगहों पर छापे मारे हैं.
हालांकि सुधा भारद्वाज को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने राहत देते हुए उनकी ट्रांजिट रिमांड पर दो दिन की रोक लगा दी है.
गौतम नवलखा को भी दिल्ली हाई कोर्ट ने सुबह सुनवाई होने तक वापस घर ले जाने का आदेश दिया.
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने की निंदा
इन गिरफ़्तारियों की मानव अधिकारों की दिशा में सक्रिय कार्यकर्ताओं, वकीलों और संस्थाओं ने निंदा की है.
मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्याय और ग़रीबी के ख़िलाफ काम करने वाली संस्था ऑक्सफैम इंडिया ने साझा बयान जारी करके इन गिरफ़्तारियों की निंदा की है.
इस बयान में कहा गया है कि यह घटना विचलित करने वाली है और यह मानव अधिकारों के बुनियादी मूल्यों के लिए ख़तरा है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर ने कहा है, "ये गिरफ़्तारियां राज्य की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों पर ऐसा दूसरा आघात है. इन सभी लोगों का इतिहास भारत के सबसे ग़रीब और हाशिये पर खड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा का रहा है. उनकी गिरफ्तारियों से गंभीर सवाल खड़े हुए कि क्या उन्हें उनके एक्टिविज़्म की वजह से निशाना बनाया जा रहा है?"
ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, "सरकार को डर का वातावरण बनाने के बजाय लोगों के अभिव्यक्ति के अधिकार और शांतिपूर्ण जुटान के विचार की रक्षा करना चाहिए."
छापेमारी की सोशल मीडिया पर चर्चा

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आरोप है कि इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के कारण ही भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इन गिरफ़्तारियों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने #BhimaKoregaon हैशटैग के साथ ट्वीट किया -
"भारत में सिर्फ़ एक एनजीओ के लिए जगह है और इसका नाम है आरएसएस. बाकी सभी एनजीओ बंद कर दो. सभी ऐक्टिविस्टों को जेल में भेज दो और जो लोग शिक़ायत करें उन्हें गोली मार दो. न्यू इंडिया में आपका स्वागत है."
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मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस कार्रवाई की आलोचना की है और कहा है कि सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए.
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ट्विटर पर कुछ लोग इस गिरफ़्तारी के पक्ष में भी लिख रहे हैं. भाजपा नेता प्रीति गांधी ने ट्वीट किया है, ''भारत के कई शहरों में महाराष्ट्र सरकार की ओर से भीमा कोरेगांव हिंसा के लिए ज़िम्मेदार अर्बन नक्सलियों के ठिकानों पर छापेमारी हुई. पुलिस को इस बारे में सबूत मिले हैं.''
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दिल्ली से विधायक और पूर्व आप नेता कपिल मिश्रा ने भी बिना किसी का नाम लिए आरोप लगाया है कि 'वे' नक्सलियों और कश्मीरी अलगाववादियों के समर्थक हैं.
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कई लोगों ने इन गिरफ़्तारियों की सख़्त लहजे में आलोचना की है. रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर लिखा, ''ये बेहद हैरान करने वाली बात है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को जल्द से जल्द दखल देना चाहिए.''
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वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि फ़ासीवादी शक्तियाँ अब खुलकर सामने आ गई हैं.
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वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया है- नए भारत में मानवाधिकार कार्यकर्ता गिरफ़्तार किए जाएँगे, लेकिन सनातन संस्था जैसे संगठनों को कोई छूना तक नहीं चाहता और देश चुप है.
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सीपीआई एमएल में पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णनन ने कहा है कि मोदी सरकार के अघोषित आपातकाल में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विरोधियों को या तो गोली मारी जाती है, उन पर छापा मारा जाता है, गिरफ़्तार किया जाता है या जेल में डाल दिया जाता है.
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राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने कहा है कि भीमा कोरेगाँव की आड़ में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला किया जा रहा है.
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पत्रकार निखिल वाग्ले ने ट्वीट किया है, ''डियर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, भीमा कोरेगांव हिंसा के दोषियों का क्या हुआ. एकबोट ज़मानत पर बाहर हैं. संभाजी भिडे खुलेआम आज़ाद घूम रहे हैं. क्या पुलिस मुद्दे को भटकाने की कोशिश कर रही है.''
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एनएसयूआई के ट्विटर हैंडल से इन गिरफ्तारियों की आलोचना करते हुए ट्वीट किया गया- ये उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश है जो दलितों और गरीबों के साथ खड़े हैं. हम इन कार्यकर्ताओं को रिहा करने की मांग करते हैं.
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कब और क्यों हुई भीमा कोरेगांव में हिंसा?
महाराष्ट्र में इसी साल एक जनवरी को भीमा कोरेगांव की 200वीं बरसी के मौक़े पर भीमा नदी के किनारे पर स्थित स्मारक के पास पत्थरबाज़ी हुई थी और आगज़नी की घटनाएं हुईं थीं.
कहा जाता है कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई एक जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना और पेशवाओं के नेतृत्व वाली मराठा सेना के बीच हुई थी.

इस लड़ाई में महार जाति ने ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़ते हुए मराठाओं को मात दी थी. महाराष्ट्र में महार जाति को लोग अछूत समझते रहे हैं.
जनवरी 2018 में हिंसा के बाद बीबीसी संवाददाता मयूरेश कुन्नूर से बात करते हुए पुणे ग्रामीण के पुलिस सुपरिंटेंडेंट सुवेज़ हक़ ने बीबीसी को बताया था, "दो गुटों के बीच झड़प हुई थी और तभी पत्थरबाज़ी शुरू हो गई थी. पुलिस फ़ौरन हरकत में आई. हमें भीड़ और हालात पर क़ाबू करने के लिए आंसू गैस और लाठी चार्ज का इस्तेमाल करना पड़ा था.''
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