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'भारत में होंगे सबसे ज़्यादा दिल के रोगी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक नए अध्ययन के मुताबिक अगले दो सालों में भारत में दिल के रोगियों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक होगी. इलाज़ की बढ़ती लागत से स्थिति बिगड़ी है. ये अध्ययन भारत और कनाडा के शोधकर्ताओं ने किया है. इसकी रिपोर्ट ब्रितानी पत्रिका 'द लांसेंट' में प्रकाशित की गई है. रिपोर्ट कहती है कि ग़रीबी के कारण बुहत से मरीज़ दिल की बिमारी का इलाज़ कराने में असमर्थ हैं. भारत में चिकित्सा बीमा की बेहतर व्यवस्था नहीं होने के कारण तीन चौथाई लोग ख़ुद बीमारी का खर्च वहन करते हैं और इनमें से बहुतों के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था करना भी मुश्किल होता है. अगर हार्ट अटैक के बाद रोगी अस्पताल पहुँच भी जाता है तो वहाँ सर्जरी के लिए ज़रुरी पैसे उसके पास नहीं होते हैं. हालाँकि इलाज़ के लिए उपयुक्त दवा की उपलब्धता के मामले में भारत किसी भी विकसित देश से पीछे नहीं है. मरीज़ रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कम उम्र में ही हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं और औसत उम्र 57 आँकी गई है जो दूसरे देशों से कम है. बंगलौर में संत जॉन नेशनल अकादमी ऑफ़ हेल्थ साइंसेस के डॉक्टर डेनिस ज़ेवियर कहते हैं कि वर्ष 2010 तक हार्ट अटैक के 60 फ़ीसदी रोगी सिर्फ़ भारत में होंगे. भारत ही नहीं दक्षिण एशिया के दूसरे देशों में भी कम उम्र में ही हार्ट अटैक का ख़तरा ज़्यादा पाया गया.
रिपोर्ट कहती है, "अस्पताल पहुँचने में देरी न हो और आपात इलाज़ की समुचित व्यवस्था हो जाए तो हार्ट अटैक से होने वाली मौतों की संख्या कम की जा सकती है." डॉक्टर ज़ेवियर की टीम ने 89 देशों में हार्ट अटैक के 21 हज़ार मरीज़ों पर अध्ययन के बात रिपोर्ट तैयार की है. इसमें पाया गया कि हार्ट अटैक के बाद भारत में किसी मरीज़ को अस्पताल पहुँचे पाँच घंटे का समय लगता है जबकि विकसित देशों में दो से तीन घंटे के भीतर इलाज़ शुरु हो जाता है. |
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