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'दशक पहले गुर्दा गैंग का शिकार बना' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में रिक्शा चालक अकरम रज़ा ख़ान का कहना है कि दस साल यानी 1998 में वह गुर्दा निकालने वाले 'संगठित गिरोह' का शिकार बने थे. अकरम का कहना है कि उन्होंने इस मामले की जानकारी पुलिस को दी थी और उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि पुलिस ने अगर ठीक तरह से कार्रवाई की होती तो कई अन्य लोगों के गुर्दे बच गए होते. अकरम ही वह शख़्स हैं जिन्होंने जनवरी में मुरादाबाद पुलिस को इस धंधे की ख़बर दी थी और उसके बाद इस गिरोह का पर्दाफ़ाश हुआ. हालाँकि अकरम अमित को संजय के नाम से जानते हैं और उनके मुताबिक दस साल पहले जब उनकी किडनी निकाली गई थी तो अकरम के मुताबिक अमित उर्फ़ संजय गुर्दा निकालने वालों के साथ थे. गुर्दा गिरोह और उसके ख़िलाफ़ अकरम की क़ानूनी लड़ाई का हाल जानने के लिए बीबीसी ने उनसे बात की तो पता चला कि अकरम का गुर्दा 1998 में जालंधर में निकाला गया था लेकिन प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद उस गिरोह का कोई सदस्य पकड़ा नहीं जा सका. प्राथमिकी में उन्होंने पाँच डॉक्टरों को नामज़द करने का मन बनाया था लेकिन डॉक्टर संजय (अमित) और एक अन्य का नाम उन्होंने क़ानूनी सलाहकार के कहने पर नहीं दिया. 'नौकरी का झांसा' अकरम के गुर्दा गँवाने की कहानी लखनऊ में रिक्शा चलाने के दौरान 1998 से शुरू हुई. उनका कहना है, "रिक्शे पर शहर घूमने के बाद एक आदमी ने माली की नौकरी देने के नाम पर मुझे जालंधर लाने के लिए राज़ी किया. वहाँ पहुँचने पर मेडिकल जाँच के नाम पर मुझे एक अस्पताल ले जाया गया और किडनी निकाल ली गई." उनका कहना है, "जाँच के नाम पर दी गई सुई और नाक पर रखे तौलिए ने जो असर किया, उसके उतरने से पहले मेरी किडनी निकाली जा चुकी थी." होश आने पर अकरम ने अपने पेट पट्टियाँ बँधी देखकर जालंधर लेकर आए आदमी से पूछताछ की तो बताया गया कि उनहें पथरी की बीमारी थी जिसका अचानक ऑपरेशन करना पड़ा. अकरम का कहना है कि तब उन्होंने कहा कि वह घर पर अपनी भैंस बेचकर पथरी ऑपरेशन के दस हज़ार चुका देंगे. उनका कहना है कि वह तब चौंके जब अस्पताल में देखभाल करने वाली एक नर्स परमजीत कौर ने उनसे पूछा, "बेटे, तुमने अपना गुर्दा क्यों दिया?" उस वक़्त तक अकरम को पता नहीं था कि ये गुर्दा ज़िंदगी में क्या अहमियत रखता है. नर्स ने उन्हें बताया कि एक गुर्दे पर भी आदमी ज़िदा रह सकता है. अकरम का आरोप है कि शिकायत करने पर उन्हें हिसार भेज दिया गया और उस पर हमले की योजना बनाई गई लेकिन वह किसी तरह से बच निकला. लखनऊ में अकरम ने एक डॉक्टर से मुलाक़ात की और उनके प्रयास से उनकी व्यथा कई अख़बारों की सुर्खियाँ बनी. उनके मुताबिक मुख्यमंत्री ने आर्थिक सहायता दी. मामला दर्ज हुआ. जाँच शुरू हो गई लेकिन उसका नतीजा आज तक सामने नहीं आ सका है. कलाकार और लेखक अकरम का कहना है कि गुर्दा गिरोह ने अकरम को समझौते के लिए धमकी और प्रलोभन देना शुरू कर दिया. जान पर ख़तरे को देखते हुए उन्हें लखनऊ की एक रंगकर्मी के घर रखवाया गया.
वहीं दिल्ली के नाट्य संस्थान एनएसडी से गई एक रंगकर्मी ने उन्हें नाटक में काम करने का न्योता दिया. उनका कहना है, "मेरी बोली और भाषा में सुधार के बाद जब मैं स्टेज पर उतरा तो सर्वश्रेष्ठ कलाकार घोषित किया गया. फिर मैं दिल्ली आ गया और नाटक के साथ-साथ पढ़ाई करने लगा. बाद में मित्रों के कहने पर "मेरा संघर्ष" नाम से कहानी लिखी." इस किताब का नौ भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इससे मिलने वाली रॉयल्टी से अब अकरम ने बरेली में बच्चों और बूढ़ों के लिए आश्रम खोला है. वब एक हेल्पलाइन भी चलाते हैं और इस साल 14 जनवरी को उन्हें मुरादाबाद से फ़ोन आया और बताया गया कि जिस तरह उनकी किडनी निकाली गई थी, उसी तरह का धंधा मुरादाबाद में भी चल रहा है. उन्होंने मुरादाबाद के पुलिस अधीक्षक के सहायक को गुर्दे के धंधे की जानकारी दी और उसके बाद इस कांड का पर्दाफ़ाश हुआ. अकरम को भरोसा है कि एक न एक दिन उन्हें न्याय मिलेगा और उस दिन को लोग फिर याद रखेंगे कि एक ग़रीब ने इंसाफ़ की लड़ाई जीती थी. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अमित कुमार को भारत लाया जा सकेगा'08 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस किडनी कांड का प्रमुख अभियुक्त गिरफ़्तार07 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'डॉक्टर हूँ, किडनी डीलर नहीं'08 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस कब होगी डॉ. अमित कुमार की भारत वापसी?08 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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