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सोमवार, 24 मार्च, 2008 को 07:08 GMT तक के समाचार
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स्टेम सेल से पार्किन्संस रोग का इलाज
मस्तिष्क
मस्तिष्क को प्रभावित करता है पार्किन्संस रोग
अमरीका के शोधार्थियों ने कहा है कि चिकित्सकीय क्लोनिंग से चूहों में पार्किन्संस रोग का इलाज करने में उन्हें सफलता मिली है.

नेचर मेडिसिन पत्रिका में छपे इस अध्ययन ने अब तक इस बात के सबूत दे दिए हैं कि यह विवादास्पद तकनीक एक दिन इस बीमारी से जूझ रहे लोगों की मदद करेगी.

मैमोरियल स्लोन केटैरिंग कैंसर केंद्र की टीम का कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी जानवर का इलाज उसकी अपनी कोशिकाओं से सफ़लतापूर्वक किया गया हो.

इंग्लैंड के विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध आशाजनक और उत्साहित करने वाला था.

हालांकि इसका उपयोग मनुष्यों के इलाज के लिए करने में अभी काफ़ी वक़्त लगेगा.

पार्किन्संस रोग में मस्तिष्क में माँसपेशियों की गति को नियंत्रित करने वाले हिस्से की नसों की कोशिकाएँ या तो मर जाती हैं या फिर बेकार हो जाती हैं.

इससे अक्सर मरीज़ अपनी शारीरिक गतिविधियों पर अच्छी तरह नियंत्रण नहीं रख पाता.

चूहों को फ़ायदा

आमतौर पर यह कोशिकाएँ एक रसायन का उत्पादन करती हैं जिसे डोपामाइन कहते हैं. यह रसायन शरीर की माँसपेशियों के सुगम प्रचालन की अनुमति देता है.

चिकित्सकीय क्लोनिंग में कोशिकाओं के नाभिक को अंडे में प्रत्यारोपित किया जाता है.

 यह उत्साहित करने वाले परिणाम हैं क्योंकि पहली बार हम यह देख सकते हैं कि किसी व्यक्ति के अपने स्टेम सेल का प्रयोग पार्किन्संस रोग के इलाज के लिए किया जा सकता है
डॉ किरेन ब्रीन, पर्किंसन रोग सोसाइटी में शोध और विकास की निदेशक

इसके बाद इस कोशिका को एक भ्रूण के रूप में विकसित किया जाता है और इससे स्टेम सेल बना कर उन्हें इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है.

इस अध्ययन में अपने ही क्लोन से बने न्यूरॉन पाने वाले चूहों को काफ़ी फ़ायदा दिखाई दिया.

लेकिन जब इन न्यूरॉन को उन चूहों में प्रत्यारोपित किया गया जो प्रत्यारोपित कोशिकाओं से मेल नहीं खाते थे तब वे कोशिकाएं जीवित नहीं रह सकीं और चूहों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

बड़ी आशा

वैज्ञानिक पार्किन्संस रोग में स्टेम सेल पद्धति के प्रयोग को इसलिए बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि यह मृत डोपामाइन को नई बनी और स्वस्थ कोशिकाओं से बदल देती है.

फिर भी चुनौती यह है कि नसों की ऐसी कोशिकाएं बनाई जाएँ जो प्रत्यारोपण के बाद जीवित रह सकें.

पर्किंसन रोग सोसाइटी में शोध और विकास की निदेशक डॉ किरेन ब्रीन कहती हैं, "यह उत्साहित करने वाले परिणाम हैं क्योंकि पहली बार हम यह देख सकते हैं कि किसी व्यक्ति के अपने स्टेम सेल का प्रयोग पार्किन्संस रोग के इलाज के लिए किया जा सकता है."

उनके अनुसार, "अब ज़रूरत है कि इस क्षेत्र में शोधार्थी सुरक्षा के दृष्टिगत और अध्ययन करें जिससे पर्किंसन के शिकार लोगों पर आज़माने से पहले ही यह प्रणाली ज़्यादा प्रभावी साबित हो सके."

उन्होंने कहा, "स्टेम सेल प्रणाली पार्किन्संस के साथ जी रहे लोगों के मस्तिष्क को दुरुस्त करने के लिए बड़ी आशा बन रही है."

और शोध की ज़रूरत

पाक्रिन्संस का एक मरीज़
मरीज़ अपनी शारीरिक गतिविधियों पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं रख पाता

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल रिसर्च में स्टेम सेल के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर रॉबिन लोवैल बैज ने कहा, "यह एक बहुत अच्छा शोध है जो दिखाता है कि चिकित्सकीय क्लोनिंग का प्रयोग कैसे फ़ायदेमंद साबित हो सकता है."

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि शोधार्थियों ने चूहों का अध्ययन सिर्फ़ 11 सप्ताह तक ही किया है जो यह अध्ययन करने के लिए कि यह फ़ायदा कितना स्थाई है, बहुत लंबा समय नहीं है.

विशेषज्ञों का मानना है कि पार्किन्संस से जूझ रहे लोगों के इलाज में इसका प्रयोग किया जाए, इससे पहले मानव और जानवरों में और ज़्यादा शोध करने की ज़रूरत है.

एक अन्य अध्ययन में यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन की एक टीम ने पार्किन्संस रोग के इतिहास वाले लोगों में इसे बढ़ा सकने वाली कोशिकाओं में परिवर्तन होता देखा.

यह खोज वैज्ञानिकों को एक ऐसा संकेत देती है जिससे पार्किन्संस रोग के कारण का पता लगाया जा सकेगा और हो सकता है कि यह इसके नए इलाज का पता लगाने में भी मदद करे.

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