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कंप्यूटर सहेजकर रखेगा तस्वीरें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक का विकास किया है जो तस्वीरों और वीडियो में मौजूद विषय-वस्तु को पहचानकर उन्हें नाम भी दे सकता है. उनका मानना है कि यह तकनीक लोगों को अपने कैमरा, कैमकॉर्डर और फोन द्वारा एकत्रित की गई जानकारी और सामग्री को व्यवस्थित करने और ढ़ूढ़ने में सहायता करेगा. यूरोपीय संघ की साझेदारी में एसमीडिया कंसोर्टियम की यह योजना हेलसिंकी में होने वाली सूचना तकनीक सोसाइटी की बैठक में दिखाई जाएगी. ये तकनीक अभी सिर्फ़ शुरुआती स्थिति में ही है. इस तकनीक का इस्तेमाल कंप्यूटर के माध्यम से किया जाता है. इस तकनीक में कंप्यूटर में मौजूद सेंसर्स तस्वीरों और वीडियो में मौजूद विषय-वस्तु के पिक्सल इमेज बनाएँगे और इस जानकारी का विश्लेषण कर इसे एक नाम देंगे. ये तकनीक किसी भी तस्वीर में मौजूद हिस्सों को पहचान कर उन्हें एक नाम देने में सक्षम है. उदाहरण के लिए- आकाश, समुद्र, चट्टान, लोग आदि. और इस तरह ये तकनीक एक तस्वीर में से अलग अलग चीजों को पहचान कर इसे एक दृश्य का नाम दे देती है. जैसे अगर तस्वीर में छुट्टियों का दृश्य है तो ये तकनीक इसे समुद्र तट के दृश्य का नाम दे देगी. यानी आपकी खीचीं तस्वीरें अपने आप अलग-अलग नाम से तैयार फ़ाइलों में इकट्ठी होती जाएँगीं. ढ़ूँढ़ना आसान मोटोरोला रिसर्च लैब में कार्यरत एसमीडिया की योजना अधिकारी डॉ. पाओला हॉब्सन के मुताबिक इस तकनीक का लक्ष्य लोगों को उनकी मल्टीमीडिया सामग्री को सहेजने में मदद करना है. डॉ. हॉब्सन कहती हैं “लोग अपनी तस्वीरों और वीडियो को नाम देने और उसे सहेजने में समय बर्बाद नहीं करना चाहते, वे केवल चाहते हैं कि वे जब चाहें इन तस्वीरों और वीडियो को बिना किसी परेशानी के देख सकें.” उन्होंने कहा “इस तकनीक का लक्ष्य है कि आपकी तस्वीरें और विडियो सुरक्षित और सुनियोजित रहें और आप जब चाहें सिर्फ एक मिलता-जुलता शब्द कंप्यूटर में दाखिल कर इन्हें देख या इस्तेमाल कर पाएं” उन्होंने कहा कि इस तकनीक की मदद से कोई भी समूह या परिवार अपने तस्वीरें या वीडियो एक दूसरे से बांट सकते हैं. फ़िलहाल ये तकनीक केवल कुछ दृश्यों तक ही सीमित है जैसे कि समुद्र के किनारे बीच का दृश्य या टेनिस मैच का दृश्य, लेकिन शोधकर्ता का कहना है कि ये तकनीक साबित हो चुकी हैं और जल्द ही दूसरी दृश्यों पर भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. ऐसे ही कुछ दूसरी योजनाओं पर भी काम चल रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें कंप्यूटर आसान लेकिन बेहद नाज़ुक भी!15 नवंबर, 2006 | विज्ञान अब रीचार्जिंग की बेतार तकनीक 15 नवंबर, 2006 | विज्ञान भावनाओं को समझने वाला कंप्यूटर27 जून, 2006 | विज्ञान जापान में मोबाइल फ़ोन पर टीवी शुरु01 अप्रैल, 2006 | विज्ञान नए ज़माने का ओरिगैमि कंप्यूटर09 मार्च, 2006 | विज्ञान गैरेज से शुरू हुई कंपनी ने सुपरकंप्यूटर बनाया12 जून, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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