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सोमवार, 25 सितंबर, 2006 को 20:02 GMT तक के समाचार
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'लाइट' सिगरेट के लिए कंपनियों पर मुक़दमा
सिगरेट
वर्ष 1954 में पता चला था कि सिगरेट पीने से फेफडों का कैंसर हो सकता है
अमरीका की एक अदालत में सिगरेट कंपनियों के ख़िलाफ़ एक मुक़दमा दायर हुआ है जिसमें कंपनियों पर आरोप लगाया गया है कि 'लाइट' सिगरेट के नाम से धुम्रपान करनेवाले भ्रमित होते हैं कि इससे कम हानि पहुँचती है.

न्यायाधीश ने इस मामले में आगे की कार्यवाही के आदेश दे दिए हैं. अदालत का कहना है कि इस मामले को एक बड़े वर्ग को प्रभावित करने के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि इससे करोड़ों लोग प्रभावित हुए हैं.

आरोप के मुताबिक सिगरेट के पैकेटों पर 'लाइट' लिखे जाने से धुम्रपान करनेवालों को यह भ्रम हो सकता है कि ये सिगरेट कम हानिकारक हैं.

जानकारों का आकलन है कि अगर ऐसा साबित हो जाता है तो सिगरेट निर्माता कंपनियों पर लगभग 8925 अरब रूपए तक की कीमत अदा करनी पड़ सकती है.

इस मामले में फ़िलिप मोरिस, आरजे रेनॉल्ड्स और ब्रिटिश अमेरिकन टोंबैको जैसी कंपनियों को प्रतिवादी बनाया गया है.

प्रतिवाद

इन सिगरेट कंपनियों में से एक के प्रवक्ता ने कहा है कि कंपनियों न्यायाधीश के इस आदेश के ख़िलाफ़ अपील दायर करेंगी.

माना जा रहा है कि इस अपील में एक वर्ष तक का समय लग सकता है.

वादी पक्ष के वकीलों का कहना है कि सिगरेट कंपनियों ने 'लाइट' सिगरेट के कम हानिकारक होने के दावे से 120 अरब डॉलर से लेकर 200 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त बिक्री की है.

उधर बचाव पक्ष की ओर से कहा गया है कि जबतक इस बारे में सिगरेट पीने वाले प्रत्येक व्यक्ति से सर्वेक्षण के जरिए यह नहीं पूछ लिया जाता कि वो ऐसी सिगरेट क्यों पीता है, इस तरह का आरोप लगाना ग़लत है.

इन कंपनियों में से एक का कहना है कि अमरीका में इस तरह के 60 मामले सिगरेट कंपनियों के ख़िलाफ़ दायर हो चुके हैं पर किसी को भी सफलता नहीं मिली है.

'लो तार' या 'लाइट' सिगरेटों की शुरूआत 1970 के दशक में हुई थी.

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