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'मरुस्थलों के लिए अभूतपूर्व ख़तरा' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पाँच जून को प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के मरुस्थलों के लिए ऐसा ख़तरा पैदा हो गया है जैसा पहले कभी नहीं था. ये पृथ्वी में मौजूद मरुस्थलों के बारे में पहली विस्तृत रिपोर्ट है. इस रिपोर्ट के अनुसार जल-वायु परिवर्तन, पानी की माँग और पर्यटन से दुनिया के मरुस्थलों पर अभूतपूर्व दबाव है. इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों का कहना है कि बहुत सारा पानी ऐसी फ़सलें उगाने के लिए किया जा रहा है जो अत्यधिक पानी का इस्तेमाल करती हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने एक बयान में कहा, "पूरी पृथ्वी पर ग़रीबी, अनुपयुक्त भूमि प्रबंधन और जल-वायु परिवर्तन के कारण सूखे वाले क्षेत्र मरूस्थलों में बदल रहे हैं और इससे ग़रीबी भी बढ़ रही है." अनुमान लगाया जा रहा है कि दुनिया के 12 मरूस्थल क्षेत्रों में से अधिकतर में मौसम आने वाले दिनों में और सूखा होगा. जल-वायु परिवर्तन के कारण हिमनदों के पिघलने से मरुस्थलों में रहने वालों के लिए मुश्किल पैदा हो गई है क्योंकि दक्षिण अमरीका जैसे क्षेत्रों में मरुस्थल हिमनदों पर पानी के लिए निर्भर हैं. मरुस्थलों में पहाड़ी इलाकों में रहने वाले वन्य जीवों के लिए विशेष ख़तरा पैदा हो गया है और यदि पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाते तो ये क्षेत्र 50 साल के भीतर तबाह हो सकते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें एवरेस्ट के पर्यावरण संतुलन को ख़तरा01 जून, 2005 | विज्ञान ग्रीनपीस के सह-संस्थापक का निधन03 मई, 2005 | पहला पन्ना 'ज़हरीले जहाज़' पर ग्रीनपीस का अनुरोध25 अप्रैल, 2005 | विज्ञान मानव गतिविधियों से भारी नुक़सान30 मार्च, 2005 | विज्ञान भारत में गिद्धों को बचाने की कोशिश23 मार्च, 2005 | विज्ञान सरिस्का से ग़ायब होता वनराज17 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस क्या एवरेस्ट की ऊँचाई घट रही है?25 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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