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'भारत-चीन के विकास से ख़तरा' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका की एक पर्यावरण संस्था ने आगाह किया है कि चीन और भारत में तेज़ी से हो रहा आर्थिक विकास दुनिया के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक हो सकता है. वर्ल्डवाच संस्था का कहना है कि अगर पश्चिम की तर्ज पर इन देशों में संसाधनों की खपत बढ़ती रही तो दुनिया की ज़रूरतें पूरी करने के लिए धरती पर पर्याप्त ऊर्जा, पानी और खेती लायक ज़मीन नहीं बचेगी. अपनी वार्षिक रिपोर्ट में संस्था ने कहा है कि अगले कुछ सालों में चीन और भारत की नीतियों पर ही ये निर्भर करेगा कि दुनिया पर्यावरण के नज़रिए और राजनीतिक रुप से अस्थिर होती है, या फिर बेहतर तकनीक और संसाधनों के इस्तेमाल की ओर बढ़ती है. 'नए रास्ते की ज़रूरत' इस रिपोर्ट की प्रस्तावना लिखने वाली सुनीता नारायण ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि विकास के लिए पश्चिमी देशों ने जो मॉडल अपनाया है वो पूरी दुनिया में विनाश कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत और चीन भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ रहे हैं और अगर इससे दुनिया में विनाश होता है तो ये विकास के पश्चिमी मॉडल के चलते ही होगा, भारत और चीन के चलते नहीं. सुनीता नारायण का कहना था कि भारत और चीन को एक नया रास्ता ढूँढना होगा क्योंकि पूरी दुनिया को नए रास्ते की खोज है. सुनीता नारायण ने कहा कि विकास का नया रास्ता ढूँढने की क्षमता अमरीका में नहीं है. रिपोर्ट में भारत और चीन पर ऊंगली उठाए जाने पर उनका कहना था, "पश्चिमी देशों ने अपनी ज़रुरतें पूरी करने के लिए दुनिया का विनाश किया और अब चीन और भारत भी अपनी ज़रुरतें पूरी करने के लिए उसी दुनिया का विनाश करेंगे." उन्होंने कहा कि अमरीका और ब्रिटेन की आर्थिक तरक्की का दौर उस समय शुरू हुआ था जब उनके पास प्रदूषण जैसी समस्याओं पर काबू करने का उपाय था. सुनीता नारायण ने कहा कि संसाधनों की बढ़ती खपत के चलते भारत और चीन पर दुनिया के अन्य देशों से दबाव पड़ रहा है और आगे भी पड़ेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें क्योटो संधि के पक्ष में 138 अमरीकी मेयर18 मई, 2005 | विज्ञान धुएँ ने ही बढ़ाया पृथ्वी का तापमान18 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान लागू हो गई क्योटो संधि16 फ़रवरी, 2005 | विज्ञान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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