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क्यों हुई मुंबई में भयंकर बारिश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुंबई में जुलाई, 2005 में सभी आशंकाओं से बढ़कर बारिश हुई. मुंबई में इतनी भंयकर बारिश क्यों हुई इस बारे में क्या कहते हैं भारत और ब्रिटेन के वैज्ञानिक ? भारत के मौसम विभाग के उपमहानिदेशक एस आर कलसी कहते हैं कि मुंबई के 100 साल के इतिहास में इतनी बारिश कभी रिकॉर्ड नहीं हुई. वो कहते हैं, “एक दिन में इससे पहले 30 या 40 सेंटीमीटर बारिश होने को बहुत तेज़ बारिश कहा जाता था लेकिन 26 जुलाई को एक ही दिन में हुई 100 सेंटीमीटर बारिश हुई.” बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंसेज़ में एटमॉस्फ़ेरिक साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर जे श्रीनिवासन कहते हैं कि विश्व रिकॉर्ड स्तर की बारिश वाले स्थान चेरापूंजी में भी ऐसी बारिश दस साल में एक बार ही होती है. ज़ाहिर है कि मुंबई के लिए ये बारिश अभूतपूर्व थी. प्रोफ़ेसर जे श्रीनिवासन कहते हैं कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंसेज़ में माना जा रहा है कि लगता नहीं है कि ये बादल फटने की घटना है. श्रीनिवासन कहते हैं, “बादल फटने के कारण होने वाली बारिश एक दो घंटे तक होती है लेकिन मुंबई में तो 12 घंटे से भी ज़्यादा बारिश हुई. इससे कई सवाल उठते हैं.” प्रोफ़ेसर जे श्रीनिवासन कहते हैं कि ये बात उतनी ही अजीब है कि मुंबई के अलग अलग इलाक़ों में बारिश में बहुत ही ज़्यादा फ़र्क था. कुल मिलाकर भारत में वैज्ञानिक समुदाय अब भी मुंबई और महाराष्ट्र की बारिश को लेकर अब भी अचंभे में हैं. ग्लोबल वार्मिंग जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की समिति की वैज्ञानिक समिति के अध्यक्ष रह चुके और ब्रिटेन के मौसम विभाग के सर जॉन हाउटन कहते हैं कि इस पूरी तस्वीर को “ग्लोबल वॉर्मिंग” से जोड़कर देखा जाना चाहिए. सर जॉन हाउटन कहते हैं कि मुंबई में बारिश को “ग्लोबल वॉर्मिंग” से सीधे सीधे जोड़ना तो ग़लत होगा क्योंकि ऐसी घटनाएँ स्थानीय कारणों से होती है, लेकिन जैसे-जैसे प्रदूषण बढ़ेगा, पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा और जलवायु में कई हानिकारक बदलाव आएँगे. सर जॉन हाउटन कहते हैं, “दुनिया में बाढ़, सूखा और भीषण गर्मी और लू का प्रकोप बढ़ रहा है और यही वो चीज़ें है जो हम जानते हैं कि जैसे-जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ेगी वैसे वैसे ये चीज़ें बढ़ेंगी. भारत और दक्षिण एशिया में मॉनसून की कहीं कहीं ज़्यादा बारिश होगी तो कहीं सूखा पड़ेगा. भूमध्यसागर के इलाक़ों में सूखा बढ़ेगा.” संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन की वैज्ञानिक शाखा के प्रमुख रह चुके सर जॉन हाउटन कहते हैं कि 2 साल पहले ही इस तरह की भीषण गर्मी ने यूरोप के कई देशों को झुलसा दिया था. हाउटन कहते हैं, “यूरोप में भीषण गर्मी के कारण 20,000 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी. गर्मी और मौसम में बढ़ोतरी इतनी अस्वाभाविक थी कि जैसी 10 लाख साल में एक बार होती है. कई वैज्ञानिक उसे भी ग्लोबल वॉर्मिंग से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि उद्योगों और सरकारों को और सोचने की ज़रूरत है, और जल्द से जल्द.” भारत में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर जे श्रीनिवासन कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि ग्लोबल वॉर्मिंग के बढ़ने से जलवायु में ऐसे परिवर्तन ज़्यादा आ सकते हैं. श्रीनिवासन साथ ही याद दिलाते हैं कि जब पहली बार फ़्रिज और एयरकंडिशनर में सी एफ़ सी यानी कार्बन फ़्लोरो कार्बन गैसों का उपयोग होने लगा था तब कई वैज्ञानिकों ने शोधपत्र पढ़े थे कि इससे ओज़ोन की परत को नुक़सान पहुँचेगा. जितना जल्दी इन वैज्ञानिकों ने सोचा था उससे भी पहले ओज़ोन की पर्त में छेद देखे गए. ऐसे वैज्ञानिकों का अब कहना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए क़दम जल्दी नहीं उठाए गए तो प्रकृति कुछ ऐसे मोड़ ले सकती है जिससे दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं. |
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