|
शिशुओं के भी होते हैं मनपसंद रंग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नए शोध से पता चला है कि चार महीने तक के शिशुओं के भी पसंदीदा रंग होते हैं. सरे बेबी लैब की डॉक्टर ऐना फ्रैंकलिन ने 250 से अधिक शिशुओं का अध्ययन किया कि उनकी पसंद के कौन से रंग हैं. उनका कहना है कि यह एक भ्रम है कि शिशुओं को रंगों की पहचान नहीं होती. वे रंग देख सकते हैं लेकिन कुछ और बड़े होने पर यह क्षमता और विकसित हो जाती है. डॉक्टर फैंकलिन ने अनेक परीक्षण किए और जानने की कोशिश की कि शिशु रंगों को कैसे देखते हैं और उनके पसंदीदा कौन से रंग होते हैं. एक परीक्षण में कंप्यूटर स्क्रीन पर एक ही रंग को शिशुओं को बार- बार दिखाया गया. उसके बाद उसे बदल दिया गया और जानने की कोशिश की गई कि क्या वह उनका ध्यान खींच पाता है. परीक्षण एक अन्य परीक्षण में बच्चे की आंख की गतिविधियों की कंप्यूटर से नज़र रखी गई और यह जानने की कोशिश की गई कि शिशु दो में से कौन से रंग को पसंद करता है. डॉक्टर फ्रैंकलिन का कहना था कि यदि किसी शिशु को लगातार नीले रंग और उससे मिलते जुलते रंग को दिखाए जाएं तो वो उसे एक ही मानता है और जल्दी ही उससे ऊबने लगता है. उनका कहना है कि यदि बीच में शिशु को हरा रंग दिखा दिया जाए तो वो उसे देखने लगता है. इससे पता लगता है कि शिशु जानते हैं कि नीले और उससे मिलते जुलते रंग एक ही श्रेणी में आते हैं. डॉक्टर फ्रैंकलिन ने पाया कि यदि शिशुओं को जोड़ी में रंगों को दिखाया जाए तो वे नीले, लाल, बैंगनी, और नारंगी रंगों पर सबसे अधिक नज़र टिकाते हैं. लेकिन भूरे रंग को वे सबसे कम समय देखते हैं. इससे निष्कर्ष निकाला गया कि भूरा रंग उन्हें सबसे कम पसंद है. कुछ शिशुओं को केवल एक ही रंग पसंद था लेकिन कुछ ने अन्य रंगों को भी पसंद किया. डॉक्टर फ्रैंकलिन का कहना है कि ये नतीजे प्रारंभिक हैं और चार से नौ महीने के 30 शिशुओं पर परीक्षण कर निकाले गए हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||