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बिना अंग्रेज़ी इंटरनेट का इस्तेमाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंटरनेट को उनके लिए फ़ायदेमंद कैसे बनाएँ जो अंग्रेज़ी या किसी पश्चिमी भाषा का इस्तेमाल नहीं करते? इंटरनेट युग में ये एक अहम सवाल है जिसपर विचार करने लिए मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में दुनिया के तमाम देशों से आए इंटरनेट के जानकारों की बैठक चल रही है. दरअसल चीन, ताइवान, कोरिया और जापान जैसे देशों में इंटरनेट का इस्तेलमाल करनेवालों को अक्सर इंटरनेट में अंग्रेज़ी के ही प्रयोग के कारण मुश्किल आती है. कुछ भाषाओं या लिपियों में ऐसे अक्षर, मात्राएँ या ऐसी वर्तनी इस्तेमाल होती है जिन्हें कंप्यूटर ठीक से समझ नहीं पाता. विचार के विषय मलेशिया में ये बैठक ऐसे वक़्त हो रही है जब ये अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि कुछ ही वर्षों के भीतर इंटरनेट इस्तेमाल करनेवालों में सर्वाधिक आबादी एशियाई लोगों की होगी. ऐसी सूरत में विशेषज्ञ ये विचार कर रहे हैं कि इंटरनेट के लिए उन भाषाओं या लिपियों के मानक कैसे तय हों. साथ ही डॉट कॉम, डॉट ऑर्ग या डॉट नेट की तर्ज़ पर इंटरनेट के कुछ नए पते बनाने पर भी बात होगी. क्वालालंपुर से बीबीसी संवाददाता जोनाथन केंट कहते हैं यदि किसी चिट्ठी पर पता लिखने में कुछ ग़लती हो तब भी उम्मीद रहती है कि कोई सयाना डाकिया ग़लती सुधार दे और चिट्ठी सही ठिकाने पर पहुंचे. लेकिन इंटरनेट पर ऐसी कोई उम्मीद नहीं. एक शब्द क्या, एक मात्रा भी ग़लत हुई तो तय मानिए कि संदेश मंज़िल तक नहीं पहुंचेगा. भाषा की समस्या अंग्रेज़ी या पश्चिमी भाषाओं का इस्तेमाल करनेवालों के लिए ये समस्या ज़्यादा गंभीर नहीं है क्योंकि इनमें ज़्यादातर एक ही से अक्षर हैं और उनका एक ही सा इस्तेमाल. लेकिन दुनिया में ऐसी भी भाषाएँ हैं जिनका रंगरूप बदलता रहता है. भारत में तो कहा ही जाता है कोस कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी. चीनी भाषा का हाल भी कुछ ऐसा ही है, देश में वही भाषा अलग-अलग अंदाज़ में लिखी और पढ़ी जाती है. और यही कहानी अरबी, फ़ारसी और उर्दू की भी है. अब विद्वानों की जमात सिर जोड़कर इस कोशिश में जुटेगी कि किस तरह ये पहेली सुलझाई जाए कि कंप्यूटर भी थोड़ा लिखा बहुत समझने की कला सीख ले. |
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