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पाकिस्तान का पहला ई-संग्रहालय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह कला के लिए एक जुनून की कहा जाएगा कि बहुत से लोगों के नाक भौं सिकोड़ने के बावजूद कुछ लोगों ने ऐतिहासिक महत्व की चीज़ों को वेबसाइट पर दिखाने की ठान ली है. यह पाकिस्तान का पहला ई-संग्रहालय होगा जिसमें बहुत सी धरोहरों को वेबसाइट पर पेश किया जाएगा ताकि कला के चाहने वालों को आसानी से देखने मिल सकें. ख़ासतौर से ऐसे में यह काम और भी मुश्किल है जब पाकिस्तान में संग्रहालयों में आने वालों की संख्या बहुत कम होती है. एक कलाकार क़ैसर ख़ान कहते हैं, “उन्हें ख़ासी मेहनत करनी पड़ेगी. यह सोचने की बात है कि कितने लोग वेबसाइट पर उन चीज़ों को देखने आएंगे.” इस जूनून के पीछे है लाहौर का प्रतिष्ठित फ़ाक़िर परिवार. फ़ाक़िर ख़ानदान के पूर्वज पंजाब के सबसे प्रभावशाली महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में चिकित्सक हुआ करते थे. महाराजा ने फ़ाक़िर ख़ानदान को बहुत सी बेशक़ीमती कलाकृतियों और हीरे जवाहरात से पुरस्कृत किया था. इस धरोहर को इस समय लाहौर के फ़ाक़िर ख़ाना संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है. फ़ाक़िर ख़ाना संग्रहालय के जन्मदाता सैफ़ुद्दीन फ़ाक़िर इस बात से बिल्कुल भी विचलित नहीं हैं कि कुछ लोग ई-संग्रहालय के विचार की आलोचना कर सकते हैं. “मैं जिस परियोजना पर काम करता हूँ वह मेरे दिल से शुरू होती है और मैं उसमें पूरी तरह लग जाता हूँ. मैं पंजाब का पुत्तर हूँ और पंजाब के बारे में बहुत भावुक हूँ.” “इसीलिए मेरी यह परियोजना पंजाब की तहज़ीब और धरोहर को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए है.” फ़ाक़िर ख़ाना संग्रहालय की पहले से ही एक सामान्य वेबसाइट है लेकिन फ़ाक़िर का कहना है कि ई-संग्रहालय इंटरनेट पर पूरा संग्रहालय होगा. ई-संग्रहालय को वजूद में लाने का श्रेय मुख्य रूप से सैफ़ुद्दीन फ़ाक़िर के भतीजे 29 वर्षीय फ़ाक़िर इफ़्तिख़ार को जाता है.
इफ़्तिख़ार को इंटरनेट का इस्तेमाल करते वक़्त एक दिन यह ख़याल आ गया कि क्यों न एक ई-संग्रहालय बना दिया जाए लेकिन वह इसकी लोकप्रियता के बारे में आश्वस्त नहीं थे. इफ़्तिख़ार कहते हैं, “मैं इस धरोहर को देखते हुए ही बड़ा हुआ हूँ और जब भी हमारे दोस्त इसे देखने आते, वे पूरे संग्रहालय में घूमते हैं.” “वे इस संग्रहालय में रखी हर चीज़ से जुड़ी कहानी में बहुत दिलचस्पी लेते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा ऐसी कहानियाँ सुनने के लिए बार-बार आते हैं.” इफ़्तिख़ार कहते हैं कि अब उनमें से बहुत से लोग विदेश चले गए हैं और इस संग्रहालय में रखी चीजों में से कुछ की तस्वीरें भेजने को कहते हैं ताकि उनकी कहानियाँ वे विदेशों में अपने दोस्तों को सुना सकें. और बस हो गया यही मौक़ा था कि फ़ाक़िर इफ़्तिख़ार के दिमाग़ में ई-संग्रहालय बनाने का विचार आ गया और उन्होंने यह विचार सैफ़ुद्दीन फ़ाक़िर के सामने रखा जिन्होंने बिना कोई देर किए इसे हरी झंडी दिखा दी.
इफ़्तिख़ार का कहना था, “चूँकि फ़ाक़िर ख़ाना संग्रहालय ने कभी अपनी चीज़ों का प्रचार या विज्ञापन नहीं किया इसलिए बहुत से लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं है और वे इस संग्रहालय में आए ही नहीं हैं.” “हम चाहते हैं कि हमारे संग्रहालय की सारी चीज़ों के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को पता चले और ई-संग्रहालय इसका एक आसान तरीक़ा हो सकता है.” फ़ाक़िर ख़ानदार को यह भी उम्मीद है कि ई-संग्रहालय के प्रचार-प्रसार बढ़ने से कुछ धन भी मिल सकेगा, जिसकी उन्हें सख़्त ज़रूरत है. तीन दशक से इस संग्रहालय का ख़र्च फ़ाक़िर ख़ानदान अपने निजी धन से ही चलाता आ रहा है जिससे धन की कमी भी हो रही है. फ़ाक़िर ख़ाना संग्रहालय में ऐतिहासिक महत्व की क़रीब 3000 वस्तुएं हैं और वेबसाइट पर हज़रत इमाम हसन का लिखा हुआ क़ुरआन और हस्तलिपि के बहुत से नमूने पेश किए जाएंगे. फ़ाक़िर इफ़्तिख़ार को अब 14 अगस्त की तारीख़ का इंतज़ार है जब वह अपना ई-संग्रहालय मैदान में उतारेंगे. “हम अपने ई-संग्रहालय का कैटलॉग तैयार करने में लगे हैं और यह एक महीने में पूरा हो जाना चाहिए, अगर सबकुछ ठीक ठाक रहा तो हम तय वक़्त पर अपना ई-संग्रहालय शुरू कर देंगे.” |
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