हीरों के बनने की दिलचस्प कहानी और राज़ बेशक़ीमती ब्लू डायमंड के

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- Author, बीबीसी मुंडो
- पदनाम, .
इस दुनिया में हीरे अरबों साल पहले बने थे. आज इनमें से कुछ हीरों की चमक से हमारी नजरें चौंधियाई हुई हैं.
ये शाश्वत प्रेम के वादे के तौर पर जाने जाते हैं. इन्हें समृद्धि और विलासिता के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है.
पुराने ज़माने में इन्हें सुकून देने वाला माना जाता था. कहा जाता है कि इनका इस्तेमाल ताक़त देता है. यह दुश्मनों, बुराइयों और दु:स्वप्नों से बचाव करता है.
भारत में हीरों का ज़िक़्र वेदों में हुआ है. हिंदू देवी देवताओं के भी ये पसंदीदा रहे हैं.
868 ईस्वी के बौद्ध धर्म से जुड़े 'हीरक सूत्र' के मुताबिक़, हीरा एक ऐसी वस्तु है जिसके ज़रिये आप दुनियावी भ्रम को वेध कर वास्तविक और शाश्वत चीज़ों पर प्रकाश डाल सकते हैं.
लेकिन प्राचीन ग्रीस में शायद इसकी सबसे अच्छी व्याख्या की गई है. ग्रीसवासियों ने इन्हें ईश्वर के आंसू कहा या फिर आसमान से गिरे सितारों का टुकड़ा माना.
हीरों के बारे में सबसे ज़बर्दस्त बात यह है कि इसकी सच्चाई असाधारण है. इससे जुड़ी मान्यताएं भी अनोखी हैं.

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हीरे को 'फैंटेसी' क्यों कहा जाता है?
हीरे जिस तत्व से बने है वही जीवन का भी आधार है और यह तत्व है कार्बन.
हीरे असाधारण तौर पर कठोर होते हैं. जिन हालातों में वे पैदा होते हैं उसमें वह भारी दबाव झेलने की क्षमता रखते हैं. फिर भी अगर हाइड्रोजन और तापमान का सही संयोग हो तो यह कार्बन डाइक्साइड बन कर उड़ भी सकता है.
हीरे असाधारण तौर पर आभा और चमक लिए हुए होते हैं. लेकिन ये बेहद कठोर भी होते है. ये ताप के सबसे अच्छे सुचालक होते हैं. तापमान की वजह से इनके आकार में काफी कम परिवर्तन होता है. क्षारीय और अम्लीय रसायनों के प्रति भी ये निष्क्रिय होता है. गहरी पराबैंगनी किरणों की वजह से यह पारदर्शी हो जाता है. यह उन चंद ज्ञात वस्तुओं में से एक है, जिसकी इलेक्ट्रॉन से नकारात्मक जुड़ाव है.
इस धरती पर काफी कम जगहों पर इनका प्राकृतिक तौर पर निर्माण होता है. इनका निर्माण धरती के नीचे सबसे दो ऊपरी परतों में होता है या फिर ये उल्कापिंडों के असर से बनते हैं.
हीरे धरती की सतह पर बड़े ही विस्फोटक तरीके से आते हैं. इतिहास में धरती के अंदर अब तक के जो सबसे बड़े विस्फोट हुए हैं, उनके नतीजे हैं ये हीरे. इन विस्फोटों की वजह से पैदा ज्वालामुखियों में कुछ की जड़ें धरती में काफी गहरी हैं.
सभी हीरे पारदर्शी नहीं होते. कुछ हल्के पीले तो कुछ भूरे रंग के होते हैं.
कुछ हीरे रंगीन भी होते हैं और उन्हें 'फतांसी' कहा जाता है. लाल, नीले और हरे रंग के हीरे तो लगभग दुर्लभ ही हैं. नारंगी, पीले और थोड़ा पीलापन लिए हरे रंग के हीरे सबसे आम हैं.
लेकिन एक बार जब हीरे बन जाते हैं तो इनके क्रिस्टल जैसे ढांचे में किसी भी धातु को धारण करने और इसे हिफाजत से रखने की क्षमता होती है. वैज्ञानिकों के लिए यह धरती की सबसे मोटी सतह में पाए जाने वाले खनिज की झलक दे देता है. साथ ही यह भी बताता है कि धरती के नीचे मीलों गहराई में क्या हालत है. इस मायने में ब्लू डायमंड या नीला हीरा बेहद असाधारण है.

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शुद्धता में कोई मुकाबला नहीं
हमारी दुनिया के ज्यादातर हीरे धरती से नीचे 150 किलोमीटर गहराई में बने हैं.
नीले हीरे पृथ्वी के सबसे निचले आवरण में चार गुना गहराई तक में पैदा होते हैं.
इस बात का पता 2018 में सामने आए एक अध्ययन से चला.
जेमोलोजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमरीका के भूगर्भशास्त्री इवान स्मिथ का कहना है कि हीरा जैसा रत्न काफी महंगा होता है, इसलिए वैज्ञानिक शोध के उद्देश्य से इन्हें हासिल करना मुश्किल होता है. स्मिथ इस अध्ययन के शीर्ष लेखक हैं.
हीरे न सिर्फ बेशकीमती होते हैं बल्कि शुद्धता के लिहाज से भी काफी उम्दा होते हैं. इनमें किसी दूसरी चीज के मिलने की गुंजाइश नहीं होती है. हीरे को छोड़कर कोई दूसरी धातु या इसके निर्माण के वक्त भी बनने वाली इससे मिलती-जुलती कोई खनिज इसमें नहीं मिल सकता.
हीरे की यह अपूर्णता ही इसके बारे में वैज्ञानिकों को और जानकारी देने में मददगार साबित होती है.
हालांकि वैज्ञानिकों ने 46 ऐसे ब्लू डायमंड का विश्लेषण करने में कामयाबी पाई है, जिनमें कुछ चीजें जुड़ी गई थीं. उनका मानना है कि ये धरती में 410 से लेकर 660 किलोमीटर की गहराई में पैदा हुए होंगे.
इनमें से कुछ हीरों के नमूनों से साफ हो चुका है इनका निर्माण 660 किलोमीटर से भी अधिक गहराई में हुआ है. यानी ये धरती के सबसे निचले आवरण में पैदा हुए हैं.
इस तरह देखें तो ये हीरे वास्तविक टाइम कैप्सूल साबित हुए हैं. यानी इनसे वो जानकारी मिलती है, जिन्हें खोजना लगभग असंभव सा होता है.
अमेरिकन म्यूजिम ऑफ हिस्ट्री के जेम एंड मिनरल रूप के क्यूरेटर और ज्योलॉजिस्ट जॉर्ज हर्लो ने बीबीसी रील नेचुरल से कहा, '' हम धरती के बिल्कुल अंदरुनी हिस्से में नहीं जा सकते. जबकि हीरों का निर्माण वहीं होता है. आमतौर पर वहां जो कुछ भी मौजूद होते हैं, उन्हें यह ढक लेता है.''
वह कहते हैं, ये एक तरह से अंतरिक्ष में खोजी अभियान की तरह होते हैं. आखिर में कुछ हीरे धरती की सतह पर मिल जाते हैं, और हमें इनके बारे में अध्ययन करने का मौका मिल जाता है.

ब्लू डायमंड : रहस्य के आवरण में लिपटी पहेली
ब्लू डायमंड लंबे समय से इतिहास का रहस्य बना हुआ है. अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि हीरे इतने बेहतरीन रंग लिए हुए क्यों होते हैं.
आखिर में पता चला कि इसमें बोरोन के अवशेष होते हैं. यह मेटलायड केमिकल होता है, जिसमें हीरे की बढ़त के दौरान इसमें मौजूद क्रिस्टल की जालियों में घुस जाने की क्षमता होती है.
लेकिन इस रहस्य से परदा उठने के बाद एक पहेली सामने आई-
जब हीरों का निर्माण धरती के निचले आवरण में हुआ, जहां इसकी परतों पर बोरोन मौजूद था तो आखिर इन्हें यह बोरोन कहां से मिला.
इस भू-रासायनिक पहेली का जवाब हमें धरती की गहराई का सुराग भी दे देता है.
यह अवधारणा स्मिथ की अगुवाई में काम करने वाले रिसर्च ग्रुप ने पेश की थी. इसका कहना है कि बोरोन समुद्र की सतह से धरती के गहरे परत की ओर गया. यह परिघटना उस समय घटी, जब इसके टेक्टोनिक प्लेट एक दूसरे के अंदर सरक रहे थे. इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं
पानी से भरे खनिजों में समा कर हीरा गहरे समुद्र तल तक अपना विस्तार कर लेता है. यहां तक कि यह समुद्री प्लेट के परत तक भी पहुंच जाता है.
धरती की सतह से इतनी दूर गहराई में पैदा हीरों में मिलने वाले बोरोन के अवशेष का पता चलना यह बताता है कि पानी से भरे खनिज पहले के अनुमान से ज्यादा गहरे तक धरती की गहरी परतों की ओर यात्रा करते हैं. यह बहुत अधिक गहराई में एक अलग जल चक्र की संभावना का पता देते हैं.
हर्लो कहते हैं ब्लू डायमंड या नीले रंग वाले हीरे न सिर्फ सुंदर और दुर्लभ होते हैं बल्कि ये बेहद दिचलस्प भी होते हैं. ये हमारी धरती के बारे में हमें बहुत कुछ सिखाते हैं.
















