लड़कियों के लिए गुड़िया और लड़कों के लिए भला कार क्यों?

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- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रितु कुछ दिनों में मां बनने वाली हैं. हरियाणा में रहने वाली रितु अपने बच्चे की हर इच्छा पूरी करने का अरमान रखती हैं और आने वाले मेहमान के लिए कमरे में खिलौने और ज़रूरत की सारी चीज़ें भी मौजूद हैं.
लड़की हुई तो पिंक रंग का जंपर सूट और गुड़िया और लड़का हुआ था ब्लू या नीले रंग का जंपर सूट और टेडी बेयर.
लेकिन जब ये सवाल पूछा गया कि लड़की को गुड़िया और लड़के के लिए ब्लू रंग का जंपर सूट क्यों तो बड़ी मासूमियत से उनका कहना था, ''क्योंकि लड़कियों को पिंक कलर अच्छा लगता है, क्या हमने गुड़ियों से नहीं खेला. लड़के थोड़ी ना गुड़िया से खेलते हैं.''

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गूगल पर अगर लड़की और लड़कियों के लिए खिलौने सर्च करें तो आपको खिलौनों में फ़र्क साफ़ नज़र आएगा.
गूगल पर लड़िकयों के खिलौनों में मेकअप सेट, किचन सेट और गुडियां आदि सब गुलाबी रंग से सराबोर मिलेगा और वहीं लड़कों में तरह-तरह की गाड़ियां, बिल्डिंग ब्लॉक और रोबोट मिल जाएंगे.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है ये किसने तय किया कि किस खिलौने से लड़की और किस खिलौने से लड़का खेलेंगे या लड़की के लिए पिंक और लड़के के लिए ब्लू रंग क्यों?
इन सवालों पर आगे चर्चा करेंगे लेकिन पहले ये जान लेते हैं कि हम इस विषय पर चर्चा क्यों कर रहे हैं.
दरअसल डेनमार्क की खिलौना बनाने वाली कंपनी लेगो ने घोषणा की है कि वो अपने उत्पादों और मार्केटिंग से लैंगिक असमानता या जेंडर स्टीरियोटाइप हटा देगा.
लेगो कंपनी ने ये फ़ैसला एक शोध के बाद किया है.
लेगो की चीफ़ मार्केटिंग ऑफ़िसर जुलिया गोल्डिन ने बयान में कहा है, ''रचनात्मक खेल (क्रिएटिव प्ले) बच्चों में आत्म विश्वास, रचनात्मकता और संचार कौशल को बढ़ाने में फायदेमंद होते हैं लेकिन हम ये अभी भी अनुभव करते हैं कि पुराने चले आ रहे स्टीरियोटाइप ने एक्टिवीटिज़ पर ठप्पा लगा दिया है कि ये एक विशेष जेंडर के लिए सही हैं और लेगो ग्रूप में हम जानते हैं इसे सही करने में हमारी भूमिका होनी चाहिए.''

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शोध का क्या परिणाम था?
लेगो ने एक शोध करने वाली संस्था जीना डेविस इंस्टीट्यूट ऑन जेंडर इन मीडिया के साथ शोध किया जिसमें सात देशों के 7000 लोगों से बातचीत की गई.
जिसमें पहले 6 से 14 साल के बच्चों के अभिभावकों के साथ सर्वे में बात की गई और फिर बच्चों के साथ.
इस सर्वे में अमेरिका, चीन, जापान, पोलैंड, रूस, चेक रिपब्लिक और यूके से अभिभावकों और बच्चों को शामिल किया गया.
इस शोध में पाया गया कि लड़कियां, लड़कों के मुकाबले लिंग भेद को लेकर दबाव कम महसूस करती हैं साथ ही वे अलग अलग तरह के रचनात्मक खेल को खुले मन से अपनाती हैं जबकि समाज या अभिभावक में ये खुलापन नहीं नज़र आता जैसे लड़कियां फुटबॉल खेलें और लड़के बैले सीखें, इसे लड़कियां तो सामान्य मानती हैं लेकिन लड़के इस बात सामान्य नहीं मानते.
वहीं लड़कों को ऐसे खिलौने जो फेमनिन या लड़कियों के लिए समझे जाते हैं उनसे खेलने में शर्म आती है या उन्हें डर लगता है कि अगर वो उन खिलौनों से खेलेंगे तो उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा.

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साथ ही अभिभावक भी अपनी बेटियों को लड़कों के मुकाबले पांच गुना ज़्यादा डांस या ड्रेसिंग अप या अच्छे से तैयार होने जैसी एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करते हैं और तीन गुना उन्हें बेकिंग या कुकिंग जैसी एक्टिविटीज़ के लिए बढ़ावा देते हैं वहीं दूसरी तरफ चौगुना लड़कों को खेल या दोगुना कोडिंग टॉयस के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.
लड़के और लड़कियों के एक खिलौने
सुहासिनी पॉल टॉय डिज़ाइनर हैं और 300 से ज़्यादा खिलौने डिज़ाइन कर चुकी हैं. वे लेगो के कदम को सकारात्मक और समाज के लिए प्रगतिशील कदम बताती हैं.
सुहासिनी पॉल के क्लाइंट भारत में ही नहीं थाइलैंड, इटली, यूके,अमेरिका, तुर्की और फ्रांस जैसे देशों में भी है. वे किंडर जॉय, डिज़नी, हेप और छोटा भीम जैसे ब्रैंड्स के लिए भी खिलौने बना चुकी हैं.
उनके अनुसार उन्होंने एक टॉय डिज़ाइनर होने के नाते अपने खिलौनों में नारंगी और हरे रंग का इस्तेमाल किया है ताकि वो एक खाके में न कैद हो जाएं. ये लड़के और लड़कियों दोनों को आकर्षित करें और दोनों उनसे खेल सके.

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वे बीबीसी बातचीत में कहती हैं, ''दुनिया में कई ऐसी खिलौने बनाने वाली कंपनियां हैं जो जेंडर आधारित खिलौने बना रही हैं क्योंकि लोग ऐसे ही खिलौने खरीदना पसंद करते हैं. यहां मांग और सप्लाई की बात है. लेकिन बड़ी ट्रेंड सेटिंग कंपनियां अगर जेंडर न्यूट्रल खिलौने बनाए जैसा कदम लेगो ने उठाया है तो मेरा मानना है कि इस इंडस्ट्री में मौजूद छोटी कंपनियों को भी प्रेरणा मिलेगी और वो उनके नक्शेकदम पर चलेंगी और इससे ऐसे खिलौनों की मांग भी बढ़ेगी.''
लेकिन बाज़ार क्या कहता है?
फ़नस्कूल खिलौने बनाने वाली कंपनी है. कंपनी के सीईओ आर जेसवंत कहते हैं कि भारत का खिलौना बाज़ार नया है. पुराने बाज़ारों यानी ऐसे देश जहां खिलौनों का बाज़ार काफ़ी सालों से है वहां ऐसा चलन ज्यादा है कि जहां लड़के और लड़कियां एक दूसरे के खिलौनों के साथ खेलतें हैं.
लेकिन वे मानते हैं कि हाल में ये देखा जा सकता है कि लड़के और लड़कियां एक दूसरे के खिलौनों के साथ खेल रहे हैं और ये चलन नज़र भी आ रहा है.

वे चेन्नई से बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''मैं ये नहीं कहूंगा कि ये हर किस्म के खिलौनों पर लागू होता है.हम इस चलन के आधार पर नतीजा नहीं निकाल सकते.निश्चित तौर कुछ खिलौने लड़कों के लिए बनाए जाते हैं और कुछ लड़कियों के लिए.जैसे गुड़ियां से लड़कियां ज्यादा खेलना पसंद करती हैं. और फ़नस्कूल ने फिलहाल ऐसा कोई कदम नहीं उठाया कि जेंडर न्यूट्रल खिलौने बनाए.''

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वे आगे कहते हैं कि भारत में खिलौने का बाज़ार अभी तैयार हो रहा है और जैसे-जैसे ये पुराना होगा इस तरह का चलन बढ़ेगा. लेकिन ये तयशुदा तौर पर कहा जा सकता है कि जेंडर न्यूट्रल खिलौनों का चलन बढ़ा है.
उनके अनुसार भारत एक ऐसा देश है जहां दुनिया के सबसे ज़्यादा बच्चे रहते हैं लेकिन खिलौनों के बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम है.वो उम्मीद करते हैं कि भविष्य में ये हिस्सेदारी बढ़ेगी.
लेकिन खिलौनों में फ़र्क क्यों?
पंजाब यूनिवर्सिटी में विमेन स्टडिज़ विभाग में डॉ अमीर सुल्ताना का कहना है कि जब आप लड़की और लड़कों के खिलौने देखेंगे तो पाएंगे जहां लड़कियों के ज्यादातर खिलौने पिंक या सॉफ्ट कलर के होंगे तो लड़कों के ब्लू.
वे रंगों के लेकर सिंद्धात या थ्योरी देती हैं.
बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, ''जैसे पिंक सुंदरता का प्रतीक होता है और ब्लू को आप आसमान से जोड़ते हैं कि जो असीमित है यानी आकाश या समुद्र. नीला रंग मज़बूती बताता है.''

वे अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, ''लड़कियों के खिलौने देखेंगे तो उसमें पितृसत्तात्मक सोच नज़र आती है क्योंकि आप उसके खिलौने भी नर्चरिंग रोल या पालन पोषण करने वाली भूमिका में देखेंगे. तो वैसे ही खिलौने जैसे गुड़िया, किचन सेट, या मेकअप सेट देखेंगे वहीं लड़कों के लिए एड्वेन्चर से जुड़े खिलौने होंगे, जैसे रोबोट, गाडियां या गन, जो पुरुषों की आक्रमकता को दिखाता है.''
साथ ही वे कहतीं है कि लड़कियों को मल्टीटास्किंग सिखाई जाती है जैसे घर संभालना ,बच्चों को देखना. उनके लिए नए आयाम विकल्प के तौर पर बताए जा रहे हैं लेकिन लड़कों को अभी भी ये नहीं सिखाया जा रहा है.

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए साक्षी सिंघल कहती हैं कि खिलौने बनाने वाली कंपनियों का लड़के और लड़कियों के अलग खिलौने बनाने का मकसद मुनाफ़ा कमाना रहा होगा.
लेकिन अगर आप देखेंगे तो कई दुकानों में लड़कियों और लड़कों के खिलौने के सेक्शन ही अलग होते हैं तो वहां जाकर बच्चों को लगता है कि यही खिलौने मेरे लिए हैं. वैसे ही सोशल और जेंडर रोल भी बांट दिए गए हैं और वहीं बच्चे देखते हैं कि मां कहां काम कर रही हैं और पिता बाहर जाकर काम करते हैं.
साक्षी सिंघल एक रिसर्च स्कॉलर हैं और आईआईएलएम यूर्निवर्सिटी में जेंडर स्टडीज पढ़ाती हैं
वो आगे बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, ''बेटियों को पैरेंट्स आगे बढ़ा रहे हैं, एक समानता लाने की कोशिश हो रही है, विकल्प दिए जा रहे हैं लेकिन उसी तरह से लड़कों को नहीं सिखाया जा रहा. उन्हें एक्सप्रेस करना नहीं सिखाया जाता उनसे स्ट्रॉन्ग रहने की ही अपेक्षा की जाती है.''
वैसे ही अगर लड़के गुड़िया से खेल रहे होंगे तो उनका मज़ाक उड़ाया जाएगा और उन्हें कमज़ोर समझा जाएगा क्योंकि उसे लड़कियों से जोड़ा जाता है.
लेगो ने जो शोध किया है उसमें भी शोधकर्ताओं का कहना है कि ये जेंडर स्टीरियोटाइप बच्चों के क्रिएटिव या रचनात्मक विकास पर प्रभाव डालती है और आगे जाकर वो कैसा करियर चुनते हैं उस पर भी असर पड़ता है.
साक्षी सिंघल मानती हैं कि खिलौने एक बच्चे के विकास में भी अहम होते हैं ऐसे में जेंडर न्यूट्रल के अलावा ऐसे खिलौने बनाए जाएं जो बच्चों का भावानात्मक, सामाजिक, नैतिक और कॉग्निटिव या संज्ञात्मक विकास करने में मदद करें.
उनके अनुसार खिलौनों का ना कोई रंग होता है ना कोई जेंडर.
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