'कुर्सी नहीं, ज़मीन पर बैठिए' - दलित मुखिया के साथ भेदभाव की कहानी

- Author, नटराजन सुंदर
- पदनाम, बीबीसी तमिल सेवा के लिए
तमिलनाडु में एक ग्राम पंचायत के उपाध्यक्ष और एक वॉर्ड मेंबर पर ग्राम पंचायत की एक दलित महिला अध्यक्ष के साथ कथित तौर पर जातीय आधार पर भेदभाव का आरोप लगा है.
उन पर आरोप लगा है कि वे ग्राम परिषद की बैठकों के दौरान दलित महिला पंचायत अध्यक्ष और ग्राम परिषद की वॉर्ड सदस्य एक दलित महिला को ज़मीन पर बैठने के लिए मजबूर करते हैं जबकि अन्य सदस्य कुर्सियों पर बैठते हैं.
तमिलनाडु में 12,000 से ज्यादा ग्राम पंचायत परिषदें हैं और आजादी के बाद से ही स्थानीय निकाय के दलित समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ जातिगत भेदभाव और उनके साथ दुर्व्यवहार के मामले आते रहते हैं. इसके बावजूद हालिया घटना उन चुनिंदा मामलों में है जहां क़ानूनी कार्रवाई की गई है.
स्थानीय निकाय के दलित प्रतिनिधियों की हत्या या उन पर जानलेवा हमलों जैसे संगीन मामलों में ही अब तक कार्रवाई होती आई है.
ऐसा इस वजह से होता है क्योंकि ऐसे अपराधों पर लोगों का गुस्सा सामने आता है और ये घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनती हैं. हालांकि, इन सभी मामलों में भी आरोपियों को सजा मिलने की कोई गारंटी नहीं होती है.
बीबीसी तमिल सेवा ने अध्यक्ष राजेश्वरी सरवणकुमार और उपाध्यक्ष मोहनराज दोनों से बात की और इस घटना के बारे में जानने की कोशिश की है.
परिषद के एक पुरुष सदस्य और पंचायत सचिव जो कि महिला हैं, उन्हें पुलिस ने शनिवार को गिरफ़्तार कर लिया है. हालांकि, रविवार दोपहर तक मुख्य अभियुक्त और उपाध्यक्ष को पकड़ा नहीं जा सका था.

क्या है मामला और यह दूसरों से अलग क्यों है?
हालांकि, तमिलनाडु में स्थानीय निकायों में दलितों के साथ भेदभाव एक आम बात है और यह अक्सर ख़बरों में आता रहता है. हालांकि, ज्यादातर बार इन मामलों में किसी को भी सज़ा नहीं हो पाती है. लेकिन, यह मामला दूसरों से अलग है.
कुड्डालोर जिले के थेरकू थित्ताई गांव के ग्राम पंचायत दफ्तर में महिला ग्राम प्रधान राजेश्वरी सरवणकुमार की जमीन पर बैठे हुए की तस्वीर सोशल मीडिया पर आई थी.
इस फोटो में राजेश्वरी के साथ भेदभाव वाले व्यवहार को देखा जा सकता है. हालांकि, ग्राम परिषद के दूसरे सदस्य कुर्सियों पर बैठे देखे जा सकते हैं.
सोशल मीडिया में इस फोटो के बड़े पैमाने पर सर्कुलेशन से क्षेत्रीय स्तर पर मीडिया का ध्यान इस पर गया. सोशल मीडिया पर यह फोटो वायरल नहीं होती तो शायद यह मामला जिले के स्तर तक ही सिमट जाता.
इसकी वजह से जिला प्रशासन को उपाध्यक्ष, ग्राम परिषद के एक अन्य पुरुष सदस्य सुकुमार और पंचायत सचिव सिंदुजा के खिलाफ मामला दर्ज करना पड़ा. यह मामला एससी और एसटी एक्ट के तहत दर्ज किया गया है.

'राष्ट्रीय ध्वज फहराने नहीं दिया'
राजेश्वरी सरवणकुमार बताती हैं कि पिछले साल जब से उन्हें चुना गया है तब से ही उन्हें और दलित समुदाय से आने वाली एक और महिला वॉर्ड सदस्य को ग्राम परिषद की बैठकों में कुर्सियां नहीं दी जाती हैं.
उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस के मौके पर उन्हें राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोक दिया गया था और जातीय आधार पर अपमानित होने से बचने के लिए उन्हें स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में शिरकत नहीं करने के लिए मजबूर होना पड़ा था.
राजेश्वरी कहती हैं, "गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज उपाध्यक्ष के पिता ने फहराया. ग्राम परिषद की बैठक में मैं जब भी कुछ कहना चाहती हूं तो उपाध्यक्ष मुझे चुप करा देते हैं. वह कह देते हैं कि मुझे कुछ नहीं आता है."

'क्योंकि हम दलित हैं'
उसी ग्राम परिषद की एक और महिला वॉर्ड सदस्य सुगंती बताती हैं कि उन्हें ग्राम परिषद के सदस्य के तौर पर न्यूनतम मानवीय सम्मान भी नहीं दिया जाता है. वे कहती हैं, "हमें यह सब इसलिए सहना पड़ता है क्योंकि हम दलित हैं."
इस मामले के मुख्य अभियुक्त मोहनराज ने फोन पर बताया कि अध्यक्ष झंडारोहण के कार्यक्रम में शरीक नहीं हुईं. उन्होंने यह भी कहा कि मीटिंग्स के दौरान वे अपनी खुशी से ही ज़मीन पर बैठी थीं. उन्होंने किसी भी तरह के भेदभाव से इनकार कर दिया.
उन्होंने यह भी कहा कि राजेश्वरी ने महीनों तक इस मसले को नहीं उठाया और आरोप लगाया कि इस मसले को लोगों के बीच अब लाने के पीछे उनके ग़लत मकसद हैं.

'मामला दर मामला कार्रवाई पर्याप्त नहीं'
कुड्डालोर जिले के एसपी श्री अभिनव ने कहा कि मोहनराज समेत तीन लोगों के ख़िलाफ़ जातिगत भेदभाव के लिए केस दर्ज किया गया है. साथ ही इन पर एक सरकारी अफसर को उनके काम करने से रोकने का भी मुकदमा कायम किया गया है.
दोषी पाए जाने पर आरोपियों को छह महीने से लेकर पांच साल तक की सज़ा भुगतनी पड़ सकती है.
विटनेस ऑफ जस्टिस नामक एनजीओ के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर और जाति-विरोधी एक्टिविस्ट आई पांडियान कहते हैं कि सरकारी अफसरों को स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों के ख़िलाफ़ होने वाले जातिगत भेदभाव को एक-एक मसले के तौर न देखकर सामूहिक तौर पर देखने की जरूरत है.
वे दलित प्रतिनिधियों के साथ प्रशासनिक अधिकारियों को कम से दो फॉलो-अप मीटिंग्स करने की सलाह देते हैं ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
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