इसराइल और यूरोप की कंपनियां कैसे अब खाने के लिए टिड्डे और झींगुर जैसे कीड़े तैयार कर रही हैं?

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- Author, नताली लिस्बन
- पदनाम, तेल अवीव, बीबीसी न्यूज़
कई कंपनियां अब मानव उपभोग के लिए टिड्डियों और खाने के कीड़ों की खेती कर रही हैं.
काफी लंबे वक़्त से सुझाव दिया जा रहा है कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए हमें कीड़े खाना शुरू कर देना चाहिए. लेकिन हम में से कइयों को यह विचार अच्छा नहीं लगता.
इसराइल की एक कंपनी को उम्मीद है कि स्वादिष्ट बनाने के कई मसाले मिलाने से ये नापसंदगी दूर हो सकती है.
खाद्य तकनीक की कंपनी हरगोल के प्रमुख ड्रोर तामीर भूरे रंग के मिठाई का एक पैकेट खोलते हुए कहते हैं, ''खाकर देखिए.''
गम्मी (एक तरह की जेली) को सोयाबीन की चटनी या जिलेटिन के साथ पैक करने की बजाय इसे प्रोटीन के साथ पैक किया गया है. इस प्रोटीन को खाने योग्य कीड़ों यानी टिड्डों से बनाया जाता है.
ड्रोर तामीर कहते हैं, "टिड्डों का स्वाद अखरोट, मशरूम, कॉफी और चॉकलेट जैसा होता है. लेकिन इसे हम कई स्वादों मे पेश कर सकते हैं. गम्मी नारंगी और स्ट्रॉबेरी स्वाद में आती है."

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अरब के लोग लंबे समय से कीड़े खाते हैं
इसराइली उद्यमी तामीर का कहना है कि बच्चे में दादी से कहानियां सुनने के बाद वो टिड्डों को देखकर मोहित हो जाते थे. उनकी दादी सामूहिक खेती वाली एक जगह (किबुत्ज़) पर खाना बनाती थीं.
वो कहते हैं, "मुझे 1950 के दशक के बारे में पता चला. तब इसराइल को खाने-पीने की दिक्कतों के साथ अफ्रीका से उड़कर आने वाले टिड्डों के झुंड से फसलों की बर्बादी, दोनों का सामना करना पड़ा."
"किबुत्ज़ के अधिकांश लोग टिड्डों को डराने के लिए खेतों की ओर भागे, लेकिन यमन और मोरक्को के यहूदी लोगों ने खाने के लिए कई टन टिड्डों को जमा कर लिया. और उसी समय उन्हें पता चला कि पूरी दुनिया के अरब लोग टिड्डे खाते है."
अफ्रीका, एशिया, मध्य अमेरिका और मध्य पूर्व के लोग लंबे समय से कीड़े खा रहे हैं. हालांकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कई लोगों के लिए यह फालतू की बात है.

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पश्चिमी देशों में भी सूरत बदल सकती है
ड्रोर तामीर को ये सूरत बदलने की उम्मीद है. अब उनकी कंपनी के कई उत्पाद पेश होने वाले हैं. मिठाइयों के अलावा एनर्जी बार भी पेश होंगे.
यदि आपको अभी भी नहीं लगता कि कीड़े कभी पश्चिमी देशों में कभी खाए जा सकेंगे, लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण संबंधी चिंताओं और दुनिया की आबादी के बढ़ने के चलते हो सकता है कि कोई विकल्प ही न बचे.
अनुमान है कि 2050 तक दुनिया की आबादी मौजूदा 7.7 अरब से बढ़कर 9.8 अरब तक पहुंच जाएगी.
कइयों का मानना है कि और दो अरब लोगों को खिलाने के लिए पारंपरिक खेती से होने वाली उपज पर्याप्त नहीं होगी. साथ ही, पर्यावरण की बेहतरी के लिहाज से प्रोटीन के लिए कीड़ों को खाना, गाय, भेड़ और अन्य जानवरों को पालने की तुलना में कहीं अच्छा होगा.

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ब्रिटेन की फूड स्टैंडर्ड्स एजेंसी के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. रॉबिन मे कहते हैं, "हमारे भोजन में प्रोटीन बहुत जरूरी है, लेकिन सबसे अधिक प्रोटीन स्रोत वाले हमारे भोजन अक्सर पर्यावरण या नैतिकता की चिंताओं से जुड़े होते हैं. उदाहरण के लिए मांस या डेयरी उत्पाद."
वो कहते हैं, "कुछ कीड़े जैसे कि झींगुर या फ्रीज-ड्राय मीलवर्म (भौरों का लार्वा), सस्ते, आसानी से पैदा होने वाले, कम वसा वाले और मांस की तुलना में पर्यावरण पर कम प्रभाव डालने वाले होते हैं. कई कीड़े कचरे भी खाते हैं और ऐसा करके वो उपयोगी 'रीसाइक्लिंग' सेवा भी देते हैं. ऐसे में, इससे समाज को होने वाले लाभ काफी अहम हैं."
इसके साथ ही प्रो. रॉबिन, फार्म में तैयार होने वाले कीड़ों के बारे में कहते हैं कि इसे लेकर कुछ सवालों के जवाब अभी नहीं मिल सके हैं.
वो कहते हैं, "कीड़ों को फार्म में तैयार करने के तरीके और कम समय में उसका उपयोग करने को लेकर हम ज्यादा नहीं जानते. साथ ही कीड़ों से तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों के बारे में भी हम उतना नहीं जानते जितना बीफ आदि के बारे में जानते हैं."
उन्होंने आगे कहा कि इस स्तर पर एक अहम सवाल ये है कि क्या कुछ कीड़े प्रोटीन एलर्जी पैदा कर सकते हैं या मानव माइक्रोबायोम यानी हमारे शरीर में रहने वाले जीवाणुओं और रोगाणुओं पर ख़ास असर डाल सकते हैं.

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इसराइल में टिड्डियों की खेती
हालांकि तामीर को भरोसा है कि पर्यावरण और स्वास्थ्य को होने वाला लाभ कीड़ों को आहार का हिस्सा बनाने के लिए पर्याप्त है.
तामीर की कंपनी हरगोल उत्तरी इसराइल में सौर ऊर्जा से चलने वाली एक इनडोर केंद्र में टिड्डियों को तैयार करती है. वहां तैयार होने वाली मुख्य प्रजाति प्रवासी टिड्डी की है. लेकिन उस केंद्र में रेगिस्तानी टिड्डों और नसेन नाम की झींगुर की एक किस्म को भी तैयार किया जाता है.
वो कहते हैं, "हम अपने केंद्र में एक साल में 40 करोड़ टिड्डियों को तैयार कर सकते हैं. इस कीट को पूरी तरह से विकसित होने में सिर्फ 29 दिन ही लगते हैं."
उनका दावा है कि बीफ की तुलना में टिड्डियों की खेती से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 99 फ़ीसदी कम होता है. पानी की खपत भी 1,000 गुना कम होती है और कृषि योग्य भूमि का उपयोग तो 1,500 गुना कम हो जाता है.
तामीर ये भी बताते हैं कि उनके पास कोषर और हलाल दोनों टिड्डी हैं. इसका अर्थ है कि उन्हें यहूदी और मुसलमान दोनों खा सकते हैं.
नए ढंग की अर्थव्यवस्था में बिज़नेस, अर्थव्यवस्था और कामकाजी जीवन सब कुछ तेजी से बदल रहा है.

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आप खाने के लिए कीड़े खरीद सकते हैं या नहीं, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस देश में रहते हैं.
ब्रिटेन में, आप उन्हें 'ईटग्रब' और 'होराइज़न इन्सेक्ट्स' जैसी ऑनलाइन कंपनियों से खरीद सकते हैं. हालांकि इस क्षेत्र की मांग है कि ब्रिटेन की सरकार महंगे विनियमन को हटा ले.
वहीं यूरोपीय संघ में, प्रवासी टिड्डों और पीले मीलवर्म (भौरों के लार्वा) को इस साल मानव उपभोग के लायक मान लिया गया है.
फ्रांस की कंपनी 'यन्सेक्ट' मीलवर्म से बने कई तरह के प्रोटीन पाउडर बनाती है. पहले से ही कई ब्रांडों के एनर्जी बार, पास्ता और बर्गर में ये प्रोटीन पाउडर पाए जाते हैं.

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कीड़ों के फायदे बताने वाले दावे
कंपनी के सीईओ एंटोनी ह्यूबर्ट का कहना है कि यह प्रोटीन "पूरी तरह से प्राकृतिक" है और कई जानवरों के मांस, सॉसेज, हैम्स और ब्रेडेड चिकन उत्पादों का "कम संसाधित विकल्प" है.
मास्ट्रिच विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन जिसमें बताया गया है कि कीड़ों के प्रोटीन दूध से मिलने वाले प्रोटीन की तरह ही फायदेमंद होता है, के बारे में बताते हुए वो कहते हैं, "दोनों का पाचन, अवशोषण और मांसपेशियों को मजबूत करने की क्षमता समान पाई गई."
फिर भी ब्रिटिश न्यूट्रिशन फाउंडेशन की संचार प्रबंधक ब्रिजेट बेनेलम का कहना है कि अभी इस बारे में और शोध करने की जरूरत है.
संभावित एलर्जी के बारे में प्रो. मे की चिंताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को कीड़े खाने से उसी तरह एलर्जी हो सकती है, जैसे किसी को शेलफिश खाने से होती है.
वो बताती हैं कि कुछ कीड़ों के खाने को लेकर कई अनसुलझे सवाल अभी भी बने हुए हैं. इससे मनुष्यों में जहरीले पदार्थों या कीटनाशकों के जाने का ख़तरा हो सकता है. वो कहते हैं, "अगर कीड़े खाने को आम आदत बनाना है तो इन समस्याओं को दूर करने की जरूरत है."
दूसरी ओर तामीर स्वीकार करते हैं कि कीड़ों से घीन महसूस करने की आदत इस उद्योग की सबसे अहम चुनौतियों में से एक है. लेकिन वो कहते हैं, "मुझे भरोसा है कि इसे जल्द ही व्यापक स्वीकृति मिल जाएगी.''
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