कोरोना संकट: क्या लॉकडाउन ने लोगों को आलसी बना दिया है?

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में दौड़ती एक महिला

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    • Author, फर्नांडो दुआर्ते
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

जब कोविड-19 महामारी ने दस्तक दी उस वक्त शार रीड उस वक्त बहुत अच्छी स्थिति में नहीं थीं. वे हाल में ही यूके के एक नए शहर पहुंची थीं. वे इस शहर में बतौर वकील अपनी ट्रेनिंग के लिए पहुंची थीं और पीछे घर पर उनका परिवार दो दोस्त रह गए थे.

अस्थमा की मरीज़ रीड को लॉकडाउन के दौरान खुद को बचाना पड़ा. उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं हताश, अकेलापन और परेशान महसूस करती थी. मैं बाहर नहीं जाना चाहती थी. इस दौरान मैंने केवल नेटफ्लिक्स देखकर ही वक्त काटा."

वे कहती हैं, "मेरे स्टेप काउंट बेहद ख़राब थे. मैं दिन में करीब 2,000 क़दम ही चल रही थी."

हालांकि, फिटनेस नापने के लिए स्टेप्स को गिनना एक विवादित चीज रही है और हालिया मेडिकल सलाह में कहा गया है कि एक्सरसाइज करने की तीव्रता उसकी संख्या से कहीं ज्यादा मायने रखती है, लेकिन स्टडीज से पता चला है कि ज्यादा स्टेप काउंट से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है.

30 साल की शार 'इनैक्टिविटी पैंडेमिक' यानी महामारी के दौरान आलसीपन का सटीक उदाहरण हैं. एक्सपर्ट्स को लग रहा है कि पूरी दुनिया में लॉकडाउन के चलते बड़े पैमाने पर लोग इस चीज का शिकार हो रहे हैं.

एक्सरसाइज में कमी

शार रीड

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अब तक के सबसे व्यापक सर्वे में एक्टिविटी ट्रैकर बनाने वाली कंपनी फिटबिट ने दुनियाभर के 40 लाख यूजर्स के फिजिकल एक्टिविटी डेटा का विश्लेषण किया है.

यह डेटा मार्च और जून दोनों महीनों का लिया गया है.

इस विश्लेषण में पाया गया है कि लॉकडाउन के दौरान लोगों के चले गए औसत स्टेप्स 2019 के इन्हीं महीनों के मुकाबले काफी कम थे.

इससे भी अहम यह है कि अगर जून महीने का डेटा देखा जाए तो पता चलता है कि ऐसी जगहों पर जहां लॉकडाउन हटा लिया गया था या इसमें ढील दे दी गई थी वहां पर भी लोगों के एक्टिविटी का स्तर पिछले साल के बराबर नहीं रहा था.

सभी आयु वर्गों में, युवा लोगों (18-29 साल) के एक्टिविटी लेवल कम रहे थे.

ब्रिटिश सोसाइटी ऑफ लाइफ़स्टाइल मेडीसिन के डायरेक्टर और रीजनल डायरेक्टर पूनम कृषण कहते हैं, "ज़्यादा तनाव हमारी नींद पर बुरा असर डासता है. इससे हमें थकान लगती है. इससे हमारा एनर्जी लेवल कम हो जाता है और हमारी एक्सरसाइज करने की इच्छा कम हो जाती है."

वे कहते हैं, "जब हम एक्सरसाइज नहीं करते हैं तो हम ख़राब खाने का चुनाव करते हैं जो कि हमें एक नकारात्मक माहौल में डालता है और हमारा शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य ख़राब होता है."

बीमारियों के बढ़ने का ख़तरा

रोम में एक महिला

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डॉक्टर कृषण उन वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य अधिकारियों में शुमार हैं जो इस बात का डर जता रहे हैं कि फ़िटनेस लेवल में बड़ी गिरावट से गंभीर बीमारियों में भी इजाफ़ा हो सकता है. इनमें मोटापा और दिल की बीमारियां शामिल हैं.

इसके अलावा, कुछ बीमारियां ऐसी भी हैं जो कि लोगों को कोविड-19 के ज़्यादा ख़तरे में डालती हैं. पूरी दुनिया में कोरोना वायरस की दूसरी लहर की रिपोर्ट्स के बीच यह एक चिंता पैदा करने वाली बात है.

लेकिन, इसके और ज़्यादा बड़े प्रभाव भी हैं.

कई देशों ने पाया है कि लॉकडाउन के उपायों से उनकी आबादी में कुछ हद तक लोगों का मोटापा बढ़ा है. मिसाल के तौर पर, ब्राजील में देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक यूएफएमजी के कराए एक सर्वे के मुताबिक महामारी के दौरान हर 10 में से करीब चार लोगों का वजन बढ़ गया है.

इटली, फ्रांस, यूके और इजराइल उन देशों में शुमार हैं जहां लॉकडाउन के दौरान लोगों के वजन बढ़े हैं.

महामारी के चलते निष्क्रियता से विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी चिंतित है. इसके चलते संस्थान ने हैशटैग #हेल्दीएटहोम चलाया है. इसमें सामान्य अभ्यासों और उम्र के लिहाज से कितनी एक्सरसाइज करनी चाहिए इसकी जानकारी दी गई है.

मेक्सिको में अलर्ट

मेक्सिको सिटी पार्क

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मेक्सिको की ही बात करते हैं. यह एक ऐसा देश है जहां सर्वे में शामिल देशों में सबसे ज्यादा स्टेप काउंट में गिरावट दर्ज की गई है. फ़िटबिट के डेटा से पता चलता है कि जून 2020 में एक साल पहले के इसी महीने के मुक़ाबले मेक्सिको में स्टेप काउंट में करीब 80 फ़ीसदी गिरावट आई है.

मेक्सिको फ़िलहाल कोविड-19 की वजह से सबसे ज़्यादा मौतों (11 अगस्त तक 53,000 मौतें) के लिहाज से दुनिया में तीसरे नंबर पर है.

मरने वालों में 70 फ़ीसदी लोगों में पहले से हाइपरटेंशन, डायबिटीज़ या मोटापे जैसी बीमारियां मौजूद थीं.

बच्चों में संक्रमण और मौत के मामलों को लेकर ख़ासतौर पर चिंता जताई गई है.

मेक्सिको के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, 12 अप्रैल से 8 जून के बीच नए केस 84 से बढ़कर 2,600 पर पहुंच गए हैं.

बच्चों के लिए काम करने वाली यूएन की एजेंसी यूनिसेफ ने 13 से 30 साल के करीब 8,000 युवाओं का सर्वे किया है. इस सर्वे में पता चला है कि इनमें से क़रीब आधे महामारी के दौरान कम एक्सरसाइज कर रहे हैं.

जापान का एक बुजुर्ग

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यूनिसेफ के न्यूट्रिशनिस्ट माउरो ब्रेरो कहते हैं, "इनमें से कई स्कूल नहीं जा रहे हैं या अपने घरों से बाहर निकलने से डर रहे हैं."

फ़िटबिट की स्टडी से पता चलता है कि पूरी तरह से लॉकडाउन में नहीं गए देशों में भी स्टेप काउंट में गिरावट आई है.

जापान में जून 2020 में एक्टिविटी 2019 के मुक़ाबले गिरावट आई है. ये आंकड़े बताते हैं कि लोग अपने रुटीन को कायम रखने में खुद को ज़्यादा सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे हैं.

जापान की बूढ़ी होती आबादी के लिहाज से यह एक अहम घटनाक्रम है. टोक्यो की सुकुबा यूनिवर्सिटी के रिसर्चर को उम्रदराज लोगों में एक्टिविटी टाइम में गिरावट मिली है. गौरतलब है कि जापान की 28 फीसदी आबादी 65 या उससे ज्यादा उम्र की है.

भारत में डायबिटीज़ के मामले को लेकर चिंताएं

एक भारतीय जोड़ा

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भारत में भी जून में औसत स्टेप काउंट 11 फीसदी कम रहीं. लेकिन, यहां 'डायबिटीज महामारी' को लेकर भी बड़ी चिंताएं हैं. भारत डायबिटीज़ से सबसे बुरी तरह से प्रभावित देशों में से एक है. यहां 7 करोड़ से ज़्यादा भारतीय डायबिटीज़ से पीड़ित हैं. डायबिटीज पीड़ितों की संख्या के लिहाज से भारत का नंबर चीन के बाद दूसरे नंबर पर है.

महामारी के दौरान 100 से ज्यादा डायबिटीज़ मरीज़ों को देखने वाले नई दिल्ली के डॉक्टरों की एक टीम ने पाया है कि बड़ी संख्या में (42 फ़ीसदी) लोगों ने एक्सरसाइज़ कम करने के साथ ही ज्यादा कार्बोहाइड्रेट्स की भी खपत की.

एक भारतीय फिटनेस ब्लॉगर अमन ढल कहते हैं, "भारत पर ऐसे वक्त पर महामारी की चोट पड़ी है जबकि लोग पहले से ही निष्क्रियता का शिकार थे और बीमारियों में इजाफ़ा हो रहा था."

वे कहते हैं, "डब्ल्यूएचओ की 2016 की रिपोर्ट कहती है कि 35 फ़ीसदी भारतीय कम एक्टिव हैं."

जोख़िम में मौजूद लोग भी नहीं हुए सक्रिय

लंदन के पार्क में टहलता एक जोड़ा

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बीमारियों के जोख़िम में मौजूद लोगों या कोविड-19 के ज़्यादा ख़तरे वाले लोग भी लोगों को सक्रिय होने के लिए प्रोत्साहित करते नहीं दिखे हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की महामारी विज्ञानी नीना रोजर्स इस नतीजे पर पहुंची हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के सहयोगियों के साथ मिलकर 20 साल या उससे ज़्यादा उम्र के 5,800 से ज़्यादा लोगों के इंटरव्यू किए हैं.

ज़्यादातर लोगों (60 फ़ीसदी) ने कहा है कि उन्होंने अपनी फिजिकल एक्टिविटी के लेवल को कायम रखा है, जबकि करीब 25 फ़ीसदी ने माना है कि उनके एक्सरसाइज के लेवल्स में गिरावट आई है.

समस्या यह है कि पहले से बीमारियों से घिरे हुए लोग भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं जिन्होंने अपनी सक्रियता को कम कर दिया है.

वे कहती हैं, "यह चीज़ काफ़ी चौंकाने वाली है."

आसान नहीं फ़िटनेस पर वापसी

अबुनेग सेकग्वेलीया

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इमेज कैप्शन, अबुनेग सेकग्वेलीया

लॉकडाउन की निष्क्रियता से निकलना आसान नहीं है.

जोहानसबर्ग की ताइक्वांडो टीचर अबुनेग सेकग्वेलीया कहती हैं, "लोगों के लिए ऐसे वक्त में अपने जोश को खो देना आसान होता है. लोग मानसिक रूप से ठीक नहीं हैं."

शार ने अपनी स्थिति पर गौर किया और इसमें बदलाव की ठानी.

उन्होंने ब्रिटिश फ़िटनेस गुरु जो विक्स के यूट्यूब सेशन देखे और अपने घर के पास के इलाकों में लंबी दूरी तक टहलने जाने लगीं.

वे कहती हैं, "मेरे ज़्यादातर दोस्त लॉकडाउन के दौरान केवल खा-पी रहे थे. लेकिन, मैं अस्थमा की वजह से जोख़िम में थी और मुझे खुद को बचाना था."

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