कोरोना के सामने ख़ुद को बेबस पा रहा है भारत? क्या हैं विकल्प?

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

कोरोना से सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों में भारत का नंबर भले ही तीसरा हो, लेकिन पिछले सात दिनों से विश्व के कोरोना ग्राफ़ में भारत का योगदान सबसे अधिक रहा है.

पिछले कुछ हफ़्तों से भारत में हर दिन कोरोना के नए मामले 50 हज़ार से ज़्यादा आ रहे हैं. भारत में अब तक संक्रमण के 22 लाख से अधिक मामले सामने आए हैं.

कोरोना के इसी हालात पर चर्चा के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मंगलवार को बैठक की.

मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा,"आज 80 फीसदी से ज़्यादा एक्टिव केस दस राज्यों में हैं, इसलिए कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में इन सभी राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी है. ये आवश्यकता थी, ये 10 राज्य एक साथ बैठकर समीक्षा करें, चर्चा करें. और आज की इस चर्चा से हमें एक दूसरे के अनुभवों से काफ़ी कुछ सीखने समझने को मिला भी है."

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बिहार, गुजरात, यूपी, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना को टेस्टिंग बढ़ाने का सुझाव दिया. साथ ही प्रतिदिन 7 लाख लोगों की टेस्टिंग करने पर अपनी पीठ भी ख़ुद ही थपथपा ली. इन सबके बीच एक और अहम बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही, "हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. हर दिन एक नई चुनौती है."

भारत में कोरोना

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चुनौतियों से शायद उनका मतलब भारत के बढ़ते कोरोना मामलों से होगा.

लेकिन प्रधानमंत्री का ये कहना कि भारत कोरोना के मामले में सही दिशा में बढ़ रहा है, ये बात देश के कुछ जानकारों को ज़रूर अटपटी लगी.

अगर सही दिशा में बढ़ रहे हैं, तो बाक़ी देशों की तरह हमारा कोरोना ग्राफ़ फ़्लैट क्यों नहीं हो रहा?

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विश्व कोरोना ग्राफ़ में भारत की स्थिति

हमारे सामने न्यूज़ीलैंड जैसे छोटे देश का उदाहरण है, जहाँ कोरोना संक्रमण को कम करने की सरकार की कोशिशों की हर जगह सराहना हुई है. वहाँ 102 दिनों के बाद कोरोना संक्रमण का कोई मामला सामने आया.

पड़ोसी देश पाकिस्तान की बात करें, तो वहाँ रोज़ाना संक्रमण का आँकड़ा कम हो रहा है. पाकिस्तान में बीते पाँच महीनों में पहली बार लोग जिम, सैलून और रेस्टोरेंट में दिखे.

संक्रमण रोकने के लिए एहतियातन बंद की गई इन जगहों को सोमवार को खोल दिया गया है. पाकिस्तान में अब तक कोरोना संक्रमण के कुल मामले दो लाख 80 हज़ार के पार हैं. क़रीब 6100 लोगों की मौत हुई है. लेकिन यहाँ जून महीने के बाद से संक्रमण के मामलों में कमी आती दिख रही है.

यही हाल दक्षिण एशिया के दूसरे देशों का है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में जर्मनी और दक्षिण कोरिया की तारीफ़ कर चुका है. लेकिन भारत अपने रिकवरी रेट और तुलनात्मक रूप से कम मौत के आँकड़ों से आगे ही नहीं बढ़ रहा.

भारत में कोरोना

मौत के आँकड़े

भारत में इस वक़्त रिकवरी रेट 68 फ़ीसदी के आसपास है. जबकि मौत का आँकड़ा 42 हज़ार से थोड़ा ज़्यादा है.

भारत जिन पैमानों पर ख़ुद के कोरोना ग्राफ़ को विश्व के बाक़ी देशों से बेहतर बताता आया है, दरअसल वो असल तस्वीर पेश ही नहीं करते.

प्रति एक लाख मौत का आँकड़ा भारत में 3.8 है. जबकि पाकिस्तान, सिंगापुर, बांग्लादेश जापान में ये तीन से कम है. वियतनाम और श्रीलंका में ये आँकड़ा एक से भी कम है.

जहाँ तक कोरोना ग्राफ़ को फ़्लैट करने की बात है, तो अमरीका और ब्राज़ील जैसे बुरे प्रभावित देशों में भी रोज़ आने वाले मरीज़ों की संख्या कम हो रही है.

भारत में कोरोना

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जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की बेवसाइट पर 10 सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों की सूची में केवल 4 देश ऐसे हैं, जिनका कोरोना कर्व फ़्लैट नहीं हो रहा. भारत उसमें सबसे ऊपर है. उसके बाद नंबर है कोलंबिया, पेरू और अर्जेटीना का.

ऐसे में हर जगह एक ही सवाल है - भारत कोरोना के सामने ख़ुद को बेबस क्यों पा रहा है? दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस दौर में लाचार क्यों है?

एम्स में कम्यूनिटी मेडिसीन के हेड डॉक्टर संजय राय इस दलील को मानने के लिए पहले तो तैयार ही नहीं है कि भारत लाचार और बेबस है. वो कहते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश की तुलना में हम अच्छा नहीं कर रहे हैं, ये बात बिल्कुल ग़लत है. वहाँ भी प्रति मिलियन केस भारत के लगभग बराबर ही हैं.

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लॉकडाउन तब नहीं अब होना चाहिए

उनके मुताबिक़ भारत कोरोना की जंग में लाचार है, ये कहने से पहले वायरस के बारे में जानने की ज़रूरत है और दूसरा भारत की जनसंख्या को भी समझना होगा.

डॉक्टर संजय की मानें, तो वायरस के प्रसार को रोका नहीं जा सकता, उसमें देर की जा सकती है. भारत ने लॉकडाउन लगा कर वही किया भी.

यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि भारत में अब तक तीन बार राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन लगा, जिसमें दूसरे और तीसरे दौर में कुछ जगह रियायतें दी गई. कई राज्यों में वीकेंड लॉकडाउन आज भी चल रहे हैं.

1 जुलाई से ही भारत में अनलॉक की प्रक्रिया शुरू की गई है.

लेकिन क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से वायरोलॉजी के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर टी जैकब जॉन डॉक्टर संजय की बातों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. उनका मानना है कि लॉकडाउन लगाने का फ़ैसला बिना सोचे-समझे लिया गया था.

मार्च में जब पूर्ण लॉकडाउन लगा तब देश में केवल 500 केस थे. जब कोरोना के मामले ही नहीं थे, तो कौन सा संक्रमण रोक रही थी सरकार. उनकी राय है कि आज जब आँकड़े बढ़ रहे हैं, तब भारत को कोरोना संक्रमण रोकने के लिए लॉकडाउन लगाना चाहिए था.

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कोरोना से जंग में नई रणनीति की ज़रूरत

24 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने तीन हफ़्ते का संपूर्ण लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी. उस वक़्त प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि महाभारत का युद्ध 18 दिन में जीता गया था, कोरोना से जंग हम 21 दिन में जीतेंगे.

प्रोफ़ेसर टी जैकब जॉन कहते हैं कि भारत में पहली ग़लती वहीं की थी. सरकार ने कोरोना को जंग तो माना, लेकिन जंग की तरह उससे लड़ने के लिए ना तो रणनीति बनाई और ही सामान और हथियार ही तैयार किए. प्रोफ़ेसर जैकब के मुताबिक़ सरकार ने अपनी रणनीति कभी बनाई ही नहीं और जो कुछ फ़रमान जारी किए, उसके पीछे कोई तर्क नहीं दिया.

मिसाल के तौर पर प्रोफ़ैसर जैकब कहते हैं- सरकार ने पहले कोरोना से लड़ने के लिए डिजास्टर एक्ट का सहारा लिया और फिर बाद में एपीडेमिक एक्ट लगाया, जो बहुत ही पुराना था. वो एक्ट नए दौर के लिए बना ही नहीं है.

लॉकडाउन के फ़ैसले पर प्रोफ़ेसर जैकब कहते हैं पूर्ण लॉकडाउन लगाने का सही वक़्त अब है, जब देश में रोज़ाना 60 हज़ार से अधिक मामले आ रहे हैं.

लेकिन डॉक्टर संजय और केंद्र सरकार दोनों का मानना है कि लॉकडाउन से सरकार को कोरोना से लड़ने में तैयारी करने का अवसर मिला.

देश में हर राज्य में नए कोरोना अस्पताल बनाए गए, लैब्स की संख्या बढ़ाई गई, डॉक्टरों को तैयार किया गया, मास्क, पीपीई किट बनाने में भारत आत्म निर्भरता की ओर बढ़ा. देश में टेस्टिंग लैब्स आज की तारीख़ में 1,415 हैं, जिनमें 944 सरकारी लैब्स हैं और 471 निजी लैब्स हैं.

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तो फिर हर रोज़ 50 हज़ार से ज़्यादा लोग क्यों संक्रमित हो रहे हैं?

इस पर डॉक्टर संजय कहते हैं कि भारत की आबादी और उसका घनत्व दुनिया में दूसरे देशों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है. अमरीका की आबादी भारत की एक चौथाई है. ऐसे में अमरीका या किसी दूसरे छोटे देश से भारत की तुलना सही नहीं है. वही बात वो न्यूज़ीलैंड के लिए भी कहते हैं. भारत के साइज़ के सामने न्यूज़ीलैंड कही नहीं है. वो केरल और गोवा का उदाहरण देते हैं, जहाँ मामले कम हुए और फिर नए मामले आने शुरू हो गए.

संजय कहते हैं इस वायरस का नेचर है कि एक निश्चित आबादी को संक्रमित करने के बाद अपने आप ही संक्रमण का ख़तरा कम होने लगता है. दिल्ली और मुंबई में हमने यही देखा और अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में भी हमने देखा. उम्मीद की जा सकती है कि साल के अंत तक भारत थोड़ी बेहतर स्थिति में आ जाए.

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि कुछ राज्यों में अभी कोरोना का पीक नहीं आया है इसलिए भारत में रोज़ आने वाले संक्रमण की संख्या आने वाले दिनों में इससे अधिक बढ़ सकती है. भारत में हर राज्य का कोरोना पीक अलग-अलग है. हर राज्य ने अपने अपने स्तर पर निपटने के लिए अलग-अलग उपाय किए हैं. इसलिए भी एक साथ हर राज्य में कोरोना का पीक नहीं आएगा.

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मास्क और सोशल डिस्टेसिंग का कारगर अमल ज़रूरी

तो क्या सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना, बार-बार साबुन से हाथ धोने की रणनीति काम नहीं आई?

इस पर प्रोफ़ेसर जैकब कहते हैं, "ये सब रणनीति नहीं है. ये एहतियाती क़दम थे, जिसे सरकार ने रणनीति बना कर पेश किया. रणनीति में टेस्टिंग, ट्रेसिंग और आइसोलेशन की बात होती. एक रणनीति फ़ेल होने पर प्लान बी तैयार होना चाहिए था. लेकिन ये सब तो दूर, हमने तो कभी अपने डॉक्टरों को इस बात की ट्रेंनिंग तक नहीं दी कि आख़िर इस बीमारी का इलाज कैसे करना है."

उनके दावा है कि कई नौजवान डॉक्टरों ने उनसे शिकायत की है. हड्डी के डॉक्टर को कोरोना के आईसीयू में बिना कुछ बताए इलाज करने के लिए भेज दिया गया.

भारत के स्वास्थ्य मंत्री ने मार्च में संसद में कहा कि भारत ने जनवरी में ही कोरोना से निपटने की तैयारी शुरू कर दी थी. विदेश से आने वालों को कोरोना के लिए थर्मल स्क्रीनिंग की जा रही थी. जनवरी में ही केंद्र ने कोरोना से निपटने के लिए ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स का गठन कर दिया था.

लेकिन प्रोफ़ेसर जैकब कहते हैं कि मास्क को अनिवार्य करने का फ़ैसला लेने में भारत सरकार ने देर की. वो मानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन से भारत इस मामले में एक क़दम आगे ज़रूर रहा, लेकिन तब तक ग़लती हो चुकी थी. इसके अलावा भारत सरकार ने लोगों के अंदर व्यावहारिक बदलाव लाने के लिए सिर्फ़ विज्ञापन बनाया, लेकिन लोग इस पर अमल करें ये सुनिश्चित नहीं किया. यही वजह है कि वायरस तेज़ी से फैला.

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आगे क्या हैं विकल्प

टेस्ट, ट्रेस और आइसोलेट. ये विश्व स्वास्थ्य संगठन का दिया मंत्र है. सभी देशों ने इस मंत्र को अपनाने के साथ-साथ अपने अपने स्तर पर रिसर्च और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का सहारा लिया. कुछ को क़ामयाबी मिली, तो कुछ पीछे रह गए. भारत को भी इस मूल मंत्र के साथ कुछ नए क़दम उठाने पड़ेंगे.

आगे की स्थिति को संभालने के लिए प्रोफ़ेसर जैकब 'सोशल वैक्सीन' का सहारा लेने की सलाह देते हैं. सोशल वैक्सीन को समझाते हुए वो कहते हैं कि केंद्र को जनता को सही जानकारी, समय पर देना होगा और ये भी बताना होगा कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है. इसे साइंस में इन्फ़ॉर्म, एजुकेट और कम्युनिकेट करना कहते हैं. और साथ में लोगों को व्यावहारिक बदलाव के लिए प्रेरित करने की ज़रूरत है, जैसा ऐड्स महामारी के समय पर किया था.

भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत कई विभाग आते हैं. उनमें आपस में तालमेल की कमी है. आईसीएमआर को वायरस पर और रिसर्च करने की ज़रूरत है, ताकि भारत की आबादी पर इसके असर को और बेहतर समझा जा सके. डॉक्टर संजय कहते हैं कि सीरो सर्वे के नतीजों से बहुत कुछ पता चला और ऐसे सर्वे होने चाहिए, हर राज्य में और राष्ट्रीय स्तर पर भी.

जानकारों की ये भी राय है कि अस्पताल और डॉक्टरों पर दवाब कम करने की दिशा में क़दम उठाना ज़रूरी है.

इसके अलावा एंटीजीन टेस्ट के साथ साथ RT-PCR टेस्ट की भी संख्या बढ़ाए जाने की ज़रूरत है. जैसे दुनिया के दूसरे देशों ने किया. जानकारों का दावा है कि भारत में आज एक चौथाई टेस्ट एंटीजीन टेस्ट हैं.

जब तक कोरोना की वैक्सीन नहीं आ जाती, सभी मंत्रालय और राज्यों को मिल कर कोरोना से जंग के लिए नई रणनीति के साथ काम करना होगा, जिसमें दुनिया में अच्छा कर रहे देशों के सबक को भी हम शामिल करें. फ़िलहाल भारत में इसी सहयोग की कमी है.

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