कोरोना वायरस: लॉकडाउन में हेल्थकेयर सर्विस की कमी पूरी कर सकती है टेलीमेडिसिन?

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- Author, निधि राय
- पदनाम, बिज़नेस संवाददाता
रीना आर्या गुजरात में रहती हैं. लॉकडाउन के दौरान वहां से 850 किलोमीटर दूर फ़रीदाबाद (हरियाणा) में रहने वाली उनकी 75 साल की मां को हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत ने कुछ ज़्यादा ही परेशान कर दिया.
ऐसे में उन्होंने ऑनलाइन मेडिकल सर्विस की मदद लेने की सोची.
रीना ने बताया, "मैंने जीवा आयुर्वेद से सलाह लेने का फ़ैसला किया. मैंने उन्हें अपनी मां का केस समझाया. जीवा आयुर्वेद वालों ने मुझे कुछ दवाइयां बताईं. इन दवाइयों से मेरी मां को आराम हुआ. मेरी मां हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़, दोनों की मरीज़ हैं."
रीना की तरह लक्ष्मी ने भी अपनी मां के इलाज के लिए एक टेलीमेडिसिन प्रोवाइडर कॉलहेल्थ सर्विसेज का सहारा लिया.
लक्ष्मी की मां पैरों के दर्द से परेशान थीं. उन्हें जिस दवा की ज़रूरत थी और वह कर्नाटक में उनके गांव रेंटाचिंटाला में नहीं मिल रही थी. लक्ष्मी हैदराबाद (तेलंगाना) में रहती हैं. वहां से दवा भेजने का उन्हें कोई ज़रिया नहीं मिल रहा था. लक्ष्मी ने कॉलहेल्थ की टीम को फोन किया उनसे सही दवा का नुस्खा मांगा.
ये दोनों मामले कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान टेलीमेडिसिन सर्विस की बढ़ती मांग के हैं. इन दिनों इनकी सेवाओं की मांग काफ़ी बढ़ गई है क्योंकि लॉकडाउन के दौरान मरीज़ों का क्लीनिक पहुंचना मुश्किल हो रहा है.
बीबीसी ने इस बारे में कई डॉक्टरों, हेल्थकेयर प्रोफ़ेशनल और कंस्लटेंट्स से बात की. सबने टेलीमेडिसिन सर्विस मुहैया कराने वालों की बढ़ती मांग की तस्दीक की.

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वायरस से हर कोई डरा हुआ है
मदुरै (तमिलनाडु) के मिनाक्षी मिशन हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के डॉक्टर वेलकुमार मीनाक्षी ने बीबीसी को बताया उनके पास अब हर रोज़ 100 से 110 फ़ोन कॉल और वीडियो कॉल आते हैं. जबकि लॉकडाउन के पहले इनकी संख्या 10 से भी कम होती थी.
उन्होंने कहा कि लोग अब हमें फोन करके छोटी से छोटी बात भी पूछते हैं. क्योंकि कोरोना वायरस से हर कोई डरा हुआ है. छोटी सी तक़लीफ़ में भी अब फ़ोन या वीडियो कॉल के ज़रिए सलाह मांगते हैं.
लॉकडाउन के दौरान अपनी सेहत के बारे में डॉक्टरों से सलाह लेने की इस तरह की मांग ने देश में टेलीमेडिसिन की अहमियत को उभार दिया है.
ऐस देश में जहां डॉक्टरों और नर्सों की कमी हो, ख़ास कर ग्रामीण इलाक़ों में, वहां हेल्थकेयर मॉडल के संभावित विकल्प के तौर पर टेलीमेडिसिन आजकल चर्चा में है.
17 मई तक प्रभावी लॉकडाउन की वजह से सोशल डिस्टेंसिंग के नियम काफ़ी कड़े कर दिए गए हैं ऐसे में चैट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ज़ूम ऐप के ज़रिए डॉक्टरों और मरीज़ों के बीच बातचीत और सलाह-मशविरे ने स्वास्थ्य सुविधाओं की एक बड़ी कमी की भरपाई की संभावना दिखाई है.

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क्या हर बीमारी का ऑन-लाइन इलाज है?
लेकिन टेलीमेडिसिन से हेल्थकेयर सर्विस मुहैया कराने के मामले में गुणवत्ता के साथ क़ानूनी और नैतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं.
हेल्थकेयर विशेषज्ञ कहते हैं कि सवाल यह है कि क्या डॉक्टर इस तरह फ़ोन, चैट या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मरीज़ों के लिए दवा लिख सकते हैं?
ऐसी कौन सी बीमारियां हैं, जिनका ऑनलाइन इलाज हो सकता है?
एक प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर ने कहा कि टेलीमेडिसिन की स्क्रीनिंग वैल्यू मरीज़ के लिए मददगार साबित हो सकती है लेकिन यह सीधे डॉक्टर से आमने-सामने ली गई सलाह की जगह नहीं ले सकती.
अपोलो हॉस्पिटल ग्रुप के प्रेसिडेंट डॉक्टर हरि प्रसाद ने बीबीसी से कहा, "सामने बैठे डॉक्टर और टेलीमेडिसिन से ली गई सलाह की तुलना नहीं की जा सकती. टेलीमेडिसिन के ज़रिए ली गई सलाह में कोई न कोई कसर रह ही जाएगी."

उन्होंने कहा कि कई कॉल ऐसे मरीज़ों की स्क्रीनिंग के लिए आते हैं जिनमें बीमारी के लक्षण लंबे समय से होते हैं. ऐसे कई मरीज़ अपने घरेलू नुस्खे फेल होने या मर्जी से ली गई दवाइयों के बेअसर होने के बाद डॉक्टर को कॉल करते हैं.
जीवा आयुर्वेद का कहना है कि कोरोना वायरस संक्रमण के इस कठिन दौर में लोग आधुनिक दवाइयों के अलावा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का भी ख़ासा इस्तेमाल कर रहे हैं.
जीवा आयुर्वेद के डायरेक्टर मधुसूदन चौहान ने कहा, "हम लोगों को हर दिन कई कॉल मिलते हैं. लोग फ़ोन करके हमसे अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए घरेलू नुस्खे बताने को कहते हैं."
अमूमन लोगों के पास सही जानकारी नहीं होती है. हम उन्हें सही जानकारी देते हैं और ग़लत नुस्खों के साइड इफेक्ट्स के बारे में सतर्क करते हैं.

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टेलीमेडिसिन में कितनी संभावनाएं?
देश के शहरों और गांवों को कोरोना वायरस संक्रमण से बचाने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान कर दिया था. इस दिन आधी रात से यह लागू हो गया था. इसी के साथ सरकार ने देश में पहली बार टेलीमेडिसिन से जुड़ी गाइडलाइंस जारी की.
देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देश में कहा गया कि ऐसे हालात में यह ठीक रहेगा. डॉक्टर मरीज़ों की दिक्कतों का मूल्यांकन कर उन्हें इलाज सुझा सकेंगे.
रजिस्टर्ड डॉक्टर डायग्नोसिस के लिए वॉयस, वीडियो और टेक्स्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं. वे मरीज़ों को सलाह देने और इलाज सुझाने के लिए वॉट्सऐप, फेसबुक, मैसेंजर या मोबाइल हेल्थ ऐप का सहारा ले सकते हैं.
एटन हेल्थ इंटरनेशनल में पॉपुलेशन हेल्थ के वाइस प्रेसिडेंट डॉक्टर स्नेह खेमका कहते हैं, " टेलीमेडिसिन के ज़रिए लोग बुख़ार, खांसी, ठंड लगने, डायरिया, गैस्ट्रिक और दूसरी बीमारियों का इलाज करवा रहे हैं."
वे कहते हैं, "कुछ लोग हाई ब्लड प्रेशर, डाइबिटीज और ऐसी ही अपनी पुरानी बीमारियों का भी इलाज करा रहे हैं. कुछ लोग वैकल्पिक चिकित्सा के बारे में भी पूछते हैं. कुछ सेकंड ओपिनियन के लिए भी टेलीमेडिसिन सर्विस का सहारा ले रहे हैं. खान-पान, स्ट्रेस मैनेजमेंट और आम सेहत ठीक रखने के लिए भी लोग सलाह ले रहे हैं."

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डेटा का सवाल
एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाले इस देश में हेल्थकेयर सुविधाओं का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है. टेलीमेडिसिन से हालात बेहतर करने में मदद मिल सकती है.
क्योंकि इस सर्विस के ज़रिए लोगों से जुड़े जो आँकड़े (डेटा) इकट्ठा होंगे, उससे देश में पब्लिक हेल्थ (जन-स्वास्थ्य) की अंदरूनी तस्वीर सामने आ सकती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह जो डेटा इकट्ठा होंगे, उससे हेल्थकेयर प्रोफ़ेशनलों को ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाक़ों में अपनी सेवाओं का दायरा बढ़ाने में मदद मिलेगी.
नोएडा स्थित नेशनल एक्रिडेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर्स प्रोवाइडर्स (NABH) की टेक्निकल कमेटी के सदस्य ऋषि भटनागर ने कहा कि टेलीमेडिसिन से डायग्नोसिस से लेकर इलाज की पूरी प्रक्रिया की लास्ट माइल कनेक्टिविटी बढ़ जाएगी.
लेकिन क़ानूनी विशेषज्ञ टेलीमेडिसिन कंपनियों और ई-कंस्लटेशन कंपनियों के रेगुलेशन (नियमन) का सवाल उठाते हैं. उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये कंपनियां मरीज़ों के डेटा का दुरुपयोग कर सकती हैं.
लीगल एक्सपर्ट सिद्धार्थ चंद्रशेखर ने बीबीसी से कहा, "डेटा प्राइवेसी को लेकर चिंता बनी रहेगी. क्योंकि मरीज़ के पूरे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा डेटा धोखाधड़ी करने वाले तत्वों में हाथों में पड़ सकता है. वे इसका दुरुपयोग कर सकते हैं."

भारत में काम करने वाले एडवोकेसी ग्रुप इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने अप्रैल में एक रिपोर्ट जारी की थी. इसमें कहा गया था कि टेलीमेडिसिन एप्स के ज़रिए इकट्ठा संवेदनशील मेडिकल और पर्सनल डेटा तक किसकी (किस संगठन की) पहुंच होगी, इस पर पारदर्शिता नहीं है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस डेटा तक किसकी पहुँच होगी, इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा गया है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल में डेटा सिक्योरिटी और प्राइवेसी को लेकर सरकार के ऐप आरोग्य सेतु पर सवाल उठाए थे. हालांकि सरकार ने उनके आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया था.
लॉकडाउन के दौरान डॉक्टरों, मरीज़ों और दवा दुकानदारों को आपस में जोड़ने वाली प्रैक्टो (Practo) जैसी टेलीमेडिसिन कंपनियों के ग्राहकों की तादाद में ख़ासा इज़ाफ़ा हुआ है.
इससे पता चलता है कि लोग अपनी सेहत को लेकर कितने फ़िक्रमंद है. कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक़ यह कोरोना वायरस संक्रमण के मौजूदा समय में 499 रुपए ( 6.7 डॉलर) में 'अनलिमिटेड ऑनलाइन कंस्लटेशन' का ऑफ़र दे रही है.
प्रैक्टो के चीफ हेल्थ स्ट्रेटजी ऑफिसर डॉ. अलेक्जेंडर कुरुविला एक बयान में कहते हैं, "प्रैक्टो से जुड़ा हर जनरल फिजिशियन अमूमन एक दिन में 25 से 30 मरीज़ों को सलाह देता है. लेकिन पिछले तीन सप्ताह के दौरान मरीज़ों की संख्या तीन से चार गुना बढ़ गई है."
उन्होंने बताया- इसलिए पिछले चार सप्ताह में हमें अपने डॉक्टरों का बेस लगभग 50 फ़ीसदी बढ़ाना पड़ा. अभी तक मरीज़ों को डॉक्टरों से संपर्क करने में कोई दिक्कत नहीं आ रही है. उन्हें लगातार सलाह और इलाज मिल रहा है.
प्रैक्टो के डेटा देखने से पता चलता है कि ज़्यादातर लोगों ने कफ, ठंड लगने, गले में सूजन और बदन दर्द की शिकायत की वजह से सलाह ली थी. इस दौरान प्रैक्टो के डॉक्टरों को किए जाने वाले कॉल में 500 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा दर्ज किया गया. सलाह लेने वालों में अधिकतर कॉलर 20 से 40 साल तक की उम्र के हैं.
मरीज़ों को स्पेशलाइज्ड क्लीनिकल केयर से जोड़ने वाली कंपनी
प्रिस्टिन केयर (Pristyn Care) के सह-संस्थापक हरसिमरबीर सिंह कहते हैं, "अप्रैल की शुरुआत से हमारे यहां आने वाले कॉल की संख्या लगातार बढ़ी है. बड़े शहरों के बाहर से पूछताछ करने वालों की संख्या तो सात गुना बढ़ गई है. पूरे देश से इलाज और सलाह के बारे में जो पूछताछ की जा रही है उसमें दस गुना इज़ाफ़ा हुआ है."
हालांकि कई डॉक्टरों और मेडिकल कंस्लटेंट का कहना है कि भारत में टेलीमेडिसिन को एक बेहतरीन रेगुलेशन (नियमन) वाली सेवा बनाने की लिए अभी काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रूरत है.
हेल्थकेयर सुविधाएं बढ़ाने की ज़रूरत
मरीज़ों तक पहुंचने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले डॉक्टरों को भी इसकी सीमाओं का अंदाज़ा है.
डॉक्सऐप (DocsApp) में मेडिकल ऑपरेशन्स की हेड डॉक्टर गौरी कुलकर्णी का कहना है कि ऑनलाइन सलाह के ज़रिए 70 फ़ीसदी स्वास्थ्य समस्याओं को डायग्नोस कर उनका इलाज किया जा सकता है. लेकिन जब लगता है कि मरीज़ के शरीर को हाथ लगाए बगैर इलाज संभव नहीं है तो उन्हें कहा जाता है कि वे आमने-सामने ही इलाज कर सकते हैं.
सरकार ने अपने निर्देशों में प्राइमरी हेल्थकेयर की जगह टेलीमेडिसिन को विकल्प बनाने की कोई बात नहीं की है. जबकि हक़ीक़त यह है कि देश में हेल्थ प्रोफेशनल्स की कमी की वजह से वैकल्पिक चिकित्सा सुविधाओं की भारी ज़रूरत है.
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर डिजिज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (CDDEP) के मुताबिक भारत में अभी और छह लाख डॉक्टर और 20 लाख नर्सों की ज़रूरत है.
सेंटर फॉर डिजिज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी का कहना है कि डॉक्टरों और नर्सों की कमी से उन लोगों पर दबाव काफ़ी बढ़ जाता है, जो महंगा इलाज नहीं करवा सकते.
देश में इलाज के 65 फ़ीसदी बिल इतने अधिक हैं कि इस वजह से 57 लोग हर साल ग़रीबी की गर्त में पहुंच जाते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO ) ने कहा है कि हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन भारत में यह अनुपात प्रति दस हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर का है.

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चुनौती है मरीज़ों से संपर्क
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) के मुताबिक़ भारत में 2019 के आख़िर में इंटरनेट के 45 करोड़ एक्टिव यूजर थे.
लेकिन इनमें से ज़्यादातर शहरी इलाक़ों के मोबाइल यूजर थे. गांवों में इंटरनेट यूजर्स की संख्या, शहरी इलाक़ों के यूजर्स से काफ़ी कम है.
इसके बावजूद भारत में ऑनलाइन मीडियम के ज़रिए डॉक्टरों की सलाह लेने का चलन बढ़ रहा है. फोर्टिस, अपोलो, मैक्स, टाटा हॉस्पिटल और मेट्रोमेडि जैसी प्राइवेट हॉस्पिटल चेन ने अपनी ई-कंस्लटेशन चेन शुरू कर दी है.
हालांकि विशेषज्ञ डॉक्टरों को इस बात की चिंता है कि ज़्यादातर मरीज़ उनकी सलाहों को समझने में नाकाम रह सकते हैं. मदुरै की फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में बर्थ एजुकेटर और लेक्टेशन कंस्लटेंट डॉ. जयश्री जयकृष्णन के मरीज़ पूरे तमिलनाडु में हैं. वह गर्भवती महिलाओं और युवा माताओं को सलाह देती हैं.
लॉकडाउन के दौरान उन्होंने फ़ोन और वीडियो कॉल के ज़रिए अपने मरीज़ों को सलाह दी थी. लेकिन डॉक्टर जयकृष्णन इससे संतुष्ट नहीं दिखतीं.
बीबीसी से उन्होंने कहा, "ज़्यादातर मरीज़ों को हमारी सलाह समझने में दिक्कत आती है. उन्हें सलाहों के मुताबिक़ करके दिखाना पड़ता है. इसके अलावा कनेक्टिविटी की भी दिक्कत है. करूर, त्रिची और मदुरै के मरीज़ इतनी आसानी से इंटरनेट एक्सेस नहीं कर पाते."

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