कोरोना वायरस के ख़तरे पर क्यों भारी पड़ रही है धार्मिक आस्था

दुनियाभर के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक समूह वैज्ञानिक सलाहों की अनदेखी करके भी एक जगह जमा होने का जोखिम उठा रहा है.

जबकि वैज्ञानिक लगातार सलाह दे रहे हैं कि इससे कोरोना वायरस संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा हो सकता है.

अब संयुक्त राष्ट्र में धार्मिक स्वतंत्रता मामलों के विशेष दूत डॉ. अहमद शाहिद ने सरकारों से अपील की है कि अगर धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर लोगों का समूह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बन जाए तो उस पर पाबंदी लगाने के क़दम उठाए जाने चाहिए. उनके मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय क़ानून ऐसे प्रावधानों की अनुमति देता है.

अहमद शाहिद ने बीबीसी से एक्सक्लूसिव बात करते हुए कहा है कि धार्मिक नेताओं को भी सोशल डिस्टेंसिंग के प्रति लोगों को जागरूक करने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए.

उन्होंने कहा, "धार्मिक आस्था वाले समूहों के प्रमुखों को ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए- क़ानूनी दायित्वों के चलते ना सही तो समुदाय के कल्याण के लिए उन्हें ऐसा करना चाहिए."

कोविड-19 के बावजूद लोगों का जमा होना

दुनियाभर के ज़्यादातर ईसाइयों ने ईस्टर बिना चर्च गए ही बनाया लेकिन अमरीका में कुछ चर्च खुले हुए थे.

लुइज़ियाना के पादरी टॉनी स्पेल ने दावा किया है कि उनके लाइफ़ टेबरनाकेल चर्च में रविवार को ईस्टर के मौक़े पर हज़ारों लोग जमा हुए थे हालांकि राज्य के गवर्नर ने 50 लोगों से ज़्यादा लोगों के एक जगह एकत्रित होने पर पाबंदी लगा रखी है.

पाकिस्तान में सरकार ने पांच या इससे अधिक लोगों के एक जगह पर एकत्रित होने पर रोक लगा रखी है लेकिन वहां भी कई मुस्लिम धर्मगुरू इसका उल्लंघन कर रहे हैं.

हालांकि पाकिस्तान कुछ पाबंदियों में ढील देने जा रहा है. माना जा रहा है कि कुछ धर्मगुरुओं ने लोगों को नमाज के लिए एकत्रित होने को भी कहा है, ख़ासकर रमज़ान के दिनों में.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी कहा है कि वे मुस्लिम धर्मगुरुओं से बात करेंगे ताकि रमज़ान के महीने में संक्रमण रोकने के लिए क्या क़दम उठाए जा सकते हैं.

पाकिस्तान में कोविड-19 संक्रमण के कुछ मामले मध्य पूर्व से लौटे हज यात्रियों से जुड़ा है तो कुछ तब्लीग़ी जमात की बैठकों में शामिल होने से जुड़ा है.

तब्लीग़ी जमात के आयोजनों के चलते भारत, इंडोनेशिया और मलेशिया में कई जगहों पर संक्रमण फैला है.

दक्षिण कोरिया में भी संक्रमण के हज़ारों मामले सामने आए हैं, जिनमें से अधिकांश का संबंध शिनचोनजी चर्च से निकला है. यह भी एक समान आस्था रखने वाले लोगों का गुप्त समूह है.

समूह ने हाल के सप्ताह में संक्रमण फैलाने में भूमिका पर माफ़ी मांगी है और कहा है कि वे लोग अधिकारियों के साथ सहयोग कर रहे हैं. हालांकि अधिकारियों का कहना है कि समूह के कुछ लोग अभी भी टेस्ट के लिए तैयार नहीं हुए हैं.

वैज्ञानिक और मेडिकल प्रोफ़ेशनल लगातार ये चेतावनी दे रहे हैं कि सामूहिक बैठकों से कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ सकता है और लोगों का जीवन ख़तरे में आ सकता है.

ऐसे में सवाल यही है कि लगातार चेतावनी के बाद भी किस बात के लिए ये लोग पूजा और इबादतों के नाम पर समूहों में जमा हो जाते हैं?

पूजा-इबादत ज़रूरत

मैथ्यू स्केमिट्ज अमरीकी राज्य पेन्सिलवेनिया के कैथलिक ईसाई है. इस प्रांत में किसी भी तरह की भीड़ पर रोक लगा दी गई है. मैथ्यू का मानना है कि चर्च आवश्यक सेवा है और जिस तरह से राशन की दुकानों पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन होता है वैसे प्रावधान पूजा इबादत की जगह पर भी लागू किए जा सकते हैं.

मैथ्यू कहते हैं, "जो भी ग्रॉसरी की दुकान खोलने के पक्ष में है और वैसे ही प्रावधान रखने के बाद भी चर्च को बंद रखने के पक्ष में है, वह निश्चित तौर पर ईश्वर की आराधना की तुलना में बाज़ार को ऊपर रख रहा है."

मैथ्यू के मुताबिक़, चर्च में शारीरिक तौर पर मौजूद होने और विशेष आयोजनों में शामिल होने का अपना अलग ही अनुभव होता है जो गरिमामयी भी होता है.

मैथ्यू कहते हैं, "आप अपने पति या पत्नी के क़रीब होने चाहते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप उस शख़्स के प्रति कमज़ोरी महसूस कर रहे हैं बल्कि आपका उत्साह बताता है. अगर कोई ईश्वर से प्यार करता है तो वहां भी ऐसा ही महसूस करेगा."

भरोसे का सवाल

नीदरलैंड्स के मनोवैज्ञानिक बास्टियान रुटजेंस धर्म और उससे जुड़ी मान्यताओं पर विशेषज्ञता रखते हैं. वे बताते हैं कि लोगों पर सरकार का कितना प्रभाव है, इसे आंकने के लिए देखना होगा कि सरकारी सलाहों पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती है?

रुटजेंस के मुताबिक़ अमरीका में ऐसी संस्कृति है जहां लोगों का सरकार पर भरोसा नहीं है.

वो कहते हैं, "कुछ लोग सरकार की सलाह मानने को तैयार नहीं हो रहे हैं क्योंकि उनका सरकार पर भरोसा नहीं है."

रुटजेंस का मानना है कि इसके चलते आम लोगों का सरकार से जुड़े एक्सपर्ट, साइंटिस्ट और मेडिकल प्रोफ़ेशनल्स पर भी कम भरोसा होता है.

वो कहते हैं, "ऐसी बात नीदरलैंड्स में होगी, इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता क्योंकि हमारे यहां अभी सरकारी संस्थाओं और सरकारी अधिकारियों पर लोगों का भरोसा बना हुआ है. "

नेता के पीछे खड़े होना

कई बार तो यह भी स्थिति होती है कि देश के शासनाध्यक्ष ही लोगों से पूजा इबादत में शामिल होने की अपील करते हैं.

तंज़ानिया के राष्ट्रपति जॉन मैगुफुली रसायन विज्ञान में पीएचडी की डिग्री हासिल कर चुके हैं. उन्होंने अपने नागरिकों से चर्च और मस्जिद जाने की अपील की है.

उन्होंने एक चर्च में दिए अपने संबोधन में कहा, "कोरोना वायरस एक शैतान है. यह क्राइस्ट के शरीर में रह नहीं सकता है, यह तुरंत जल जाएगा. यह हमारे विश्वास को निर्मित करने का समय है."

तंज़ानिया में लॉकडाउन की स्थिति नहीं है, लेकिन स्कूल बंद हैं और दूसरे सार्वजनिक जगहों पर लोगों के एकजुट होने पर पाबंदी लगी हुई है.

शेख़ हसन साद चिजेंगा तंज़ानिया के शाही मुफ्त़ी के प्रवक्ता हैं. वो राष्ट्रपति की बातों से सहमत हैं. वो कहते हैं, "जो नमाज़ आप मस्जिद में पढ़ते हैं वो घर में पढ़ी गई नमाज़ से 27 गुना ज़्यादा बेहतर होती है. इसलिए विपदा के समय और महामारी के समय में मस्जिद में नमाज़ पढ़ना महत्व रखता है क्योंकि तब हम अल्लाह के सामने हाथ फैलाकर मदद मांग सकते हैं कि वो हमें इस वायरस के ख़िलाफ़ जीत दिलाए."

लेकिन अगर पूरे देश में लॉकडाउन लागू किया जाता है तो शेख चिजेंगा कहते हैं कि उनकी संस्था- नेशनल मुस्लिम काउंसिल ऑफ़ तंज़ानिया लॉकडाउन के प्रावधानों को मानेगी.

शेख चिजेंगा के मुताबिक़ इस समय तंज़ानिया की मस्जिदों में कम भीड़ वाली नमाज़ होती है और लोगों से अपनी-अपनी दरी लाने को कहा जा रहा है और कई बार हाथ धोने को कहा जा रहा है.

कोरोना वायरस आसानी से संक्रमित हो सकता है और सतहों पर लंबे समय तक टिकता है. इसलिए पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि उतनी सावधानी पर्याप्त नहीं है.

धार्मिक स्वतंत्रता

ईश्वर की पूजा और इबादत के नाम पर लोगों के एकत्रित होने को लोग धार्मिक स्वतंत्रता से भी जोड़कर देखते हैं.

लेकिन संयुक्त राष्ट्र के दूत अहमद शाहिद कहते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता की भी सीमाएं होती हैं.

वो कहते हैं, "किसी की धार्मिक स्वतंत्रता की आज़ादी वहां तक ही होती है जहां तक वह किसी दूसरे की आज़ादी या सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाती हो. इसलिए यह कहना कि यह मेरी धार्मिक स्वतंत्रता का मसला है, सही नहीं होगा."

बास्टियान रूटजेंस कहते हैं कि यह वायरस नया है और इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है लिहाजा तत्काल क़दम उठाने की ज़रूरत है.

वो कहते हैं, "मेरे ख़याल से इस स्टेज पर बिना सख़्त नियमों और पाबंदियों के लोगों के व्यवहार को बदलना मुश्किल है."

नीदरलैंड्स के मनोवैज्ञानिक रुटजेंस कहते हैं, "सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि दुनियाभर की सरकारों को स्पष्टता से निर्देश जारी करने चाहिए. स्थिति के बारे में लोगों को सरल ढंग से लेकिन सख़्ती के साथ बताने की ज़रूरत है."

वो कहते हैं, "लोगों को भरोसा दिलाने की ज़रूरत है कि स्थिति सरकार के नियंत्रण में हैं और लोगों को सरकार के एक्सपर्ट पर भरोसा रखना होगा."

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