कोरोना के समय में आनंद तेलतुंबड़े-गौतम नवलखा की गिरफ़्तारी

भारत के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबड़े ने मंगलवार दोपहर को एनआईए के सामने सरेंडर कर दिया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, आनंद तेलतुंबड़े को एनआईए ने गिरफ़्तार किया है, पीटीआई के मुताबिक आनंद तेलतुंबड़े को अदालत ने 18 अप्रैल तक नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी की कस्टडी में भेज दिया है.

इन दोनों की गिरफ़्तारी पर एमनेस्टी इंडिया ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के समय में भी असहमति की आवाज़ को दबाया जा रहा है. एमनेस्टी इंडिया ने अपने बयान में कहा है, "महामारी के समय में भारत सरकार उन लोगों को निशाना बना रही है जो सरकार के आलोचक हैं."

एमनेस्टी इंडिया ने अपने बयान में कहा है, "बीते दो सालों से इन एक्टिविस्टों को बदनाम करने के लिए लगातार अभियान चलाया गया है. इन्हें देशद्रोही बताने की कोशिश की गई. सालों तक अन्याय के ख़िलाफ़ उनकी अहम लड़ाई को कमतर साबित करने की कोशिश की गई. इनकी गिरफ़्तारी एक तरह से सरकार के अलोचकों को दबाने की कोशिश का हिस्सा है. इसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार और सूचना के अधिकार के कार्यकर्ता शामिल हैं, जिन्हें सरकार की जवाबदेही पूछने पर धमकाया जा रहा है, प्रताड़ित किया जा रहा है, उनमें हमले हो रहे हैं. असहमति की आवाज़ को दबाने के लिए सरकार एहतियातन हिरासत को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है."

प्रोफ़ेसर आनंद तेलतुंबड़े पर प्रतिबंधित माओवादियों से संबंध रखने के आरोप हैं. सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा भी भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा से जुड़े मामले में अभियुक्त हैं.

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली बैंच ने अपने आदेश में ये स्पष्ट कर दिया था कि आत्मसमर्पण करने की समय सीमा को और आगे नहीं बढ़ाया जाएगा.

अदालत ने ये भी साफ़ कहा था कि इन अभियुक्तों को दी गई राहत दूसरे मामलों पर लागू नहीं होगी और न ही इसे नई मिसाल माना जाएगा.

हालांकि नवलखा और तेलतुंबड़े के वकीलों ने अदालत में कोरोना वायरस से पैदा हुए हालात की दलील दी थी.

लेकिन भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि मौजूदा हालात में जेल ही सबसे सुरक्षित जगह होगी.

देश और दुनिया के कई संस्थानों ने दोनों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समर्थन में बयान जारी किए हैं और उनकी गिरफ़्तारी रोकने की मांग की थी.

फ़रवरी में मुंबई हाई कोर्ट से ज़मानत याचिका रद्द होने के बाद दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

कौन हैं आनंद तेलतुंबड़े

आनंद तेलतुंबड़े गोवा के एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में पढ़ाते हैं. वो एक चर्चित बुद्धिजीवी और दलित अधिकार कार्यकर्ता हैं.

तेलतुंबड़े यवतमाल ज़िले के राजुर गांव में पैदा हुए थे. उन्होंने नागपुर के विश्वैस्वरा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से पढ़ाई की है.

कई नौकरियां करने के बाद उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पढ़ाई की. वो भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन के एक्ज़ीक्यूटिव प्रेसिडेंट और पेट्रोनेट इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर रह चुके हैं.

वो आईआईटी खड़गपुर में पढ़ा चुके हैं और मौजूदा वक़्त में गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेज़मेंट में पढ़ा रहे हैं.

अब तक 26 किताबें लिख चुके तेलतुंबड़े कई अख़बारों में कॉलम भी लिखते हैं. वो कई शोध पत्र भी लिख चुके हैं.

वो सीपीडीआर (लोकतांत्रिक अधिकार रक्षा समिति) के महासचिव भी हैं.

तेलतुंबड़े ने अपने ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इनकार के बाद उन्होंने अग्रिम ज़मानत के लिए याचिका दायर की थी. ये याचिका भी बीते सप्ताह रद्द हो गई थी.

इससे पहले पुणे की कोर्ट ने उनकी याचिका ख़ारिज कर दी थी जिसके बाद पुणे पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत पर सुनवाई पूरी होने तक उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया था.

गौतम नवलखा

गौतम नवलखा एक मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है.

वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के पद पर भी रहे हैं.

नवलखा लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) से भी जुड़े रहे हैं.

नवलखा ने पीयूडीआर के सचिव के तौर पर भी काम किया है और इंटरनेशनल पीपल्स ट्राइब्यूनल ऑन ह्यूमन राइट्स ऐंड जस्टिस इन कश्मीर के संयोजक के तौर पर भी काम किया है.

उन्होंने कश्मीर और छत्तीसगढ़ में 'फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग मिशन' पर विस्तार से काम किया है.

वो कश्मीर मुद्दे पर जनमत संग्रह का भी समर्थन कर चुके हैं जिसकी वजह से उन्हें मई 2011 में श्रीनगर में दाख़िल नहीं होने दिया गया था.

पीयूडीआर से लगभग चार दशकों से जुड़े रहे नवलखा ने मज़दूरों, दलितों आदिवासियों और सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों पर काम किया है.

भीमा कोरेगांव में क्या हुआ था?

पुणे के नज़दीक भीमा कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को हिंसा भड़क गई थी. हर साल इस दिन हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं.

इस हिंसा का असर पूरे देश में देखा गया.

पुणे पुलिस ने एक शिकायत के आधार पर जांच शुरू की जिसमें कहा गया था कि हिंसा से एक दिन पहले 31 दिसंबर 2017 को यलगार कॉन्फ़्रेंस में ऐसे भाषण दिए गए जिससे हिंसा भड़की.

इस कॉन्फ़्रेंस के पीछे संदिग्ध माओवादिओं का हाथ बताया गया और पुणे पुलिस ने कई वामपंथी कार्यकर्ताओं को माओवादियों से संबंध के आरोप में देश के कई हिस्सों से गिरफ़्तार किया था.

ये संदिग्ध कार्यकर्ता और लेखक अदालत में इस केस को लड़ रहे हैं. आनंद तेलतुंबड़े और गौतम नवलखा इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गए थे.

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