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कोरोना वायरस और लॉकडाउनः आख़िर देश का किसान किस-किस से लड़े?
- Author, सिराज हुसैन
- पदनाम, पूर्व कृषि सचिव
कोरोना वायरस की महामारी आने से पहले भी भारत में किसानों की आमदनी बहुत कम थी.
भारत में रूरल बैंकिंग की रेगुलेटरी एजेंसी नाबार्ड की तरफ़ से साल 2016-17 में कराए गए ऑल इंडिया रूरल फिनांशियल इन्क्लूजन सर्वे में ये पाया गया था कि किसान परिवारों की हर महीने औसत आमदनी 8931 रुपए है और इसका तकरीबन 50 फ़ीसदी हिस्सा मज़दूरी और सरकार या किसी और का कुछ काम करके आता है.
कोरोना वायरस के संक्रमण को बढ़ने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण किसानों की आमदनी का ये हिस्सा बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.
ये किसानों की ख़ुशनसीबी ही थी कि भारत में लॉकडाउन ऐसे वक़्त में नहीं लगा जब बुआई का सीज़न था.
गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में रबी की फसल की कटाई शुरू ही हुई थी.
इन राज्यों में गेहूं, सरसों, चना, मसूर उपजाने वाले किसान फसल कटाई के लिए स्थानीय मज़दूरों की मदद लेते हैं.
लॉकडाउन का असर
फसल की कटाई पर इस लॉकडाउन का कोई गंभीर असर नहीं पड़ा है.
हालांकि मध्य प्रदेश में फसल काटने वाले मज़दूरों की उपलब्धता सामान्य समय की तुलना में इस बार कम थी.
सर्दियों के थोड़ा लंबा खिंच जाने और मार्च में हुई बेमौसम की बारिश की वजह से इस बार पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल की कटाई के लिए 15 अप्रैल तक इंतज़ार करना होगा.
उत्तर प्रदेश में गन्ने की कटाई और फसल की बुआई ज़्यादातर स्थानीय मज़दूरों के भरोसे होती है.
लॉकडाउन से राहत
सरकार ने 28 मार्च को लॉकडाउन के लिए जारी दिशानिर्देशों में कुछ बदलाव किए और कई गतिविधियों को इससे राहत दी.
· कृषि उपज की ख़रीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित कराने में लगी एजेंसियां
· कृषि उत्पाद बाज़ार समिति द्वारा संचालित मंडियाँ
· किसानों और कृषि मज़दूरों का खेतों में काम करना
· खेती-किसानी के काम आने वाली मशीनों को छोटे और सीमांत किसानों को मुहैया कराने वाले कस्टम हायरिंग सेंटर
· उर्वरकों, कीट नाशकों और बीजों के उत्पादन और पैकेजिंग यूनिट्स
· बुआई और कटाई के काम आने वाली मशीनों को एक जगह से दूसरी जगह पर लाना-ले जाना
· पशु चिकित्सा अस्पताल
किसानों के लिए एडवाइजरी
31 मार्च को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने रबी की फसल के मद्देनज़र किसानों के लिए विस्तार से एक एडवाइजरी जारी की.
फसल की कटाई और इसकी बिक्री के दौरान किसान सोशल डिस्टेंसिंग का कैसे पालन करें, इस बारे में एडवाइजरी में विस्तार से समझाया गया है.
अभी ये मालूम नहीं है कि राज्य सरकारों ने आईसीएआर की गाइडलाइंस का स्थानीय भाषा में अनुवाद कराकर उसे रेडियो, एसएमएस या अन्य माध्यमों से प्रचार करने का काम किया या नहीं जिससे ये जानकारी ज़्यादा से ज़्यादा किसानों तक पहुंच सके.
हालांकि केंद्र सरकार ने लॉकडाउन से खेती-किसानी को जिस तरह की छूट देने का एलान किया, राज्य सरकारें अपने यहां उस पर वास्तविक रूप में अमल नहीं कर रही हैं.
दिल्ली, मुंबई और नासिक में कृषि उत्पाद बाज़ार समिति द्वारा संचालित मंडियाँ काम कर रही हैं.
क़ीमत में गिरावट
चूंकि इन शहरों में कैटरिंग और रेस्तरां बिज़नेस इस समय लगभग बंद है, इसलिए मांग में कमी के बावजूद शहर में रहने वाले लोगों को किसी कमी का अहसास नहीं हो रहा है.
हालांकि बहुत सारी जगहों पर ज़िला पुलिस की तरफ़ से स्पष्ट आदेश की ग़ैरमौजूदगी में मंडियों को नहीं खुलने दिया जा रहा है.
जल्द ख़राब हो जाने वाली कृषि उपजों की ढुलाई करने वाली गाड़ियों को ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मी रोक रहे हैं.
इससे किसानों को नुक़सान हो रहा है, उन्हें वाजिब क़ीमत नहीं मिल पा रही है.
मीडिया रिपोर्टों में ये कहा जा रहा है कि मिर्ची, आम, अंगूर और दूसरी फल-सब्ज़ियों की क़ीमतों में गिरावट देखी जा रही है.
पॉल्ट्री किसानों का हाल
लॉकडाउन से काफ़ी पहले ही सोशल मीडिया पर ऐसी फर्जी ख़बरें फैलाई गईं कि चिकन और अंडा खाने की वजह से कोरोना वायरस का संक्रमण होता है.
इससे पॉल्ट्री प्रोडक्ट तैयार करने वाले किसानों को बहुत नुक़सान हुआ और वे बर्बादी की कगार पर पहुंच गए.
दिल्ली की ग़ाज़ीपुर मंडी का ये हाल था कि वहां ब्रॉयलर चिकन की क़ीमत गिरकर 45 रुपए किलो तक पहुंच गई थी. इसी फरवरी में यही ब्रॉयलर चिकन 80 रुपए में एक किलो की दर पर मिल रहा था.
आप हालात का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि किसानों को एक किलो का मुर्गा तैयार करने में 80 रुपए का ख़र्च आता है.
कोरोना वायरस की महामारी के बाद पॉल्ट्री सेक्टर में काम कर रहे किसानों को दूसरे बिज़नेस मॉडल के बारे में सोचना होगा.
डेयरी इंडस्ट्री की तस्वीर
ठीक इसी तरह दूध की क़ीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई है.
फरवरी में दूध 45-50 रुपए प्रति लीटर की दर पर चल रहा था जो अब गिरकर 30 से 35 रुपए प्रति लीटर हो गया है.
चूंकि प्रशासन की पाबंदियों और मांग में कमी की वजह से मिल्क प्रोसेसिंग यूनिट्स अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्होंने किसानों से दूध की ख़रीद ही कम कर दी है.
लॉकडाउन की वजह से सबसे बुरा हाल तो फल और सब्ज़ियां और जल्द ख़राब होने वाली फसल उपजाने वाले किसानों का है.
इनकी उपज ज़्यादा समय तक स्टोर नहीं की जा सकती हैं.
फसल की ख़रीद
पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल की ख़रीद 15 अप्रैल से शुरू होगी.
पंजाब और हरियाणा इस मौक़े के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. इन राज्यों ने ख़रीद केंद्रों की संख्या पहले से दोगुणी कर दी है.
किसानों के आने के लिए उन्होंने अलग-अलग समय आबंटित किए हैं, भीड़ इकट्ठा न हो, इसलिए सूचना प्रौद्योगिकी का सहारा ले रहे हैं.
ख़रीद केंद्रों पर साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए हैं.
पिछले 12 सालों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा ने फसल ख़रीद की असरदार व्यवस्था बनाई है.
बिहार ने बहुत ज़्यादा तरक्की नहीं की है. इसलिए उसके किसानों को इस बार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम क़ीमत पर मक्का और गेहूं बेचना होगा.
दलहन और तिलहन
हालांकि दलहन और तिलहन के किसान कम क़ीमतों का सबसे ज़्यादा खामियाजा भुगतने जा रहे हैं.
दलहन और तिलहन की ख़रीद करने वाली सरकारी एजेंसी नाफेड पहले से ही 35 लाख टन दाल के स्टॉक पर बैठा हुआ है. इसकी ख़रीद पिछले सालों में हुई थी.
अभी इस बारें में तस्वीर साफ़ नहीं है कि नाफेड और ख़रीदारी कैसे कर पाएगा?
महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में चना, मसूर और सरसों उपजाने वाले किसान नाफेड की तरफ़ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं.
क्योंकि लॉकडाउन और मंडियों के बंद होने से क़ीमतें नीचे जा रही हैं और किसानों को नाफेड से न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने की उम्मीद है.
जब हालात अच्छे रहते हैं तब भी किसानों और ग्रामीण परिवारों के घरों में कम आमदनी होती है.
ये किसान कोरोना वायरस की महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से राहत मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
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(लेखक आईसीआरआईईआर के सीनियर विज़िटिंग फेलो हैं.)
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