चंद्रयान 2 में आम आदमी को क्यों रखनी चाहिए दिलचस्पी

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- Author, गौहर रज़ा
- पदनाम, वैज्ञानिक और उर्दू कवि, बीबीसी हिंदी के लिए
एक आम नागरिक को मिशन चंद्रयान 2 से क्या मतलब होना चाहिए?
ग़रीबी की मकड़जाल में फंसे आम आदमी, जिसने विज्ञान कभी पढ़ा ही नहीं, उसके लिए लिए इतने बड़े स्तर का यह मिशन किसी परीकथा से कम नहीं है. रॉकेट, उपग्रह, ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर जैसे शब्दों से कभी उसका वास्ता नहीं पड़ा.
मगर इससे पहले कि हम इस सवाल का जवाब तलाशें, हमें पूछना चाहिए कि जिस देश की संपदा ब्रितानी साम्राज्यवाद ने उलीच ली थी, उस नए देश ने क्यों अंतरिक्ष विज्ञान पर पैसा खर्च का फ़ैसला किया था?
शुरुआती दौर में विक्रम साराभाई और इसरो से जुड़े सभी वैज्ञानिकों को तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था और उन्हें कई बार इस सवाल से दो-चार होना पड़ा था.

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विक्रम सारभाई उस समय के राजनीतिक नेतृत्व को यह समझा पाए थे कि "हमें मनुष्य और समाज की असल समस्याओं के हल के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए."
वह इस बात को लेकर भी स्पष्ट थे कि भारतीय अंतरिक्ष अभियान का लक्ष्य "चंद्रमा और अन्य ग्रहों की पड़ताल करने या मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ानें भरने को लेकर आर्थिक रूप से संपन्न देशों के साथ मुक़ाबला करना नहीं है."
इसीलिए हम बाक़ियों से अलग एक ऐसे देश रहे जिसने अपना अंतरिक्ष अभियान सैन्य उपयोग के लिए शुरू नहीं किया था. यह असैन्य परियोजना थी जबकि अमरीका, यूरोप और सोवियत संघ का स्पेस रिसर्च शीत युद्ध के कारण शुरू हुआ था.

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क्या बदल गया है मक़सद
स्वाभाविक सा सवाल उठता है कि क्या अब भारत के अंतरिक्ष अभियान का मक़सद बदल गया है? या फिर "चांद और अन्य ग्रहों" की पड़ताल से "मानव और समाज की कौन सी असल समस्याएं" हल हो सकती हैं?
इन सवालों का जवाब 'वैज्ञानिक शोध' की बुनियादी प्रकृति में है. सामान्य तौर पर विज्ञान और ख़ासकर अंतरिक्ष शोध का मतलब है- अनछुए क्षेत्रों की पड़ताल करके ज्ञान जुटाना जिससे कि मानव जाति के प्रादुर्भाव और विकास के आधार का पता चल सके.
यह बात सर्वविदित है कि साराभाई का आर्थिक रूप से विकसित देशों की नकल करने या फिर उनसे मुक़ाबला करने के लिए विरोध हुआ था.
मगर हमें भूलना नहीं चाहिए कि 1960 के दशक में अगर वो खिलौने जैसे रॉकेट न बनाए गए होते और उन्हें केरल के तुंबा में मौजूद एक चर्च के पास से लॉन्च न किया होता तो भारत चांद और मंगल पर अभियान भेजने में सक्षम नहीं हुआ होता.

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बीते कल के उन आलोचकों को भला कौन समझा पाता कि एक दिन भारत के अपने उपग्रह होंगे जो समय से पहले चेतावनी देकर लाखों ज़िंदगियों को बचाने में सक्षम होंगे. ऐसे उपग्रह होंगे जिनसे फसलों और वनों के प्रबंधन और राष्ट्रीय संचार प्रणाली को मज़बूत करने में मदद मिलेगी.
ऐसा न होता तो अधिकतर देशों की तरह हम भी अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए विकसित देशों की कृपा पर निर्भर करते.
इसरो, सीएसआईआर, आईएआरआई, एटॉमिक एनर्जी और डीआरडीओ ने पिछले 70 सालों में जो कुछ हासिल किया है, उसे 1950 और 60 के दशकों में किसी साइंस फ़िक्शन की पटकथा ही समझा जाता. किसने सोचा होगा कि चक्रवात को लेकर उपग्रह से मिले आंकड़ों के आधार पर तटीय इलाक़ों से लगभग आठ लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाकर ग़रीब विकासशील देश में इंसानों की जान बचाई जा सकती है.
यह कल्पना से परे था कि एक दिन देश में 1000 से अधिक टीवी चैनल होंगे उनमें से अधिकतर स्वदेशी तकनीक इस्तेमाल कर रहे होंगे. यह सूची ज़रा लंबी है.

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चंद्रयान के बारे में जानना क्यों ज़रूरी
फिर से बुनियादी सवाल की ओर लौटते हैं कि क्यों एक आम आदमी को विज्ञान से वास्ता रखना चहिए और ख़ासकर चंद्रयान 2 में क्यों उसकी दिलचस्पी होनी चाहिए.
वैसे तो इसे लेकर हम एक अंतहीन बहस में उलझ सकते हैं मगर मैं यहां कुछ कारणों की ज़िक्र करना चाहूंगा. सबसे पहला कारण तो यह है कि विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जिसमें किसी एक खोज या आविष्कार ने ब्रह्मांड, सौर प्रणाली और इंसानों के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया.
वैज्ञानिक जानकारियों ने लगातार हमारे जीवन और सामाजिक संबंधों पर असर डाला है. हालांकि, आज की दुनिया में समाज के सहयोग से कोई वैज्ञानिक खोज नहीं की जा सकती.

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अब, जबकि अधिकतर समय विज्ञान को आगे बढ़ाने का काम एकांत में और लोगों की नज़र से छिपाकर किया जाता है, तब इस तरह के बड़े कार्यक्रम राष्ट्रीय बहस खड़ी कर देते हैं और लोगों की वैज्ञानिक समझ भी बढ़ाते हैं. इससे वैज्ञानिक समुदाय और आम नागरिकों के बीच विश्वास पैदा होता है.
स्वायत्त जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके वैज्ञानिक क्या कर रहे हैं और अगर ज़रूरी हो तो वह उन्हें "इंसान और समाज की असल समस्याओं" को हल करने का निर्देश का भी अधिकार रखती है.
चंद्रयान 2 जैसे प्रॉजेक्ट पूरे हो जाएं तो इन्हें वैज्ञानिक समुदाय का रिपोर्ट कार्ड समझा जा सकता है क्योंकि इससे पता चलता है कि देश में विज्ञान किस स्तर पर, किस स्थिति में हैं.

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सॉफ़्ट लैंडिंग बड़ी बात क्यों
जनता को यह भी पता होना चाहिए कि चांद पर सॉफ़्ट लैंडिंग क्यों राष्ट्रीय सम्मान का विषय है और लैंडिंग के लिए चांद के दक्षिणी ध्रुव को चुनना क्यों महत्वपूर्ण है.
चंद्रमा पर गुरुत्वाकार्षण बल और वायुमंडल की परिस्थितियां पृथ्वी से बहुत अलग हैं. हम पृथ्वी पर सॉफ़्ट लैंड करवाने की तकनीक पर पहले ही महारत हासिल कर चुके हैं. लैंडर की गति कैसे बढ़ानी है, कैसे कम करनी है और उसे कहां कैसे मोड़ना है, इसके लिए हम हवा को इस्तेमाल करते हैं.
हवाई जहाज़, हेलिकॉप्टर, होवरक्राफ़्ट और ड्रोन इसी तरह से पृथ्वी की सतह पर बिना क्रैश हुए आराम से लैंड करते हैं. मगर चांद पर हवा नहीं है. इसलिए, वहां सॉफ़्ट लैंडिंग करने के लिए ईंधन की ज़रूरत है. गति बढ़ाने, कम करने और लैंडर को सही जगह पर उतरने के लिए गाइड करने के लिए भी ईंधन चाहिए.
इस पूरी प्रक्रिया के लिए बेहद तेज़ी और सटीकता चाहिए. भारत इसे हासिल करने वाला चौथा देश होगा.

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दक्षिणी ध्रुव ही क्यों
चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र को लैंडिंग के लिए चुने जाने के दो कारण हैं. पहला तो यह कि इससे हमें पता चलेगा कि वहां पर मिट्टी की बनावट उत्तरी हिस्से जैसी ही है या नहीं.
इससे हमें हमारे सोलर सिस्टम की उत्पत्ति को समझने की दिशा में अहम जानकारियां मिलेंगी. दूसरा कारण है कि हम जानना चाहेंगे कि इस क्षेत्र में पानी है या नहीं और क्या वह इतनी मात्रा में है कि उसे इस्तेमाल किया जा सके.
यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान करता रहा है क्योंकि वहां पानी हुआ तो इससे चांद में बस्तियां बसाने का रास्ता खुलेगा और उसे अंतरिक्ष के आगे के खोजी अभियानों के लिए सस्ते लॉन्च पैड के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा.

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अगर हमें चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी का एक संग्रह भी मिलता है तो इससे चांद के बारे में हमारी पूरी अवधारणा ही बदल जाएगी क्योंकि भले ही उसकी सतह पर पानी के अणुओं की मौजूदगी के सबूत मिले हैं, फिर भी उसे अब तक पूरी तरह शुष्क समझा जाता है.
चंद्रयान 2 प्रॉजेक्ट एक बदलाव का भी स्पष्ट संकेत है. अब तक इसरो का फ़ोकस अंतरिक्ष से जुड़ी तकनीक पर महारत हासिल करना था. मगर अब इसरो अपनी चाहर दीवारी से परे बड़ी संख्या में संस्थानों, जिनमें विश्वविद्यालय आदि शामिल हैं, उन्हें भी शामिल करेगा.
अक्सर साराभाई के एक कथन का ज़िक्र किया जाता है, "सरकार का सबसे अच्छा रूप कौन सा है? सरकार वह है जो "शासन" कम करे और इसके बजाय जनता की ऊर्जा को इकट्ठा करके इस्तेमाल करने के रास्ते तलाशे."
तो लोगों की ऊर्जा को इस्तेमाल करने के साराभाई के सपने के तहत अब वैज्ञानिक समुदाय के बड़े काफ़ी बड़े हिस्से को समाहित किया जाएगा.

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आख़िर में एक सबसे महत्वपूर्ण बात, इस तरह के प्रॉजेक्ट देश की आम जनता के पैसों की मदद से चलाए जाते हैं. इसलिए उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनका पैसा आने वाली पीढ़ियों के लिए फ़ायदेमंद होगा या नहीं.
मुझे विश्वास है कि चंद्रयान 2 आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के उस क्षितिज को छूने के लिए प्रेरित करेगा, जिसके बारे में आज हमने सोचा भी नहीं है.
हो सकता है कि वे चांद या मंगल पर पहली इंसानी बस्ती भारत की ओर से बसाए जाने का सपना देखें.
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