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'प्रधानमंत्री बनने लायक़ नहीं आडवाणी' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली में शुक्रवार को पत्रकारों से बात करते हुए प्रधानमंत्री के तेवर काफ़ी चुनावी थे हालांकि पांच साल में एकाध बार ही उनके ऐसे तेवर दिखाई देते हैं. टेलीविज़न पर बहस की आडवाणी की चुनौती के बारे में मनमोहन सिंह ने कहा कि वे ऐसा नहीं चाहते क्योंकि वे नहीं समझते कि आडवाणी प्रधानमंत्री पद के लायक़ हैं. उन्होंने कहा, "सारे मुद्दों पर बहस की जगह संसद है, चाहे मुद्दा परमाणु समझौते का हो या कोई और. लेकिन भाजपा ऐसी बहसों से बचती रही है. अब आडवाणी का ये कहना है कि मैं आकर उनके साथ बहस करूँ, लेकिन मैं उन्हें कोई मौक़ा नहीं देना चाहता जिससे लगे कि वे आवश्यक रूप से वैकल्पिक प्रधानमंत्री हैं." उन्होंने जम कर आडवाणी की आलोचना की और बिंदुवार ये बताने की कोशिश की चाहे वे आडवाणी की तरह अच्छा बोल न पाते हों लेकिन वे ज़्यादा सक्ष्म प्रधानमंत्री हैं और वे ज़्यादा मज़बूत नेता हैं. दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी मज़बूत नेता निर्णायक सरकार के नारे को ही आगे बढ़ा रही है. प्रधानमंत्री ने ये कहा कि बात से कुछ नहीं होता आप के कर्म दिखाते हैं और आपकी कृतियों से पता चलता है कि आप कितने मज़बूत हैं. उन्होंने क़ंधार की बात की जहां आतंकवादियों को छोड़ दिया गया था. उन्होंने बात की अक्षरधाम पर हमले की, संसद पर हमले की जब आडवाणी गृह मंत्री थे और वो कुछ नहीं कर पाए. सिखों की भावना जहां तक जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार का मामला है उन्होंने कहा चाहे देर से ये फ़ैसला हुआ लेकिन कांग्रेस ने ये फ़ैसला लेकर ये दिखा दिया कि पार्टी सिख समुदाय की भावना को समझती है और उसके बारे में कुछ सोचती है, कुछ करना चाहती है. मनमोहन सिंह का ज़ोर इस बात पर रहा कि वो ज़्यादा सक्षम प्रधानमंत्री हैं. उन्होंने बताया कि देश की अर्थव्यवस्था में कैसे सुधार आया है. उन्होंने कहा कि कृषि विकास दर साढ़े तीन प्रतिशत रही जबकि जब एनडीए के साशन काल में ये आधा प्रतिशत थी. उनका कहना था कि उनकी सत्ता का जो रिकॉर्ड है वो बहुत अच्छा है इसलिए उनके रिकॉर्ड को देखते हुए लोगों को उनको मत देना चाहिए. साथी साथ छोड़ गए जब उनसे पूछा गया कि यूपीए गठबंधन के कई साथी उनका साथ छोड़ गए, चार साल तक वाम दल उनके साथ रहे फिर छोड़ गए, समाजवादी पार्टी से लेकर लालू प्रसाद सभी अब अलग थलग पड़े हैं तो वे उनको कैसे देखते हैं तो उन्होंने कहा कि वे समझते हैं कि चुनाव के बाद चीज़ें बदलेंगी. उन्होंने कहा:
पाकिस्तान से बात-चीत पर जब उनसे सवाल पूछे गए तो उनका ये कहना था कि बात-चीत के लिए किसी तरह का दबाव अगर कोई डालता भी है तो दबाव भारत पर काम नहीं करेगा. भारत पाकिस्तान से तभी बात करेगा जब 26/11 की घटना पर पाकिस्तना ऐसी कार्वाई करे जिस से भारत संतुष्ट हो. चुनावी रंग मनमोहन सिंह पूरे चुनावी रंग में दिखे और तेज़ तर्रार नेताओं की तरह आक्रामक रवैया आपनाया. सफ़ाई ये दी कि वो लोकसभा चुनाव इसलिए नहीं लड़ रहे हैं कि स्वास्थ उनका साथ नहीं दे रहा है हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि राज्य सभा से कई प्रधानमंत्री बने हैं. उन्होंने कहा, "कमज़ोर या मज़बूत- ये ज़ोर-ज़ोर से बातें करने से तय नहीं होता. मैं ग़लत भाषा में बात करने का अभ्यस्त नहीं हूँ. इस तरह की भाषा के इस्तेमाल से किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता. मैं भले ही अच्छा वक्ता नहीं हूँ. लेकिन मैं फ़ैसले लेता हूँ. आडवाणी जी का क्या रिकॉर्ड है?" उन्होंने अंत में भी निशाना साधते हुए कहा कि अगर आडवाणी जी ये चाहते हैं कि वो लोकसभा से प्रधानमंत्री बनें तो उनको संविधान में संशोधन करना होगा और उसके लिए उनको इंतज़ार करना होगा. | इससे जुड़ी ख़बरें मनमोहन लोक सभा चुनाव लड़ें: आडवाणी26 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस 'मनमोहन सिंह ही होंगे प्रधानमंत्री'24 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस आडवाणी के निशाने पर फिर मनमोहन24 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस वरुण की टिप्पणियाँ दुर्भाग्यपूर्ण: मनमोहन19 मार्च, 2009 | भारत और पड़ोस लोकसभा में विश्वास मत पर तीखी बहस 21 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस 'इंसाफ़ मिलने में देरी एक बड़ी चुनौती'20 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस 'इंसाफ़ मिलने में देरी एक बड़ी चुनौती'20 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस वाम दलों ने बैठक बुलाने की मांग की06 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस वाम दलों ने बैठक बुलाने की मांग की06 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस जो बीत चुका, उसे पीछे छोड़ें: मनमोहन05 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस जो बीत चुका, उसे पीछे छोड़ें: मनमोहन05 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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