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शुक्रवार, 20 फ़रवरी, 2009 को 01:55 GMT तक के समाचार
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स्वात के समझौते से अमरीका चिंतित
स्वात घाटी में तालेबान समर्थक
स्वात घाटी के इलाक़े में तालेबान गुटों का दबदबा पहले से ही है

पाकिस्तान के सूबा सरहद की स्वात घाटी में तालेबान चरमपंथियों और सरकार के बीच हुए शांति समझौते को लेकर अमरीका ने गहरी चिंता जताई है.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के लिए अमरीका के विशेष दूत रिचर्ड हॉलब्रुक ने कहा है कि उन्होंने इस बारे में टेलीफ़ोन पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी से बातचीत की है.

पिछले सोमवार को हुए इस समझौते के तहत उस क्षेत्र में शरिया क़ानून लागू किया जा सकेगा.

इस समझौते पर नैटो के सदस्य देशों ने भी चिंता जताई है क्योंकि नैटो की सेनाएँ पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर तालेबान चरमपंथियों से संघर्ष कर रही हैं और उनका मानना है कि इस समझौते से तालेबान की ताक़त बढ़ेगी.

भारत ने भी इस समझौते पर निराशा जताते हुए कहा था कि तालेबान मानवीयता के दुश्मन हैं.

'अंतरिम व्यवस्था'

आसिफ़ अली ज़रदारी से हुई बातचीत के बाद रिचर्ड हॉलब्रुक ने एक टेलीविज़न साक्षात्कार में कहा कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि पाकिस्तान सरकार इस्लामाबाद से बमुश्किल सौ मील दूर के इलाक़े में इस तरह का समझौता कैसे कर सकती है.

 राष्ट्रपति ज़रदारी ने इस बात से असहमत नहीं थे कि जो लोग इस समय स्वात घाटी को चला रहे हैं वो हिंसक ठग और चरमपंथी हैं और वे न केवल पाकिस्तान बल्कि अमरीका के लिए भी ख़तरा हैं
रिचर्ड हॉलब्रुक

अमरीका के विशेष दूत हॉलब्रुक ने कहा कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने उन्हें आश्वस्त किया है कि यह समझौता एक 'अंतरिम व्यवस्था' है जिसका उद्देश्य स्वात घाटी में स्थिरता लाना है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार उनका कहना था, "राष्ट्रपति ज़रदारी ने इस बात से असहमत नहीं थे कि जो लोग इस समय स्वात घाटी को चला रहे हैं वो हिंसक ठग और चरमपंथी हैं और वे न केवल पाकिस्तान बल्कि अमरीका के लिए भी ख़तरा हैं."

उनका कहना था कि वे ख़ुद, राष्ट्रपति बराक ओबामा और विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इस बात से चिंतित हैं कि जिसे मीडिया समझौता कह रहा है वह आख़िरकार आत्मसमर्पण में तब्दील न हो जाए.

रिचर्ड हॉलब्रुक का कहना था कि राष्ट्रपति ज़रदारी ने उनसे कहा है कि ऐसा नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ज़रदारी ने बताया है कि अभी उन्होंने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.

लेकिन वॉशिंगटन में बीबीसी संवाददाता ब्रजेश उपाध्याय का कहना था कि रिचर्ड हॉलब्रुक पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कह सके कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं ही करेंगे.

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