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बहुत कुछ बदला है सीएसटी पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुंबई में हुए चरमपंथी हमलों के एक महीने बाद छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर चहल-पहल लौट चुकी है लेकिन कई चीज़ें अब बदल चुकी हैं. स्टेशन पर अब पहले जैसी भीड़ नहीं होती है और लोग थोड़े सतर्क दिखते हैं मानो वो हर चीज़ को शक की निगाह से देख रहे हों. स्टेशन पर पुलिसकर्मियों की संख्या दोगुनी हो चुकी है और चेकिंग ज़ोरों पर है. रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ़) के विशेष जवान गश्त पर हैं और आने-जाने वाले हर व्यक्ति की पूरी तलाशी हो रही है. आरपीएफ़ के हेड कांस्टेबल और लोगों की तलाशी कर रहे पीजे सादिया बताते हैं कि अब सुरक्षा बहुत कड़ी कर दी गई है. जाँच उन्होंने बताया, "एक्स-रे मशीन तो बहुत पहले से लग गई थी लेकिन अब एकदम कड़ाई से सब चीज़ों की जाँच हो रही है. हमारे पास अब स्पेशल फ़ोर्स भी है जिनके पास ऑटोमैटिक हथियार हैं. हेलमेट है और बुलेट प्रूफ़ जैकेट्स भी हैं." आरपीएफ़ के एक जवान की छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर चरमपंथियों के साथ गोलीबारी में मौत हुई थी जबकि कई जवान घायल हो गए थे. इसका कारण जवानों के पास पुराने हथियार होना बताया गया था शायद यही कारण था कि अब विशेष फ़ोर्स के जवानों के पास अत्याधुनिक हथियार हैं. स्टेशन पर आए लोग अब सुरक्षा को गंभीरता से लेते हैं. स्टेशन पर मौजूद शरद शर्मा कहते हैं, "हमले के बाद स्टेशन आने में बहुत डर लगता था लेकिन अब डर नहीं लगता. सुरक्षा कड़ी है इसलिए अब हमारा डर कम हो गया है." हालाँकि अब भी स्टेशन पर वैसी भीड़ नहीं हो रही है जैसी पहले होती थी.
स्टेशन पर रेस्तरां चलाने वाले प्रमोद गुप्ता कहते हैं, "लोग आते तो हैं लेकिन अब स्टेशन पर समय नहीं बिताते. फ़ोन पर पूछ लेते हैं कि ट्रेन कितनी लेट है उसी हिसाब से आते हैं क्योंकि उस दिन वही लोग ज़्यादा मारे गए थे जो ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे." छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर चरमपंथियों की गोलीबारी में साठ से सत्तर लोग मारे गए थे लेकिन इस स्थान को मीडिया में उतनी जगह नहीं मिली जितनी ताज या ओबेराय को मिली. मीडिया की नज़र में यह स्टेशन भले ही उपेक्षित रहा हो लेकिन आज यहाँ की सुरक्षा देखकर नहीं लगा कि सरकार के एजेंडे में यह स्टेशन महत्वपूर्ण नहीं है. |
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