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जम्मू और कश्मीर में 'दूरियाँ' बढ़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जम्मू आजकल भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की राजधानी का रूप लेने की तैयारी में है. नवंबर के पहले सप्ताह से जम्मू राजधानी बन जाएगा लेकिन इस बार कश्मीर के उन लोगों का यहाँ आना मुश्किल लग रहा है जो यहाँ सर्दियाँ बिताने आया करते थे. यह भारत का ऐसा अकेला राज्य है जहाँ दो राजधानियाँ हैं. गर्मियों में ठंडा और पहाड़ी श्रीनगर और सर्दियों में कुछ कम ठंडा जम्मू. क़रीब 100 सालों से ऐसा ही होता रहा है जिसकी शुरूआत राजाओं के ज़माने से ही हो गई थी और इसे दरबारी कार्य की संज्ञा दी गई थी. इसके तहत सर्दियों में न केवल क़रीब दस हज़ार सरकारी कर्मचारी ही जम्मू आ जाते हैं बल्कि क़रीब दो लाख कश्मीरी नागरिक भी पहाड़ों की कड़कड़ती सर्दी से बचने के लिए जम्मू पहुँच जाते हैं. कश्मीरी नागरिक जम्मू में क़रीब छह महीने किराए का घर लेकर या पेइंग गेस्ट बनकर रहते थे. कुछ लोग तो इस नज़रिए से मकान ख़रीद भी लेते थे. लेकिन इस साल जम्मू आने वाले कश्मीरियों की संख्या काफ़ी कम रहने का अनुमान है. डर और शंका इसका कारण कश्मीर और जम्मू में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को आबंटित ज़मीन के विरोध में लोगों के रोष से फैला डर और शंका है.
शहर के एक प्रॉपर्टी डीलर सुभाष सिंह सलाथिया ने बीबीसी को बताया, "इस साल जम्मू आने वाले कश्मीरियों की संख्या काफ़ी कम होगी. मुझे लगता है कि यह क़रीब 70 फ़ीसदी रह जाएगी." जम्मू शहर में एक निजी होटल चलाने वाले अविनाश गुप्ता ने कहा, "पिछले साल इस समय तक मेरे पास 30 कश्मीरी मेहमान थे लेकिन इस साल कुल सात हैं. उम्मीद करता हूँ कि यह संख्या कुछ बढ़ेगी." कश्मीर के दक्षिणी ज़िले अनंतनाग के शेख रईस यहाँ के एक हॉस्टल में पिछले छह महीनों से रह रहे हैं. वे कहते हैं, "यहाँ रहने में हमें तो कोई समस्या नहीं दिखाई देती. डरने की कोई वजह नहीं है लेकिन कश्मीर में रहने वाले लोग समझते हैं कि यहाँ रहना सुरक्षित नहीं है." वे कहते हैं, "चाहे जम्मू के लोग हों या कश्मीर के, वे समझते हैं कि दूसरे क्षेत्र में वे सुरक्षित नहीं हैं." शेख रईस हों, सुभाष हों या अविनाश, उन्हें इस बात में कोई शक नहीं है कि यह शक, डर, विश्वास की कमी और संशय का माहौल अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन आबंटित करने के विरोध और समर्थन में बँट चुकी सोच का परिणाम है. विश्वास बहाली सुभाष को उम्मीद है कि यह खाई जल्द ही भर जाएगी. वे कहते हैं, "यह सब राजनेताओं का किया धरा है नहीं तो जम्मू और कश्मीर के बीच कोई विरोध नहीं था." अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन वापस लेने के लिए दो महीने से भी ज़्यादा लंबे समय तक विरोध जताने वाली अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के प्रवक्ता तिलकराज शर्मा विश्वास बहाली के बारे में कहते हैं, "यह डर हमने पैदा नहीं किया है और इसे बहाल करने का काम भी हमारा नहीं है. कश्मीरी जम्मू आ सकते हैं लेकिन उनका अपना व्यवहार ही उनकी सुरक्षा की गारंटी होगा." मुस्लिम बहुल कश्मीर घाटी में इस ज़मीन के आबंटन के बाद हज़ारों श्रद्धालुओं को मिल रही सुविधाओं को ख़त्म करने के लिए हिंसक प्रदर्शन किए गए थे. अलगाववादी संगठनों ने इसका विरोध करते हुए कहा था, यह ग़ैर कश्मीरी हिंदुओं को कश्मीर की घाटी में बसाने की साज़िश है ताकि यहाँ मुस्लिमों का बाहुल्य न रहे. बाद में यह आबंटन रद्द कर दिया गया था जिसके विरोध में और ज़मीन को दोबारा आबंटित किए जाने के लिए जम्मू में दो महीने तक प्रदर्शन किया गया था. फिर यह ज़मीन श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए श्राइन बोर्ड को वापस कर दी गई थी. ज़मीन के समर्थन और विरोध में हुए इस प्रदर्शन ने न केवल राज्य को क्षेत्रवाद में बाँट दिया बल्कि दोनों ओर से पहचान और अहं की सांप्रदायिक रस्साकशी भी शुरू हो गई. |
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