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दिल्ली विधानसभा की राजनीति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली देश की राजधानी है और पहले यह केंद्र शासित प्रदेश ही हुआ करता था. लेकिन 1991 में संविधान में संशोधन करके इसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र घोषित कर दिया गया. साथ ही एक विधानसभा भी दे दी गई. 1993 में दिल्ली की पहली विधानसभा का गठन हुआ. वैसे तकनीकी रुप से यह कहना ठीक नहीं होगा कि 1993 में गठिन विधानसभा दिल्ली की पहली विधानसभा थी क्योंकि 1952 से 1956 के बीच भी दिल्ली की एक विधानसभा थी. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना अभी भी राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों का हिस्सा बना हुआ है.
कांग्रेस पार्टी के चौधरी ब्रह्मप्रकाश 1952 से 1955 तक मुख्यमंत्री रहे फिर जीएन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया. 1956 में दिल्ली विधानसभा को भंग करके इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया. 1956 में इस विधानसभा को भंग कर दिया गया था और 1966 में दिल्ली को एक महानगर पालिका दे दी गई. वर्ष 1991 में 69वें संविधान संशोधन के अनुसार दिल्ली को 70 सदस्यों की एक विधानसभा दे दी गई जिसमें 12 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित थीं. वर्ष 1993 में दिल्ली विधानसभा के लिए पहले चुनाव हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली और मदनलाल खुराना मुख्यमंत्री चुने गए. 1996 में हवाला मामले में नाम आने के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और साहिब सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला.
इस विधानसभा का कार्यकाल 1998 तक था लेकिन चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी ने एक और मुख्यमंत्री बदला और केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफ़ा देकर सुषमा स्वराज अक्तूबर 1998 में मुख्यमंत्री बना दी गईं. सुषमा स्वराज दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री नियुक्त कर दी गईं. दस साल की सरकार दिसंबर, 1998 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीतकर आई. शीला दीक्षित मुख्यमंत्री चुना गया. उन्होंने अपना एक कार्यकाल पूरा किया और 2003 में हुए चुनावों में दूसरी बार जीतकर वे फिर मुख्यमंत्री बनीं. अपने दो कार्यकालों में विकास को मुद्दा बनाकर शीला दीक्षित के नेतृत्व में एक बार फिर कांग्रेस मैदान में है.
हालांकि उनके इस कार्यकाल में अदालत के आदेश पर दिल्ली के कारखानों को राज्य से बाहर जाना पड़ा और रिहायशी इलाक़ों में चल रहे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को सील भी किया गया. हालांकि दिल्ली की सुरक्षा दिल्ली सरकार की नहीं केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है लेकिन पिछले दिनों हुए विस्फोट के बाद मतदाताओं के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी एक मुद्दा है. इस बीच राज्य भाजपा ने मदन लाल खुराना को पार्टी छोड़कर जाते देखा और साहिब सिंह वर्मा को सड़क हादसे में गँवा दिया. हालांकि मदन लाल खुराना पार्टी में वापस लौट आए हैं लेकिन अब उनका दबदबा ख़त्म हो गया है. इन चुनावों में विजयकुमार मल्होत्रा को पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रुप में पेश करने का फ़ैसला किया है और अपेक्षाकृत कम उम्र के विजय गोयल और हर्षवर्धन को फ़िलहाल प्रतीक्षा सूची में रख दिया गया है. विजय कुमार मल्होत्रा इस समय दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में भाजपा के अकेले सांसद हैं क्योंकि 2004 में हुए चुनावों में बाक़ी छह सीटें कांग्रेस ने जीत ली थीं. |
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