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वाम, भाजपा ने सरकार को फिर लताड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते पर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुहर लगने के बाद भारत में राजनीतिक पार्टियों ने इस पर अपनी-अपनी पार्टी के रुख़ के मुताबिक ही प्रतिक्रिया दी है. सत्तारूढ़ गठबंधन ने इस समझौते को 'मील का पत्थर' क़रार दिया है जबकि मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने इसे 'देश की हार' कहा है. उधर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने सरकार से कहा है कि वो वॉशिंगटन के सामने समर्पण न करे. भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते पर अब 10 अक्तूबर को भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस हस्ताक्षर करेंगे. 'हाइड एक्ट प्लस' सीपीएम के अनुसार जो समझौता हुआ है वो दरअसल 'हाइड एक्ट प्लस' है और ये समझौता सामरिक दृष्टि से भारत के ख़िलाफ़ जाता है. समझौते पर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के हस्ताक्षर के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बीजेपी के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढ़ी ने कहा, " ये समझौता भारत की संप्रभुता और परमाणु स्वतंत्रा की क़ीमत पर हुआ है. " सीपीएम के महासचिव प्रकाश कारत ने इस समझौते को 'अमरीका के सामने पूर्ण समर्पण और भारत के हितों के साथ धोखा' क़रार दिया है. वामपंथी नेता नीलोत्पल बासु ने सांवाददाताओं को बताया कि वामपंथी पार्टियाँ इस दिन को 'अमरीकी साम्राज्यवाद के सामने समर्पण' के विरोध के लिए 'काला दिन' के तौर पर मनाएँगी. दूरदृष्टि की जीत दूसरी तरफ़ सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभीषेक मनु सिंघवी ने परमाणु क़रार पर राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की मुहर लगने को प्रधामंत्री मनमोहन सिंह की 'दूरदृष्टि की जीत' क़रार दिया है. उनका कहना था, "समझौता भारत के हित में है और भारत की सुपर पावर के तौर पर मान्यता है. यह प्रधामंत्री मनमोहन सिंह की 'दूरदृष्टि की जीत' है." भरोसे की ज़रूरत उधर अमरीका में भारत के राजदूत रोनेन सेन से जब सांवाददाताओं ने पूछा कि समझौते पर हस्ताक्षर के समय राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने जो भाषण दिया है क्या वो भारत की सभी चिंताओं को हल करता है तो उनका जवाब था - 'बिल्कुल'. रोनेन सेन का कहना था, "मैं समझता हूँ कि जॉज बुश का बयान ही सब कुछ कहता है. भारत ने कुछ मुद्दों पर चिंता जताई थी और भारत की सभी चिंताओं का ध्यान रखा गया है." इस विषय पर विपक्ष चिंता जताता रहा है कि भारत के परमाणु परीक्षण करने की स्थिति में अमरीका परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के गुट (एनएसजी) के दूसरे सदस्यों को भारत को परमाणु ईंधन देने से रोक सकता है. उस पर सेन का कहना था, "हमें अपने आप पर थोड़ा अधिक भरोसा करना चाहिए और अपना आत्म सम्मान भी बढ़ाना चाहिए. क्योंकि हमें हर समय ऐसे आश्वासनों की आवश्यकता नहीं पड़ती है." |
इससे जुड़ी ख़बरें बुश ने किए समझौते पर हस्ताक्षर08 अक्तूबर, 2008 | पहला पन्ना बुश ने मंज़ूरी का स्वागत किया28 सितंबर, 2008 | पहला पन्ना परमाणु समझौता पारित27 सितंबर, 2008 | पहला पन्ना 'परमाणु सहयोग के प्रारंभिक कदम शुरु'11 सितंबर, 2008 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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