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परमाणु मसले पर फिर राजनीति गरमाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-अमरीका परमाणु क़रार पर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के वॉशिंगटन पोस्ट में छपे एक पत्र ने भारत में एक बार फिर राजनीतक माहौल को गरमा दिया है. विपक्षी दल भाजपा और सीपीएम ने यूपीए सरकार से इस्तीफ़ा माँगा है और इस विषय पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग की है. दोनों ही दलों ने आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार जनता को गुमराह कर रही है. वहीं हाल ही में सरकार के समर्थन में आई समाजवादी पार्टी ने कहा है कि इस विवाद से वह दुविधा में है और वह मामले का पता लगाने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया देगी. हालांकि सरकार ने कहा है कि ये आशंकाएँ बेबुनियाद हैं और भारत का ताल्लुक़ अमरीका के साथ हुए 123 समझौते से ही है, अमरीका के अंदरूनी मामलों से नहीं. यह विवाद वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित जॉर्ज बुश के नौ महीने पुराने उस पत्र से पैदा हुआ है जिसमें उन्होंने अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा में विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष हॉवर्ड बर्मन को लिखा था कि अगर भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो अमरीका भारत के साथ परमाणु व्यापार तुरंत रोक देगा और अमरीका भारत को संवेदनशील परमाणु तकनीक नहीं देगा. यह विवाद ऐसे समय में खड़ा हुआ है जब परमाणु समझौते को परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों की मंज़ूरी के लिए विएना में अहम बैठक चल रही है. प्रतिक्रिया इस ख़बर के बाद ही भारत में विपक्षी दलों ने यूपीए सरकार पर हमले तेज़ कर दिए. हालांकि प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर कह रहे हैं कि भारत सरकार को इस पत्र की जानकारी थी और इसका समझौते पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुधवार रात आपात बैठक बुलानी पड़ी. बैठक के बाद विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा, "हमनें संबंधित रिपोर्ट पर चर्चा की लेकिन किसी देश के सरकार के आंतरिक संवाद पर टिप्पणी करना हमारी नीति नहीं है." उन्होंने कहा कि 'हम अमरीका के साथ असैनिक परमाणु समझौते के दायरे में ही आगे बढ़ेंगे.' वहीं विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे इस मसले पर राजनीति कर रहे हैं. लेकिन मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेने वाले वामपंथी दल इस सफ़ाई से संतुष्ट नहीं हैं. भाजपा ने तो गुरुवार को माँग की है कि यूपीए सरकार को इस मसले पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहिए. भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के ख़िलाफ़ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की घोषणा करते हुए कहा है कि बेहतर यह होगा कि सरकार ख़ुद इस्तीफ़ा दे दे.
सीपीएम के महासचिव प्रकाश कारत ने कहा है कि वामपंथी दल तो तीन महीने पहले से ही जानते थे कि सरकार भारत की जनता को गुमराह कर रही है. संभावना है कि इस मसले पर वामपंथी नेता शुक्रवार को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिलेंगे और संसद का विशेष सत्र बुलाने की माँग करेंगे. वामपंथियों के समर्थन वापस लेने के बाद सरकार के बचाव में के लिए आई समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कहा है कि वे इस मामले में दुविधा में हैं. पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, "वॉशिंगटन पोस्ट के पत्र में कुछ और लिखा है, विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कुछ और कहा है, तो हमारे सामने दुविधा की स्थिति है." उन्होंने कहा कि वे बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाक़ों के दौरे पर थे और वस्तुस्थिति को नहीं जानते इसलिए वे इसे पूरी तरह समझने के बाद ही इस पर फ़ैसला करेंगे. हालांकि यूपीए में शामिल लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि भारत को जब 123 समझौते से ही आगे बढ़ना है तो बुश की चिट्ठी से क्या लेना देना. | इससे जुड़ी ख़बरें एनएसजी की अहम बैठक शुरू04 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस भाजपा ने कहा, विशेष सत्र बुलाएँ04 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस एनएसजी की बैठक में सहमति नहीं22 अगस्त, 2008 | पहला पन्ना धोखा देने का सवाल ही नहीं: मुखर्जी 21 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस 'सरकार जनता को गुमराह न करे'21 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस विपक्ष ने प्रधानमंत्री से सफ़ाई माँगी10 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस वामदलों की समर्थन वापसी की घोषणा08 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस परमाणु करार में आए उतार-चढ़ाव04 जुलाई, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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