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वामदलों की समर्थन वापसी की घोषणा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में वाम मोर्चे ने घोषणा की है कि वह बुधवार को औपचारिक तौर पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लेगा. वामदलों के 59 सांसदों के समर्थन की बदौलत ही पिछले साढ़े चार साल तक सरकार को लोकसभा में बहुमत प्राप्त रहा है. मंगलवार को वाम मोर्चे की अहम बैठक के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने घोषणा की - "वाम मोर्चे ने बुधवार को राष्ट्रपति से समय माँगा है ताकि हम औपचारिक तौर पर उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गंठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने के बारे में सूचित कर सकें." उन्होंने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, "हम ने प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर बताया है कि पिछले साल 16 नवंबर की समनवय समिति की बैठक में फ़ैसला हुआ था कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ बातचीत के बाद समिति को बताया जाएगा की वहाँ क्या तय हुआ. लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया है." उनका ये भी कहना था कि प्रणव मुखर्जी की दस जुलाई की बैठक का इसलिए कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि प्रधानमंत्री ने विदेश यात्रा के दौरान आईएईए के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स से बातचीत करने की घोषणा की है. इससे पहले सोमवार को जी-8 के सम्मेलन में शामिल होने जापान गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारत जल्द ही परमाणु क़रार के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए के पास जाएगा. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जापान गए पत्रकारों के साथ बातचीत में ये भी कहा था कि अगर इस मुद्दे पर वाम दल समर्थन वापस लेते हैं तो बहुमत साबित करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त संसाधन हैं. वाम मोर्चे ने पिछले कई महीने से सरकार को स्पष्ट कर दिया था कि वह भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते के ख़िलाफ़ हैं और यदि इस दिशा में भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ अंतिम दौर की बातचीत शुरु करती है तो वे सरकार के समर्थन वापस ले लेंगे. वाम की डेडलाइन बेअसर ग़ौरतलब है कि वाम दलों ने शनिवार को केंद्रीय मंत्री और यूपीए-वाम समनवय समिति के सदस्य प्रणव मुखर्जी से पत्र लिखकर ये माँग की थी उन्हें सात जुलाई तक बताया जाए कि क्या सरकार आईएईए के साथ अंतिम दौर की बातचीत करने जा रही है या नहीं.
सरकार की ओर से कोई स्पष्टीकरण तो नहीं आया लेकिन विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने एक चिट्ठी लिखकर समनवय समिति की दस जुलाई को एक और दौर की बातचीत का प्रस्ताव दिया. विदेश मंत्री के इस प्रस्ताव को वाम नेताओं ने यह कह कर ख़ारिज कर दिया है कि प्रधानमंत्री के ताज़ा बयान के बाद अब बातचीत करने के लिए कुछ भी बचा नहीं है. आगे क्या होने की संभावना है? हालाँकि इस बीच मंगलवार को ही संसद के मॉनसून सत्र की तारीख़ घोषित की जाएगी. लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि परमाणु मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के 39 सदस्यों का समर्थन हासिल कर चुकी केंद्र सरकार लोकसभा का विशेष सत्र बुलाकर विश्वास प्रस्ताव रख सकती है.
वैसे संसद के मॉनसून सत्र के 11 अगस्त से शुरु होने की संभावना है. विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी तत्काल संसद का विशेष सत्र बुलाने और सरकार के विश्वास मत पेश करने की माँग कर चुके हैं. कांग्रेस ने इस स्थिति को भाँप कर पहले से ही समाजवादी पार्टी के नेताओं से समर्थन लेने के लिए बातचीत शुरु कर दी थी. समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह और अमर सिंह ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ बातचीत करने के बाद कहा कि वे परमाणु मुद्दे पर सरकार के जवाब और स्पष्टीकरण से संतुष्ट हैं. माना जा रहा है कि यदि विश्वास मत हासिल करने की नौबत आती है तो सरकार समाजवादी पार्टी के 39 सांसदों, राष्ट्रीय लोक दल के तीन, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के तीन और जनता दल (एस) के तीन सांसदों और कुछ निर्दलीय सांसदों के समर्थन के साथ बहुमत साबित कर सकती है. |
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