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राजस्थान में धर्मांतरण विधेयक पर विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में विधानसभा चुनाव से पहले धर्मांतरण विरोधी क़ानून लागू कराने की इच्छुक वसुंधरा राजे सरकार ने तीसरी बार इस विधेयक को विधानसभा से पारित कराया है. इस विधेयक में जबरन या प्रलोभन के ज़रिए धर्मांतरण कराने पर दंड की व्यवस्था की गई है. विधेयक को क़ानून बनने के लिए अभी राज्यपाल की मंज़ूरी मिलनी बाक़ी है. लेकिन विपक्षी कांग्रेस पार्टी, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक संगठनों ने इस विधेयक का विरोध करने का ऐलान किया है. इन संगठनों ने कहा है कि वे अदालत का दरवाज़ा खटखटाएँगे और राज्यपाल से आग्रह करेंगे कि वे इस विधेयक को वापस लौटा दें. इस विधेयक को पहली बार तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने लौटा दिया था लेकिन सरकार ने जब दूसरी बार इसे पारित कराकर भेजा तो पाटिल ने उसे राष्ट्रपति के पास बढ़ा दिया था. इस समय पाटिल ही देश की राष्ट्रपति हैं और वह विधेयक राष्ट्रपति भवन में विचाराधीन है. 'संविधान की भावना के ख़िलाफ़' पहले से ही धर्मांतरण विरोधी क़ानून लागू करने के विरोध में खड़ी कांग्रेस ने राष्ट्रपति के पास इसी से जुड़ा एक विधेयक लंबित रहते, दूसरा विधेयक पारित कराने को संविधान की भावना के ख़िलाफ़ बताया है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सीपी जोशी कहते हैं, "जब पहले ही एक विधेयक राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है तो दूसरा विधेयक लाना संविधान की भावना के विपरीत है." जोशी ने कहा कि इस विधेयक को मंज़ूरी न मिले, इसके लिए कांग्रेस हर स्तर पर विरोध करेगी. पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "यह क़ानून धार्मिक आज़ादी का हनन करता है. इसका मक़सद अल्पसंख्यक समुदाय को आतंकित करना है. किसी भी राज्य में ऐसा क़ानून नहीं है." श्रीवास्तव कहती है, "भाजपा विधानसभा चुनावों से पहले अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर लौट आई है." उन्होंने राज्यपाल से अपील की है कि वे इस विधेयक को बिना हस्ताक्षर किए लौटा दें. गुरुवार को जब विधानसभा में इस विधेयक को पारित कराया जा रहा था तब कांग्रेस ने इसका जमकर विरोध किया. अल्पसंख्यक और मानवाधिकार संगठनो ने इसके विरोध में विधानसभा के सामने प्रदर्शन किया. कांग्रेस नेता रघु शर्मा कहते हैं कि जब सरकार के पास विकास का कार्यक्रम नहीं होता है तभी वह धर्म और जाति का सहारा लेती है. क्या है विधेयक में...
राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, "राज्य में धर्मांतरण की गतिविधियाँ रुक नहीं रही थीं. लिहाजा हमें क़ानून बनाना पड़ा है. इसका राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए." विधेयक में प्रावधान है कि अगर कोई आदमी प्रलोभन और जोर-जबर्दस्ती से धर्म परिवर्तन कराने में शामिल पाया गया तो उसे पाँच साल तक की सजा हो सकती है. अब धर्मांतरण के लिए ज़िला मजिस्ट्रेट से एक माह पहले अनुमति लेनी होगी. लेकिन कोई आदमी अपने मूल धर्म मे लौटना चाहे तो उस पर ये क़ानून लागू नही होगा. इस विधेयक को लेकर अल्पसंख्यक संगठनों के मन में कई तरह के सवाल हैं. ईसाई समाज के विजय पाल कहते है, "राज्य में कोई ईसाई संगठन धर्मांतरण में शामिल नहीं है. ऐसे में इसका मक़सद अल्पसंख्यक समुदाय को निशाने पर लेने के अलावा और क्या हो सकता है." यह देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव से कुछ पहले आए इस विधेयक पर राजभवन क्या रुख़ अपनाता है. |
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