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रविवार, 27 मई, 2007 को 14:12 GMT तक के समाचार
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'जागरूक दलितों में धर्मांतरण ज़्यादा'

दलित महिलाएँ
पिछले कुछ समय में कई स्थानों पर दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया है
दलितों में धर्मांतरण सबसे ज़्यादा वो जातियाँ कर रही हैं, जो जागरूक हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से कुछ तरक्की कर गईं हैं.

मेरा मानना है कि दलितों का बौद्ध के रूप में धर्मांतरण उन्हें बरगलाकर या जबरन नहीं होता है. अधिकांश दलित सामाजिक और राजनीतिक वजहों से बौद्ध धर्म अपनाते हैं.

दलित धर्मांतरण की ये प्रक्रिया राजनीतिक है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता, लेकिन इसकी अहम वजहें सामाजिक ही होती हैं.

हालाँकि वर्ण या जाति व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रही. अन्य जातियों में भी वर्ण व्यवस्था में बदलाव का असर साफ़ देखा जा सकता है.

बेहतरी के लिए संघर्ष

जब दलितों की बात आती है तो कई स्थानों पर अस्पृश्यता का असर अब भी देखा जा सकता है. मुझे लगता है कि यही वजह है कि समाज में बेहतर स्थिति के लिए दलित धर्मांतरण का रुख़ करते हैं.

हालाँकि प्रत्येक राज्य में दलितों की स्थिति अलग-अलग है. मसलन दक्षिण भारत की स्थिति उत्तर से एकदम भिन्न है. दक्षिण के दलित जहाँ भूमिहीन रहे हैं, वहीं उत्तर भारत में दलितों के पास थोड़ी बहुत ज़मीन रही है.

दलित महिला
भारत में कई राज्यों में दलितों की सामूहिक हत्या की घटनाएँ भी होती रहती हैं

यह बात सही है कि दलितों की स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है, लेकिन कुछेक राज्यों मसलन बिहार और गुजरात में अब भी कई गाँव ऐसे हैं जहाँ आज भी दलितों का बहिष्कार होता है.

ये कहा जा सकता है कि जब तक गैरदलित, दलितों पर अत्याचार करते रहेंगे, तब तक धर्मांतरण जैसी चहल-पहल भी होती रहेगी.

जहाँ तक मुझे सूचना है महाराष्ट्र में महार और माला जाति अधिक धर्मांतरण कर रही है यानी जो दलित जातियाँ समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ी हैं, धर्मांतरण का प्रतिशत उनमें अधिक है.

हालाँकि उत्तर प्रदेश में जाटव इसका अपवाद हैं. ये आर्थिक रूप से मजबूत और जागरूक होने के बावजूद धर्मांतरण नहीं कर रहे हैं.

होता ये है कि जब दूल्हे को घोड़े पर नहीं बैठने देने, बाजा नहीं बजाने देने जैसी घटनाएँ होती हैं तो दलितों में ये संदेश जाता है कि जब तक वे हिंदु व्यवस्था में बने रहेंगे, तब तक अस्पृश्यता से उन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी.

जहाँ तक आदिवासियों के धर्मांतरण का सवाल है तो यह दलित धर्मांतरण से एकदम अलग है.

आदिवासी

आदिवासियों की अपनी अलग व्यवस्था और पहचान होती है. आदिवासियों का धर्मांतरण ईसाई धर्म में अधिक हो रहा है.

इसकी वजह ये भी है कि ऐसा प्रचार किया जाता है कि ईसाई बनने से उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएँ मिलेंगी.

हालाँकि धर्मांतरण की यह प्रक्रिया दोतरफा है. यानी कुछ आदिवासी ईसाई धर्म अपना रहा हैं तो कुछ लोग शुद्धिकरण के नाम पर ईसाई बने आदिवासियों को वापस हिंदु धर्म में ला रहे हैं.

छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा, गुजरात में आदिवासियों के धर्मांतरण से सामाजिक टकराव भी बढ़ रहा है और कभी-कभी तो यह हिंसक रूप भी ले लेता है.

आदिवासियों की धर्मांतरण प्रक्रिया दलितों से भिन्न है.

जहाँ दलित सामूहिक तौर पर धर्मांतरण कर रहे हैं, वहीं आदिवासियों में ऐसा नहीं है.

(आलोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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