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'परमाणु समझौते पर सहमति की कोशिश' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि अमरीका के साथ प्रस्तावित परमाणु समझौते पर सभी दलों में सहमति बनाने की कोशिश हो रही है. प्रणव मुखर्जी ने लोकसभा में अपनी ओर से दिए बयान में ये बात कही जबकि संसद के बाहर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेता सीताराम येचुरी ने कहा, "सरकार को समझना चाहिए कि उसके पास परमाणु समझौते पर संसद में बहुमत नहीं है." जबकि विदेश मंत्री ने कहा कि परमाणु क़रार पर अलग-अलग राजनीतिक दलों से बातचीत चल रही है. उन्होंने ये स्वीकार किया कि फिलहाल भारतीय अधिकारी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में बातचीत कर रहे हैं. विपक्षी सदस्यों के शोरगुल के बीच उन्होंने कहा कि भारत क़रार के तहत सिर्फ़ 1-2-3 समझौते के प्रति प्रतिबद्ध है न कि अमरीकी हाइड क़ानूनों के प्रति. प्रणव मुखर्जी का स्पष्टीकरण उन्होंने कहा कि भारत-अमरीकी असैनिक परमाणु सहयोग प्रक्रिया पर हाइड कानून के प्रभावों के संबंध में अमेरिकी अधिकारियों के कुछ बयानों की ओर सदस्यों का ध्यान गया होगा.
मुखर्जी ने कहा कि इस अवसर पर मुझे यह दोहराने का अवसर दें कि हाइड क़ानून अमरीकी सरकार के कार्यकारी और विधायी अंगों के लिए एक समर्थनकारी प्रावधान है. अमरीका के साथ असैनिक परमाणु करार के संबंध में भारत के अधिकार और दायित्व द्विपक्षीय 123 करार से उत्पन्न होते हैं और इस पर अमरीका के साथ हमारी सहमति हो चुकी है. ग़ौरतलब है कि अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने पिछले महीने कहा था कि बुश प्रशासन एनएसजी में ऐसे किसी मामले में भारत का समर्थन नहीं करेगा जो हाइड कानून के विरुद्ध हो. प्रणव मुखर्जी ने यह भी कहा कि परमाणु समझौते को आगे बढ़ाने के लिए सरकार देश के भीतर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने का प्रयास जारी रखेगी. परमाणु समझौते पर आगे बढ़ने का संकेत देते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि अभी हम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ बातचीत कर रहे हैं ताकि विशेष रूप से भारत के लिए निगरानी उपाय के समझौते पर पहुंचा जा सके. प्रणव मुखर्जी ने पिछले दिनों कहा था कि यदि भारत अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर आगे नहीं बढ़ता है तो उसके अलग थलग पड़ने का ख़तरा है. ये समझौता संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दलों के कड़े विरोध के कारण मुश्किल में पड़ गया है. वामपंथी दलों का कहना है कि ये समझौता अमरीका को भारतीय विदेश नीति पर हावी होने का मौक़ा दे देगा. उन्होंने धमकी दे रखी है कि यदि सरकार इस मुद्दे पर आगे बढ़ती है तो वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं.. |
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