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पाकिस्तान में भी चुनाव के पहले फ़तवा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के सूबा सरहद में चुनाव के दौरान 'फ़तवे की राजनीति' देखने को मिली है. अफ़गानिस्तान से लगे दक्षिणी ज़िले 'लकी मरौत' में एक मदरसे के आलिम ने एक फ़तवा जारी किया. इस फ़तवे में अपील की गई है कि लोग सिर्फ़ मौलाना फ़ज़लुर्रहमान की पार्टी 'जमीअतुल-उलेमा-ए-इस्लाम (फ़)' के उम्मीदवारों को ही वोट डालें. फ़तवे में साफ़ तौर कहा गया है कि 'जमीअतुल-उलेमा-ए-इस्लाम' के अलावा किसी और उम्मीदवार को वोट देना 'हराम' है. क्या है फ़तवे में ? जेयूआई के पूर्व ज़िला नाज़िम अमीर मौलाना अब्दुल मतीन के जारी किए गए इस फ़तवे के अनुसार वोट की तीन धार्मिक स्थितियां बताई गई हैं. जिनमें गवाही, सिफ़ारिश और संयुक्त अधिकारों में वकालत शामिल हैं. फ़तवे में कहा गया है कि तीनों स्थितियों में, नेक, आज्ञाकारी और योग्य उम्मीदवार को वोट देना सवाब यानी 'पुण्य' है. जबकि उसके मुक़ाबले अयोग्य और झूठे उम्मीदवार को वोट देना झूठी गवाही, बुरी सिफ़ारिश और नाजायज़ वकालत होगी. फ़तवा जामिया उस्मानिया के 'लेटर पैड' पर मौलाना के हस्ताक्षर के साथ जारी किया गया है. लेकिन इस फ़तवे में ये स्पष्ट नहीं किया गया है कि जेयूआई के उम्मीदवारों के मुक़ाबले में ही किसी और को वोट देना क्यों हराम क़रार दिया गया है.
इस सिलसिले में मौलाना अब्दुल मतीन ने बीबीसी को बताया, "जमीअतुल-उलेमाए- इस्लाम(फ़) के उम्मीदवारों का एजेंडा इस्लामी व्यवस्था लागू करने और उसका प्रचार है. लिहाज़ा आम आदमी को उसे ही वोट देना चाहिए." उन्होंने कहा, "छह मज़हबी पार्टियों पर आधारित 'इत्तेहाद मजलिसे-अमल' ने उत्तर-पश्चिमी प्रांत में अपने राज के दौरान इस्लामी व्यवस्था लागू करने के लिए वास्तविक कोशिश कीं लेकिन केंद्र में परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया." मौलाना के अनुसार पाकिस्तान में दूसरी राजनीतिक पार्टियों का एजेंडा इस्लामी व्यवस्था के लिए नहीं है इसलिए इस्लामी व्यवस्था के मुक़ाबले किसी और को वोट देना हराम और झूठी गवाही है. |
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